Monday, 23 December 2019
नियति से लड़ने की कहानी : EVERYONE HAS A STORY 2
Sunday, 1 December 2019
अनचाहे स्थानों का सफरनामा : चाय-चाय
Monday, 18 November 2019
जिम्मेदारियों और समझौतों का सामना करती दो बहनों की कहानी : Siblings
जब हमारे ऊपर जिम्मेदारीयां आती हैं, तब हमें कुछ चीजों से समझौता करना पड़ता है। कठिन समय में हमें अपने घरवालों का साथ देना होता है, जरूरत पड़ने पर उनका खयाल रखना होता है। लेकिन जब धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बिगड़ने लगे तब क्या होता है ? क्या हम वैसे ही रह पाते हैं जैसे हम पहले थे ? क्या समझौते की ग्लानि हमें अंदर ही अंदर कचोटती नहीं रहती है ? भले ही हमारे अंदर एक तरह के समझौते की ग्लानि हो, लेकिन हम इस बात से नहीं भाग सकते कि ये समझौता भी किसी ऐसे के लिए था जिसे ना करने पर हम एक और ग्लानि का शिकार हो जाते।
Sunday, 17 November 2019
आंतरिक व बाह्य संघर्षों की कार्यस्थली : मसान
Saturday, 16 November 2019
ख्वाहिशों व प्रेम के अंतर्जाल में बुनी जनार्दन की कहानी : रॉकस्टार
" तू सबकी ज़िन्दगी उठा के देख ले, जितने भी हैं संगीतकार, गायक, आर्टिस्ट, पेंटर, राईटर। इन सबमें एक ऐसी चीज है, जो काॅमन मिलेगी तुझे......दु:ख, दर्द, आँसू। " इतना सुनकर जनार्दन निकल पड़ता है किसी ऐसे की तलाश में जो उसका दिल तोड़ दे। उसे हीर मिलती है, जो उसका दिल तोड़ती है और फिर वो बड़े नाटकीय अंदाज में अपने आप को बयाँ करता है। जैसे उसे कोई दुःख हो ही नहीं। फिर दोनों मिलते हैं, दोस्ती होती है और फिर लड़की शादी करके चली जाती है। लड़का घर के काम में लग जाता है और वो अपने संगीत से दूर हो जाता है। वही होता है जो सालों से होता आया है, एक ख्वाहिश को दबा दिया जाता है। पर लड़के का दिल तो अभी भी नहीं टूटता। दिल तो तब टूटता है, जब लड़के को चोरी के इंजाम में घर से बाहर निकाल दिया जाता है। यहाँ संगीत फिर साथ देने आता है, और जनार्दन बन जाता है जार्डन द राॅकस्टार। जार्डन वो नाम जिसे हीर ने ही उसे दिया था। हीर के लिए वो प्राग जाता है, वही सब होता है जब बिछड़े प्रेमी दोबारा मिलते हैं। लेकिन यहाँ राॅक्स्टार प्रेम के चक्कर में उग्र हो जाता है और वही करता है जो उसका दिल करता है और एक सेलेब्रिटी से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। जनार्दन को दर्द तो मिल गया और उसका सहारा लेकर उसने बहुत कुछ पा भी लिया। लेकिन उसके पास एक ऐसा दर्द भी है जिससे वो निकल नहीं पाता। उस दर्द के आगे सब कुछ छोटा है, कोई नेम नहीं, कोई फेम नहीं, कोई पैसा नहीं।
इम्तियाज अली की स्टोरीटेलिंग लाजवाब है, वो कहानी को परत दर परत बुनते हैं और हर एक परत एक दूसरे से जुड़ा हुआ होता है। उनके निर्देशन की शैली कमाल की है और स्थानों का चुनाव भी शानदार है। इनकी फिल्म में मस्ती, खुशी, दु:ख, दर्द और प्रेम सब कुछ सही सही मात्रा में मिल जायेगा। रणबीर कपूर ये वो नाम है, जिसने एक बड़े फिल्मी परिवार से आने के बावजूद अपना मुकाम अपने दम पर हासिल किया है। इन्होंने सबको दिखा दिया है कि अच्छा मुकाम हासिल करने के लिए टैलेंट की भी अहमियत होती है। ये भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के उन स्टार्स में से हैं, जो स्टार होने के साथ-साथ एक अच्छे एक्टर भी हैं। इस बात का सबूत इस फिल्म को देखने के बाद पता चल जायेगा। इस फिल्म में उन्होंने कई शेड्स में अपने कलाकारी का प्रभाव छोड़ा है। पीयूष मिश्रा तो पीयूष मिश्रा है, वो किसी भी फिल्म में हों चाहे कितने भी देर के लिए हो, उनकी अदाकारी हमेशा ही प्रभावित करती है। फिल्म में शम्मी कपूर का कुछ सीन्स में होना फिल्म में चार चाँद लगा देता है।
यदि हम इस फिल्म में से संगीत को और गानों को निकाल दे, तो ये फिल्म वैसी ही हो जायेगी जैसे बिना दिल और फेफड़ों के कोई बेजान शरीर होता है। इसीलिए इस पूरी फिल्म में इनकी बहुत बड़ी भूमिका है। इरशाद कामिल और ए.आर. रहमान की जुगलबंदी ने कमाल कर दिया है। इसमें कोई अकेला ऐसा गाना नहीं है, जो कहा जा सके कि ये यहाँ पर नहीं होता तो भी अच्छा होता। 'कुन फाया कुन' एक ऐसा गीत है जो खुद को नि:स्वार्थ बनाता है, इसको सुनते हुए एक आजादी की भावना प्रकट होती है...ऐसी आजादी जो हमारे नहीं होने में है।
Thursday, 7 November 2019
गिरमिटियों के संघर्ष की कहानी कहती : कुली लाइन्स
प्रवीण कुमार झा द्वारा लिखी गयी किताब “कुली लाइन्स” इन्हीं गिरमिटियों के बारे में है। ये उन भारतीयों की कहानी कहती है जो आज से दो सौ साल पहले भारत से ले जाकर विश्व के कोने-कोने में पटक दिये गए। जिन्हें वहां पर सिर्फ मशीन समझा जाता था और कुछ नहीं। भले ही इन मजदूरों के वंशज आज वहां अच्छी-खासी स्थिति में हों, लेकिन इन मजदूरों ने वहां पर काफी जुल्म सहे थे। अंग्रेज, फ्रेंच और डच लोग इनके साथ इंसानों की तरह बर्ताव नहीं करते थे। वहां पर उनके अधिकार ना के बराबर थे और यदि थे भी तो वे एग्रीमेंट के साथ बंधे हुए थे और इतने पढ़े-लिखे भी नहीं थे कि अपने अधिकारों को समझ सकें। उन वीराने द्वीपों में इनका जमकर शोषण किया जाता था।
इस किताब में इन लोगों का इतिहास है, उन परिस्तिथियों का वर्णन है जिसने इन्हें पलायित होने पर मजबूर किया और साथ ही साथ एक नयी तरह की संस्कृति के उद्गम व विकास की यात्रा भी है। किताब में कुछ सवाल पूछे गए हैं, जैसे जातिवाद जिसकी जड़ें भारत में अभी भी चारों तरफ पसरी हुई हैं, आखिर इन सुदूर देशों व द्वीपों में ये जातिवाद कैसे ख़त्म हो गया वो भी इन मजदूर वर्ग के लोगों के द्वारा, जो पढ़े लिखे भी नहीं थे ? और भारत मजदूरों के लिए बेहतर विकल्प क्यों था ? इन सभी सवालों के जवाब आगे चलकर मिल जाते हैं।
किताब को पढ़ते वक़्त पता चलता है कि कैसे कुछ एजेंट जिन्हें अरकाटी कहा जाता था, लोगों को बहला-फुसला कर अपने साथ ले जाते थे। ये एजेंट लोगों को कोलकाता ले आते थे जहाँ पर इन्हें डिपो में रखा जाता था, वहां से इन्हें जहाजों पर बिठाकर अलग-अलग द्वीपों पर भेज दिया जाता था। इस किताब में रियूनियन द्वीप, मारीशस, फिजी, गुयाना, ट्रिनिडाड, टोबैगो, जमैका, सूरीनाम, यूगांडा के अलावा और भी अन्य द्वीपों के गिरमिटियों की कथा कही गयी है। इसके साथ ही सिक्खों के प्रवास को लेकर भी एक अध्याय समर्पित है। कई जगहों पर माहौल एक जैसा था तो कुछ जगहों पर बिल्कुल ही अलग। कहीं पर मजदूरों का शोषण बहुत ज्यादा हुआ तो कहीं पर ज्यादे से थोड़ा कम। द्वीपों के साथ- साथ मजदूरों का शोषण जहाजों पर भी होता था, खासकर महिलाओं का। जहाज पर गोरे अधिकारी, डॉक्टर, सरदार सभी महिलाओं के साथ जबरदस्ती करते थे। हालांकि उनमे कुछ ऐसे भी थे जो मजदूरों की वास्तव में मदद करते थे। ऐसा नहीं है कि मजदूर अपने विरुद्ध हो रहे शोषण का विद्रोह नहीं करते थे। यहाँ पर कई ऐसी घटनाओं का जिक्र है जहां पर मजदूरों ने संघटित होकर विद्रोह किया और कुछ अधिकारीयों को जान से भी मार डाला। ऐसा ही महिलाओं ने भी किया। लेकिन ज्यादातर विद्रोहों को बलपूर्वक दबा दिया जाता था।
जब भारत से लाये गए गिरमिटिया इन द्वीपों पर रहने लगे तो उनकी संस्कृतियों में भी कुछ बदलाव आया। कुछ चीजें वैसी ही रहीं तो कुछ बदल गयी। इनकी भाषाओं में कुछ स्थानीय शब्द जुड़ गए। संगीत ने भी नया रूप लिया जिसे “चटनी म्यूजिक” के नाम से जाना गया। कुछ नए समुदायों ने भी जन्म लिया। इस किताब में जमैका के ‘रस्ताफेरियन’ समुदाय का भी जिक्र है। इस समुदाय के लोगों ने हिन्दू साधुओं की तरह बालों में जटा बनाना शुरू किया। जिसे बॉब मार्ले जैसे रस्ताफेरियन ने लोकप्रिय बनाया।
भले ही लोगों को अपने देश से विस्थापित होने का का दुःख था, लेकिन इस विस्थापन से उन्हें कुछ फायदे भी हुए। जिसमे जाति-प्रथा का ख़त्म होना व लोगों का समृद्ध होना भी शामिल है। जैसे किताब में एक जगह एक नवयुवक का जिक्र आता है, जो बिहार के किसी गाँव से निकलकर सुदूर देश में मजदूरी करने जाता है और कुछ साल मजदूरी कर के वहां पर एक जमीन खरीदता है। धीरे-धीरे वो वहां पर एक बड़ा जमींदार बन जाता है। इसके साथ ही साथ वह दूसरे लोगों को भी ऊपर उठाता है। आज जहाँ बिहार का उसका गाँव अभी भी बहुत अच्छी हालत में नहीं है, वहीँ पर उसने उस दूसरे देश में एक शहर ही बसा दिया है और उसके वहां पर कई व्यवसाय चल रहे हैं। लेकिन फिर भी हम समृद्धी को देखते हुए उनके शोषण के दर्द को दरकिनार नहीं कर सकते। क्योंकि उन लोगों ने वहां पर जो सहा, जो झेला वो मामूली नहीं था।
Sunday, 28 January 2018
आधुनिक परिवेश में प्राचीन भारतीय ज्ञान के दर्शन कराती 'द कृष्णा की' (कृष्ण कुंजी)
Sunday, 17 December 2017
कठिन परिस्थितियों में पनपे विचारों को बतलाती ऐन की डायरी
Saturday, 16 December 2017
वो मेजर जिसने एक पैर न होने के बावजूद भी सेना को कमांड किया
Friday, 15 December 2017
लोकतंत्र में जनता की विचारधारा और कर्तव्य
Thursday, 14 December 2017
आम आदमी के जीवन को दर्शाता सिनेमा
Sunday, 29 October 2017
परिवर्तन की यात्रा
एक समय था, जब कुछ नहीं था। ना जीव, ना पेड़ पौधे और ना ही रोशनी। फिर शुरूआत हुयी जीवन की। पेड़-पौधे आये, जानवर आये, मनुष्य आये। हम मनुष्यों ने जीना सीखा, रहना सीखा, खेती करना सीखा और उन सभी चीजों को सीखते गये; जिसकी हमें जरूरत थी। धीरे-धीरे हममें बदलाव आता गया और हम आगे बढ़ते रहे। बदलाव के इस चरण में हमारी बुद्धि का भी विकास होता रहा और आस-पास के चीजों को समझने की हमारी समझ बढ़ती गयी। हमने प्रकृति को अपने हिसाब से बदलना शुरू किया या फिर ऐसा कह लें, उसका इस्तेमाल करना शुरू किया। फिर हमारी बुद्धि और भी खुली। हमने लोगों का समूह बनाया और फिर शुरू हुआ बँटवारे का खेल।
लोगों द्वारा बनाये गये समूहों ने अलग-अलग इलाकों पर कब्जा करना शुरू किया और 'अधिकार' की उत्पत्ति हुयी। इस 'अधिकार' ने न जाने कितने शब्दों को जन्म दिया - 'युद्ध', 'लालच', 'घृणा' , 'छल' और भी ऐसे बहुत से शब्द। चीजें बदलती रहीं, वक्त बदलता रहा और सबसे बड़ी बात हम मनुष्यों के विचार बदलते रहे। इन बदलते हुए विचारों के परिणाम स्वरूप कुछ ने 'उत्पत्ति' का रहस्य जानना चाहा, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए साधन ढूँढने शुरू कर दिये। इन दोनों ही तरह के लोगों ने अपने-अपने क्षेत्रों में कामयाबी पायी। पहले ने साक्ष्य ढूँढे, समय और परिवर्तन का विश्लेषण किया और फिर कुछ नियम बनाये और नियमों को आने वाली पीढ़ियों को सौंपा। जिन लोगों को ऐसा लगता था कि उन्हें अपने अस्तित्व को बचाये रखना है, उन लोगों ने नींव डाली नए मान्यताओं की, नए धर्मों की। ऐसा नहीं है कि इन लोगों ने नियम नहीं बनाये, नियम तो इन लोगों ने भी बनाये। लेकिन इसका इस्तेमाल बाकी लोगों को डराने के लिए किया गया, अपनी साख को बचाये रखने के लिए किया गया। कहीं ना कहीं इन मान्यताओं और धर्मों की जरूरत भी थी, क्योंकि सबके विचार एक जैसे नहीं थे। ये धर्म उन लोगों के बड़े काम आये, जो जिज्ञासु प्रवृत्ति के नहीं थे। इन सब के बीच भाषा और शैली ने भी अपनी-अपनी भूमिकायें निभायीं।
वक्त ने फिर अपनी रफ्तार पकड़ी और परिवर्तन की आँधी एक बार फिर जोरों से चली। हम अब पूरी तरह से बदल चुके थे। जिस धर्म की शुरूआत, लोगों के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए की गयी थी, उसी धर्म ने लोगों के अस्तित्व को खतरे में डालना शुरू कर दिया। लोग धर्म को लेकर लड़ने लगे, सब ने अपने-अपने धर्मों को महान बताना शुरू किया। अब मनुष्य सिर्फ दो प्रकार के नहीं रह गये थे। इस बदलाव ने अलग-अलग तरह के लोगों को जन्म दिया। पहले दो तरह के लोग तो अब भी मौजूद थे। लेकिन इसके अलावा कुछ और तरह के लोग भी आये। जैसे कि वे, जिसे सिर्फ दूसरे लोगों पर राज करना था, दूसरे वे जिन्हें केवल धन का मोह था। इन लोगों का ना ही धर्म के प्रति कोई आदर था और ना ही ये जिज्ञासु थे।
समय के साथ-साथ परिवर्तन की गति बढ़ती ही जा रही थी और हमने उसी दर के साथ विकास भी किया। हमने अपनी सुविधाओं के लिए बहुत सी वस्तुओं का निर्माण किया और प्रकृति का पूर्ण दोहन किया। हमने मशीने बनायीं, पूरी पृथ्वी को खत्म करने वाले हथियार बनाये, जंगलों को काटकर बिल्डिंगें बनायी। प्रकृति ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी, लेकिन हममें से कुछ भले मानुषों को कहाँ समझ आने वाला था। प्रकृति को तबाह करने का काम उसी तरह चलता रहा।
तब से लेकर अब तक हम बहुत बदल चुके हैं, बहुत ही ज्यादा। आज हम पूरी तरह से ही मशीनों पर निर्भर है। हालात ऐसे हैं, हमारे चारों तरफ प्रकृति से ज्यादा मानव निर्मित वस्तुएँ उपलब्ध हैं। आज हम एक ऐसे संसार में रह रहे हैं, जहाँ लोग सच से ज्यादा झूठ पर यकीन करते हैं। यहाँ पर विश्वास से ज्यादा अंधविश्वास है। अब तो लोग धर्म के नाम पर पूरी पृथ्वी को तबाह करने के लिए आतुर हैं।
Tuesday, 24 October 2017
शिक्षा पद्धति में बदलाव की जरूरत
भारत की शिक्षा पद्धति में आखिर इतनी खामियाँ क्यों हैं ? यहाँ पर ज्ञान से ज्यादा डिग्री को इतनी तवज्जो क्यों दी जाती है ? ऐसे ही अनेक उभरते हुए प्रश्नों के पीछे कहीं ना कहीं हम स्वयं जिम्मेदार हैं। एक जमाना था, जब भारतीय शिक्षा प्रणाली की दुनिया भर में धाक थी। तक्षशिला, नालंदा जैसे विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों को अपनी तरफ आकर्षित करते थे; ठीक उसी तरह जिस तरह आज आॅक्सफोर्ड और हार्वर्ड यूनिवर्सिटीज विश्व भर के छात्रों को अपनी ओर खींचती हैं। लेकिन आज का परिदृश्य बिल्कुल ही बदल गया है। एक तो विश्व रैकिंग के मामले में हमारे देश की संस्थायें स्थान नहीं बना पाती और दूसरी ओर बाहर से आये पढ़ने वाले छात्रों की संख्या हमारे यहाँ न के बराबर है। यदि शोध की बात की जाए, तो फिर पूछना ही नहीं है। कुछ संस्थानों को छोड़ दिया जाए; जैसे की IISc, IITs, तो बाकी के संस्थानों में न तो शोध के लिए जरूरी उपकरण उपलब्ध हैं और ना ही फैकल्टी की इसमें कोई रूचि दिखायी देती है। वो बस अपनी नौकरी करते हैं और तनख्वाह वसूलते हैं। वैसे ये लोग करें भी क्या, इनका ज्ञान जो इनके आड़े आ जाता है। जो इन्हें बताता है कि हमारे देश में शोध की जरूरत ही नहीं है। इसके लिए तो कुछ चुनिंदा संस्थान और विश्व के बाकी संस्थान तो हैं ही।
इन शिक्षण संस्थानों को यदि हम रैंकिंग के नजरिये से ना भी देखें, तो भी हमारे यहाँ शिक्षा की गुणवत्ता बिल्कुल ही खराब है। यहाँ पर छात्र बस किसी भी तरह परीक्षा में पास होना चाहते हैं और वे ऐसा करने के लिए तथ्यों को समझने की बजाये रटते हैं। भले ही उनको उस विषय से सबंधित बातें समझ में आयीं हों या ना आयीं हों, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। अभिवावक व शिक्षकों की भी इसमें उतनी ही भागीदारी है, जितनी की छात्रों की। क्योंकि वे भी उन्हें परीक्षा में आये गये नम्बरों के आधार पर ही आँकते हैं। इस बात की संभावना है कि किसी परीक्षा में उच्च स्थान प्राप्त करने वाले छात्र की अपने विषय पर मजबूत पकड़ ना हो, लेकिन उसी परीक्षा में औसत या कम अंक लाने वाला छात्र, टाॅप करने वाले छात्र से बेहतर जानकारी रखता हो।
सबसे बड़ी बात तो नौकरी की है। ये सही है कि भविष्य में जीवन निर्वाह के लिए हमारा आर्थिक रूप से सक्षम होना जरूरी है। लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि सभी छात्रों का एकमात्र लक्ष्य, सिर्फ नौकरी पाना ही हो और वे शिक्षा इसीलिए ग्रहण करें, ताकि उन्हें एक अच्छी नौकरी मिल सके। बहुत से अभिवाक या छात्र, शिक्षा को नौकरी पाने का एक जरिया भर मानते हैं, जबकि ऐसा मानना पूर्ण रूप से गलत है। छात्रों को शुरू से ही ये बताया जाता है कि यदि वो मन लगाकर नहीं पढ़ेगे, तो आगे चलकर अच्छी नौकरी नहीं मिलने वाली, शादी नहीं होने वाली और घर नहीं बनने वाला। इन सब के चक्कर में शिक्षा का अर्थ ही बदलता जा रहा है। शिक्षा हम सभी का एक अधिकार है, और ये अधिकार सिर्फ इसलिए नहीं है कि हमें आगे चलकर लाईफ में सेटल होना है; बल्कि ये अधिकार इसलिए भी है, क्योंकि हम समाज व देश के विकास में भागीदार हो सकें। दुनिया को व लोगों को समझ सकें, नयी चीजों का आविष्कार कर सकें। जब तक अभिवावकों व छात्रों के मन में शिक्षा को लेकर विचार नहीं बदलेंगे, तब तक लोगों को शिक्षा का महत्व नहीं समझ में आने वाला है।
हमें यदि अपने देश की शिक्षण पद्धति में सुधार लाना है, तो बदलाव शुरूआती स्तर से करनी होगी। प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों की शिक्षण व्यवस्था को बदलना होगा। हमें Quantity( Marks) की जगह Quality( ज्ञान) पर जोर देना होगा। ऐसा नहीं है कि Quality Education पर ध्यान देने वाले विद्यालय हमारे देश में नहीं हैं। सोनम वांगचूक द्वारा स्थापित SECMOL जैसै संस्थानों का ध्यान पूरी तरह से Quality Education पर ही है और ऐसे संस्थान हमारे देश के बाकी विद्यालयों व विश्वविद्यालयों के लिए एक अच्छा उदाहरण साबित हो सकते हैं। बस जरूरत है तो हम सभी को अपने विचारों को बदलने की और यदि विचार बदले, तो देश जरूर बदलेगा।
Sunday, 24 September 2017
भारत में काॅफी का विकास
बाबा बुदान ने 17वीं सदी में सात काॅफी बीन्स लाकर एक नयी शुरूआत की थी, क्योंकि उस समय काॅफी पर अरब साम्राज्य का एकाधिकार था और वे उन्हें सिर्फ roasted या boiled form में ही बाहर ले जाने देते थे। वे नहीं चाहते थे कि उनके अलावा कोई दूसरा देश काॅफी का व्यापार करे। बाबा बुदान के संत होने की वजह से उन्हें इन काॅफी बीन्स को भारत लाने में कोई दिक्कत नहीं हुयी। उनके द्वारा काॅफी को लाने के बाद, कर्नाटक के अलावा तमिलनाडु व केरल में भी बड़े पैमाने पर काॅफी के बागान लगाये गये। भारत में उगायी जाने वाली काॅफी दुनिया भर में सबसे अच्छी गुणवत्ता की काॅफी मानी जाती है, उसका कारण यह है कि इसे छाया में उगाया जाता है।
पहले भारत में काॅफी में शक्कर की जगह शहद का इस्तेमाल होता था। 17वीं और 18वीं सदी में अच्छी काॅफी की पहचान दूध के द्वारा की जाती थी और इस प्रकार की काॅफी को डिग्री काॅफी कहा जाता था। इसमें मिलाया गया दूध एकदम शुद्ध होता था और इस तरह का काॅफी पीना अमीर होने की पहचान माना जाता था।
Saturday, 23 September 2017
यथार्थ की तलाश : आँखों देखी
Friday, 22 September 2017
विज्ञान की समझ को आसान बनाते विज्ञान केंद्र
'सूचना का इतिहास' नामक एक सेक्शन में बहुत ही रोचक वस्तुएँ देखने को मिलती हैं। ये सेक्शन उन युवाओं को काफी मजेदार लगेगा, जो 20वीं सदी के अंत में पैदा हुए। क्योंकि पुराने जमाने कि बहुत सी ऐसी वस्तुएँ यहाँ रखी हुयी हैं, जो कि हमें उसी समय में लेकर चली जाती हैं। जैसे कि पहले के तार घर, लाईट हाउस, रेलवे स्टेशन के पुराने माॅडल, पुराने कैमरे, पुराने वाद्य यंत्र और भी बहुत कुछ। इस सेक्शन के आगे बढ़ने पर हम 'डिजिटल क्रांति' नाम के एक सेक्शन में प्रवेश करते हैं और ये सेक्शन डिजिटल दुनिया के विकास को प्रदर्शित करता है। यहाँ पर पहले के वो कम्यूटर भी रखे हुए हैं, जो कि आकार में बहुत बड़े होते थे और उनकी स्पीड कम होती थी। साथ ही साथ आजकल के आधुनिक कम्प्यूटर व स्मार्टफोन भी मौजूद हैं। इस सेक्शन में डिजिल इलेक्ट्राॅनिक्स से संबंधित कई कंपोनेन्ट्स जैसे IC(Integrated Circuit), transistors के बारे में भी बताया गया है।
तो जो लोग विज्ञान के इस रोचक संसार को करीब से जीना चाहते हैं, उसे जानना व समझना चाहते हैं, इतिहास को जीवित रूप में देखना चाहते हैं, ऐसे लोगों को इन विज्ञान केंद्रों के दर्शन जरूर करने चाहिए और अपनी सोच व समझ को विकसित करना चाहिए।
Saturday, 9 September 2017
संस्कृत बोलता एक गांव....
ऐसा माना जाता है कि मत्तुर भारत का आखिरी ऐसा गाँव है, जहाँ संस्कृत बोली जाती है। इस गाँव के सभी निवासी वैदिक जीवन व्यतीत करते हैं अर्थात् वो संस्कृत के ग्रंथों का सदैव पाठ करते हैं। यहाँ पर संस्कृत बोलने वाला शख्स कहीं भी और कभी भी देखा जा सकता है। दुकानदार और पंडित से लेकर छोटे बच्चे तक धड़ाधड़ संस्कृत बोलते हैं। और तो और, यहाँ पर तो कई लोग मोबाईल पर भी संस्कृत में बात करते दिख जायेंगे।
संस्कृत बोलने की वजह से यह गाँव बाहरी लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। बहुत से लोग दूसरे शहरों से यहाँ संस्कृत सीखने आते हैं। मत्तूर के एक आचार्य के अनुसार, अब तो वे विदेशी लोगों को भी संस्कृत की शिक्षा दे रहे हैं; जो लोग इस गाँव में नहीं आ पाते, उन्हें 'skype' पर शिक्षा दी जाती है। ये इस बात का प्रमाण है कि मत्तूर के निवासियों ने वैदिक परंपरा को तो बनाये ही रखा है, साथ में वो आजकल की technology से भी up-to-date हैं।
शिक्षा के बाकी क्षेत्रों में भी मत्तूर पीछे नहीं है। यहाँ के लगभग हर परिवार में एक साॅफ्टवेयर इंजीनियर है और भी बहुत से छात्र मेडिकल, कला व विज्ञान के क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसके अलावा इस गाँव के कुछ व्यक्ति संस्कृत के प्रोफेसर के तौर पर भी विश्वविद्यालयों में कार्यरत हैं।















