Monday, 23 December 2019

नियति से लड़ने की कहानी : EVERYONE HAS A STORY 2


आपके जीवन में सब कुछ सही चल रहा है जैसा सोचा गया था बिल्कुल वैसा ही. फिर तभी कुछ ऐसा मोड़ आता है जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती है और उसके बाद सब कुछ उथल-पुथल हो जाता है. सवि शर्मा की किताब EVERYONE HAS A STORY -2 में भी इनके किरदारों के साथ ऐसा ही कुछ होता है. इसमें चार मुख्य पात्र हैं; मीरा, विवान, निशा और कबीर. सब अपनी-अपनी जिंदगियों में खुश हैं और आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन तभी चारों दुःख और परेशानियों के भँवर में ऐसे फंसते है जिससे उनकी जिंदगी, उनके सपने सब कुछ बिखर जाते हैं. आगे कुछ मिलने की उम्मीद नहीं दिखाई देती. सब कुछ अचानक से ही बदल जाता है.

     कबीर के कैफ़े में आग लग जाती है और वो जल जाता है. इसके बाद कबीर और उसकी पत्नी निशा को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है. एक तरफ कबीर के बाहरी जलने के घाव हैं  तो वहीं  दूसरी तरफ उसके अन्दर के घाव, जहाँ उसने अपना सब कुछ खो दिया है. उधर विवान अपनी नई कंपनी के पहले ही ट्रिप पर ड्रग्स रखने के झूठे आरोप में फँस जाता है और इसके चलते मीरा को भी अपने पब्लिशर्स से हाथ धोना पड़ता है. लेकिन इन चारों ने अभी हार नहीं मानी है, वे लड़ते हैं, एक दुसरे की मदद करते हैं और अंत में उठ खड़े होते हैं.

इस किताब के पहले भाग की ही तरह इसमें भी सवि ने दोस्ती, प्रेम और आत्मविश्वास जैसे शब्दों को बखूबी अपनी कहानी के माध्यम से उकेरा है और इसके सही मायनों को बताया है. वैसे तो ये कहानी इन्ही चारों किरदारों के आस-पास घुमती है, लेकिन इन सबसे इतर यहाँ पर नियति (FATE) भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और इस पूरी कहानी में एक किरदार के रूप में सामने आती है. इस कहानी में ठोकर खा कर गिर जाने, कुछ ना कर पाने की निराशा है तो वहीँ fate(नियति) के आगे हार ना मानकर आगे बढ़ते रहने का हौसला भी है. सवि शर्मा की ये किताब हमें हर मायने में प्रेरित करती है. 

Sunday, 1 December 2019

अनचाहे स्थानों का सफरनामा : चाय-चाय


हम जब कभी भी ट्रेन से यात्रा कर रहे होते हैं तो क्या हम कभी उन जंक्शनों के बारे में विचार करते हैं जहाँ हमारी गाड़ियाँ थोड़ी देर के लिए रूकती हैं, आराम करती हैं और जहाँ से हम दूसरे स्थानों पर जाने के लिए अपनी ट्रेनें बदलते हैं। हमारे लिए तो वो सिर्फ एक स्टेशन होते हैं जहाँ से और भी दूसरे जगहों पर जाया जा सकता है। हम कभी भी उस जंक्शन के बाहर की कल्पना भी नहीं करते कि एक शहर या कस्बे के रूप में उसका अस्तित्व कैसा होगा ? ये जंक्शन हमारी यात्रा का सिर्फ एक महत्वपूर्ण  पड़ाव भर होते हैं और कुछ भी नहीं।

बिश्वनाथ घोष द्वारा लिखी गयी किताब चाय-चाय हमें इन्हीं जंक्शनों की यात्रा पर ले जाती है जो शहर के लिहाज से तो उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, लेकिन रेलवे के नजरिये से ये स्थान अपनी बहुत ही महत्वपूर्ण पहचान रखते हैं। रेलवे के ये जंक्शन भारत के एक कोने को दुसरे कोने से जोड़ते हैं। यदि ये जंक्शन ना हों तो रेलवे के द्वारा हम चारों ओर जाने की सोच भी नहीं सकते। इन जंक्शनों का जिक्र करते हुए लेखक कहते हैं कि कोई इन स्टेशनों की रेल की पटरियों को उड़ा दे तो सारा देश कई दिनों के लिए अव्यवस्था में डूब जाये। मुगलसराय, झाँसी, इटारसी, गुंटकल, अरक्कोनम और जोलारपेट्टई कुछ ऐसे ही जंक्शन हैं जिनकी यात्राओं का वर्णन इस किताब में किया गया है। इसके इतर इसमें ऐसी जगहों की यात्राएँ भी शामिल हैं जिन्हें हम ऐतिहासिक व धार्मिक कारणों से जानते हैं जैसे बनारस, खजुराहो। किताब को पढ़ते वक़्त हम स्वयं भी लेखक के माध्यम से इन सभी जगहों की यात्रा कर रहे होते हैं।
   
 इस किताब में लेखक ने इन स्थानों के इतिहास का तो वर्णन किया ही है इसके साथ ही साथ वहां पर गुजारे हुए दिनों के अपने कुछ निजी अनुभवों को भी साझा किया है। इसके अलावा इसे पढ़ते वक़्त हमें अनेक संस्कृतियों, भिन्न बोली, भिन्न खान-पान व अलग-अलग विचारों वाले लोगों से मिलने का मौका मिलता है तथा उनके अनेक मानवीय पहलुओं के बारे में पता चलता है। लेखक ने यात्रा के दौरान जिन-जिन लोगों से बातें की हैं उन सभी की अपनी कहानीयां  हैं जो उनके अपने सामाजिक पक्ष को दर्शाती है। लेखक ने बेशक उनकी बातों व विचारों को हम सब के सामने रखने की कोशिश की है। कई जगहों पर कुछ रोचक इतिहास की बातें भी शामिल हैं, जैसे इटारसी की एक धर्मशाला का जिक्र है जहाँ पर महात्मा गांधी ने 1933 में एक रात गुजारी थी और इसी धर्मशाला में उनके द्वारा सरदार पटेल को लिखे एक पत्र का उल्लेख भी है।
    
      इस किताब को पढ़ने के बाद हम स्वयं एक बात का अनुभव करते हैं कि अपने आस-पास की छोटी चीजों, जगहों, अनजान व सामान्य लोगों से भी बहुत बड़ी बातें निकल कर आ सकती हैं, बस जरूरत है थोड़ा गौर करने की और खुलकर बात करने की। ये किताब चीजों को एक अलग तरीके से देखने का नजरिया प्रदान करती है। हमें यात्राएँ करती रहनी चाहिए भले ही वो कहीं की भी यात्रा हो। ये इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वो स्थान ज्यादा प्रचलित है या फिर नहीं। लेखक के ही शब्दों में यात्राएँ सिर्फ समानता नहीं लाती, बल्कि एक-दुसरे की संस्कृतियों खासकर खाने की आदतों से भी परिचित करवाती हैं।

Monday, 18 November 2019

जिम्मेदारियों और समझौतों का सामना करती दो बहनों की कहानी : Siblings


जब हमारे ऊपर जिम्मेदारीयां आती हैं, तब हमें कुछ चीजों से समझौता करना पड़ता है। कठिन समय में हमें अपने घरवालों का साथ देना होता है, जरूरत पड़ने पर उनका खयाल रखना होता है। लेकिन जब धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बिगड़ने लगे तब क्या होता है ? क्या हम वैसे ही रह पाते हैं जैसे हम पहले थे ? क्या समझौते की ग्लानि हमें अंदर ही अंदर कचोटती नहीं रहती है ? भले ही हमारे अंदर एक तरह के समझौते की ग्लानि हो, लेकिन हम इस बात से नहीं भाग सकते कि ये समझौता भी किसी ऐसे के लिए था जिसे ना करने पर हम एक और ग्लानि का शिकार हो जाते। 
      
       कुछ ऐसी ही परिस्थितियों के आस-पास घूमती है, शीतल मेनन द्वारा निर्देशित शाॅर्ट फिल्म 'Siblings'। दो बहनें कोमा में जा चुके अपने पिता की देखभाल करती हैं। दोनों बहनों के साथ में उनकी दादी भी हैं, जिनकी देखभाल करना भी उतना ही जरूरी है। एक बहन बाहर जाॅब करती है, तो वहीं दूसरी बहन घर से बैठकर अपने start-up के लिए काम करती है। धीरे-धीरे पैसों की होती कमी, boyfriend का छोड़ कर चला जाना और काम का सही ढंग से ना हो पाना। इन सभी परेशानियाें का दोनों बहने सामना करती हैं और फिर आगे चलकर कभी खर्चे को लेकर लड़ाईयां होने लगती हैं, तो कभी responsibilities को लेकर। दादी हर लड़ाई को मूक दर्शक बन कर देख रही होती हैं और अंत में सब सही कर देती हैं। लेकिन सब सही करने के बाद भी उनके मन में एक गहरा दुःख होता है।
    
             शीतल मेनन की इस फिल्म में त्याग है, प्रेम है, जिम्मेदारीयां हैं, समझौता है, झुंझलाहट है, मजबूरी है, अवसाद है, व भावनाओं का एक पूरा सागर है। इस तरह की परिस्थितियों का सामना हममें से बहुतों ने किया होगा और हम जान सकते हैं ये कितना मुश्किल है। शीतल मेनन ने इस फिल्म के माध्यम से किसी परिवार की आंतरिक परेशानियों को बखूबी प्रदर्शित किया है। फिल्म के स्क्रीनप्ले व संवाद भावनाओं को बहुत अच्छे से उकेरते है़ं। कुछ सीन्स बिना किसी संवाद के बहुत कुछ कह जाते हैं, और मैं इसे शार्ट फिल्मों की खासियत समझता हूं। यहां दृश्य व चेहरे के हाव-भाव सब कुछ बता देते हैं। इस फिल्म में बस एक चीज की कमी खलती है और वो है संगीत। यदि इस फिल्म में संगीत होता, तो थोड़ा सा गहरापन और आ जाता। 

Sunday, 17 November 2019

आंतरिक व बाह्य संघर्षों की कार्यस्थली : मसान



'मसान' एक ऐसी जगह जहाँ जाना तो कोई नहीं चाहता, लेकिन एक न एक दिन जाना सभी को पड़ता है। चारों तरफ जलती लाशें और उन लाशों में से सुनायी देती खोपड़ियों की फटती हुयी आवाजें। बड़ा ही भयानक मंजर होता है उनके लिए, जिसने आज तक कभी ये सब देखा नहीं है। लेकिन वहाँ पर कुछ ऐसे भी हैं, जिनके लिए यही लाशें उनकी रोजी-रोटी का आधार हैं, उनके जीने का जरिया हैं। मसान ही उनकी कार्यस्थली है, जहाँ वे दूसरों के मुक्त होने की प्रक्रिया में अपना योगदान निभाते हैं। जीवन, कर्म और मृत्यु इन्हीं तीनों के चारों ओर बुनी गयी है नीरज घेवान द्वारा निर्देशित फिल्म 'मसान' की कहानी। जहाँ पर 'मसान' स्वयं एक भूमिका अदा करता है। 
      
            फिल्म दो किरदारों की कहानियों को साथ लेकर चलती है। पहली कहानी एक लड़की देवी की है, जो अपनी कुछ परिस्थितियों की वजह से एक भ्रष्ट पुलिसवाले का शिकार बन जाती है। देवी और उसके साथी को पुलिस एक होटल में पकड़ती है और उनके साथ बुरा व्यवहार करती है। लड़का घबराकर सुसाइड कर लेता है और एक भ्रष्ट पुलिसवाला इस बात को लेकर देवी व उसके पिता को ब्लैकमेल करता है। दूसरी कहानी एक निम्मनवर्गीय लड़के दीपक की है, जिसका परिवार घाटों पर मुर्दा जलाने का काम करता है। दीपक एक उच्च जाति की लड़की शालू से प्रेम कर बैठता है और डर की वजह से लड़की को अपनी सच्चाई नहीं बताना चाहता। लेकिन जब लड़की सच्चाई जानती है, तो उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो कौन है, किस जाति का है, कहाँ रहता है ? इससे प्रेम का असल रूप चरितार्थ होता है। दीपक को धक्का तब लगता है, जब एक दुर्घटना में शालू की मौत हो जाती है और उसका मृत शरीर दीपक ही जला रहा होता है। 

          इस फिल्म में एक पिता की अपनी बेटी को बचाने की जद्दोजहद, एक बेटी की अपने पिता की नजरों में खुद को सही साबित करने की कोशिश, दो लोगों के बीच प्रेम और अपने प्रेमी के खो जाने के गहरे दु:ख की निराशा है। इसके साथ-साथ खुद को परिस्थितियों से निकालकर आगे बढ़ने का संघर्ष भी है।
        दोनों कहानियों की पृष्ठभूमि बनारस है, जो किरदारों और घटनाओं को बिल्कुल करीब से महसूस कराती है। फिल्म के कुछ सीन्स ऐसे हैं जो हमारे अंदर सिरहन पैदा करते हैं। जैसे घाटों पर जलती हुयी लाशों का दृश्य जहाँ पर जीवन, कर्म और मृत्यु तीनों को एक साथ देखा जा सकता है। इस फिल्म में किसी इंसान के आंतरिक और बाह्य दोनों तरह के संघर्षों को बड़ी बखूबी से पर्दे पर उतारा गया है। दोनों कहानियाँ भले ही अलग-अलग चल रही होती हैं, लेकिन वो कहना एक ही बात चाहती हैं। फिल्म के अंत में दोनों किरदारों और कहानियों का संगम पर मिलन होता है और संगम का ये दृश्य भी कुछ कह रहा होता है। जो कि अंतिम गीत 'भोर' के माध्यम से सुनायी देता है। 

         इस फिल्म में हर एक किरदार अपनी प्रबल छाप छोड़ता है। संजय मिश्रा ने एक मध्यमवर्गीय परिवार के पिता के रूप में खुद को बहुत अच्छे से व्यक्त किया है और अपनी अदाकारी के गुण को साबित किया है। देवी के किरदार में रिचा चड्ढा ने पूरी ईमानदारी दिखायी है और विकी कौशल का अभिनय लाजवाब है, खासकर दो-तीन सीन्स में तो उन्होंने बहुत ही उम्दा लेवल की अदाकारी की है। वरूण ग्रोवर के लिखे गये शब्दों में जादू है, वो एक अलग तरह के दार्शनिकता का अहसास कराते हैं। इस फिल्म के सभी गीत और 'इंडियन ओसियन' का संगीत फिल्म के साथ जुड़ाव को और भी गहरा करता है।

Saturday, 16 November 2019

ख्वाहिशों व प्रेम के अंतर्जाल में बुनी जनार्दन की कहानी : रॉकस्टार




" तू सबकी ज़िन्दगी उठा के देख ले, जितने भी हैं संगीतकार, गायक, आर्टिस्ट, पेंटर, राईटर। इन सबमें एक ऐसी चीज है, जो काॅमन मिलेगी तुझे......दु:ख, दर्द, आँसू। " इतना सुनकर जनार्दन निकल पड़ता है किसी ऐसे की तलाश में जो उसका दिल तोड़ दे। उसे हीर मिलती है, जो उसका दिल तोड़ती है और फिर वो बड़े नाटकीय अंदाज में अपने आप को बयाँ करता है। जैसे उसे कोई दुःख हो ही नहीं। फिर दोनों मिलते हैं, दोस्ती होती है और फिर लड़की शादी करके चली जाती है। लड़का घर के काम में लग जाता है और वो अपने संगीत से दूर हो जाता है। वही होता है जो सालों से होता आया है, एक ख्वाहिश को दबा दिया जाता है। पर लड़के का दिल तो अभी भी नहीं टूटता। दिल तो तब टूटता है, जब लड़के को चोरी के इंजाम में घर से बाहर निकाल दिया जाता है। यहाँ संगीत फिर साथ देने आता है, और जनार्दन बन जाता है जार्डन द राॅकस्टार। जार्डन वो नाम जिसे हीर ने ही उसे दिया था। हीर के लिए वो प्राग जाता है, वही सब होता है जब बिछड़े प्रेमी दोबारा मिलते हैं। लेकिन यहाँ राॅक्स्टार प्रेम के चक्कर में उग्र हो जाता है और वही करता है जो उसका दिल करता है और एक सेलेब्रिटी से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। जनार्दन को दर्द तो मिल गया और उसका सहारा लेकर उसने बहुत कुछ पा भी लिया। लेकिन उसके पास एक ऐसा दर्द भी है जिससे वो निकल नहीं पाता। उस दर्द के आगे सब कुछ छोटा है, कोई नेम नहीं, कोई फेम नहीं, कोई पैसा नहीं।

इम्तियाज अली की स्टोरीटेलिंग लाजवाब है, वो कहानी को परत दर परत बुनते हैं और हर एक परत एक दूसरे से जुड़ा हुआ होता है। उनके निर्देशन की शैली कमाल की है और स्थानों का चुनाव भी शानदार है। इनकी फिल्म में मस्ती, खुशी, दु:ख, दर्द और प्रेम सब कुछ सही सही मात्रा में मिल जायेगा। रणबीर कपूर ये वो नाम है, जिसने एक बड़े फिल्मी परिवार से आने के बावजूद अपना मुकाम अपने दम पर हासिल किया है। इन्होंने सबको दिखा दिया है कि अच्छा मुकाम हासिल करने के लिए टैलेंट की भी अहमियत होती है। ये भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के उन स्टार्स में से हैं, जो स्टार होने के साथ-साथ एक अच्छे एक्टर भी हैं। इस बात का सबूत इस फिल्म को देखने के बाद पता चल जायेगा। इस फिल्म में उन्होंने कई शेड्स में अपने कलाकारी का प्रभाव छोड़ा है।  पीयूष मिश्रा तो पीयूष मिश्रा है, वो किसी भी फिल्म में हों चाहे कितने भी देर के लिए हो, उनकी अदाकारी हमेशा ही प्रभावित करती है। फिल्म में शम्मी कपूर का कुछ सीन्स में होना फिल्म में चार चाँद लगा देता है।

यदि हम इस फिल्म में से संगीत को और गानों को निकाल दे, तो ये फिल्म वैसी ही हो जायेगी जैसे बिना दिल और फेफड़ों के कोई बेजान शरीर होता है। इसीलिए इस पूरी फिल्म में इनकी बहुत बड़ी भूमिका है। इरशाद कामिल और ए.आर. रहमान की जुगलबंदी ने कमाल कर दिया है।  इसमें कोई अकेला ऐसा गाना नहीं है, जो कहा जा सके कि ये यहाँ पर नहीं होता तो भी अच्छा होता। 'कुन फाया कुन' एक ऐसा गीत है जो खुद को नि:स्वार्थ बनाता है, इसको सुनते हुए एक आजादी की भावना प्रकट होती है...ऐसी आजादी जो हमारे नहीं होने में है।

Thursday, 7 November 2019

गिरमिटियों के संघर्ष की कहानी कहती : कुली लाइन्स


गिरमिटिया, स्कूल के दिनों में जब ये नाम सुना था तो इनके बारे में सिर्फ इतना पता था कि ये वो लोग थे जिनको देश के बाहर मजदूरी करने के लिए ले जाया गया और वहां पर उनका शोषण किया गया। उस समय ना ही हमने इसके पीछे की परिस्थितियों को जानने की कोशिश की और ना ही हमारे अन्दर इसे लेकर कोई उत्सुकता थी, क्योंकि तब ये गिरमिटिया हमारे लिए सिर्फ एक syllabus का हिस्सा भर थे। लेकिन अब जब इतिहास को जानने व समझने की थोड़ी उत्सुकता बढ़ चुकी है तो लगता है की हमें इनके बारे में जानना चाहिए, क्योंकि इनके बिना हमारा इतिहास अधूरा है।
        प्रवीण कुमार झा द्वारा लिखी गयी किताब “कुली लाइन्स” इन्हीं गिरमिटियों के बारे में है। ये उन भारतीयों की कहानी कहती है जो आज से दो सौ साल पहले भारत से ले जाकर विश्व के कोने-कोने में पटक दिये गए। जिन्हें वहां पर सिर्फ मशीन समझा जाता था और कुछ नहीं। भले ही इन मजदूरों के वंशज आज वहां अच्छी-खासी स्थिति में हों, लेकिन इन मजदूरों ने वहां पर काफी जुल्म सहे थे। अंग्रेज, फ्रेंच और डच लोग इनके साथ इंसानों की तरह बर्ताव नहीं करते थे। वहां पर उनके अधिकार ना के बराबर थे और यदि थे भी तो वे एग्रीमेंट के साथ बंधे हुए थे और इतने पढ़े-लिखे भी नहीं थे कि अपने अधिकारों को समझ सकें। उन वीराने द्वीपों में इनका जमकर शोषण किया जाता था।
         इस किताब में इन लोगों का इतिहास है, उन परिस्तिथियों का वर्णन है जिसने इन्हें पलायित होने पर मजबूर किया और साथ ही साथ एक नयी तरह की संस्कृति के उद्गम व विकास की यात्रा भी है। किताब में कुछ सवाल पूछे गए हैं, जैसे जातिवाद जिसकी जड़ें भारत में अभी भी चारों तरफ पसरी हुई हैं, आखिर इन सुदूर देशों व द्वीपों में ये जातिवाद कैसे ख़त्म हो गया वो भी इन मजदूर वर्ग के लोगों के द्वारा, जो पढ़े लिखे भी नहीं थे ? और भारत मजदूरों के लिए बेहतर विकल्प क्यों था ? इन सभी सवालों के जवाब आगे चलकर मिल जाते हैं।
         किताब को पढ़ते वक़्त पता चलता है कि कैसे कुछ एजेंट जिन्हें अरकाटी कहा जाता था, लोगों को बहला-फुसला कर अपने साथ ले जाते थे। ये एजेंट लोगों को कोलकाता ले आते थे जहाँ पर इन्हें डिपो में रखा जाता था, वहां से इन्हें जहाजों पर बिठाकर अलग-अलग द्वीपों पर भेज दिया जाता था। इस किताब में रियूनियन द्वीप, मारीशस, फिजी, गुयाना, ट्रिनिडाड, टोबैगो, जमैका, सूरीनाम, यूगांडा के अलावा और भी अन्य द्वीपों के गिरमिटियों की कथा कही गयी है। इसके साथ ही सिक्खों के प्रवास को लेकर भी एक अध्याय समर्पित है। कई जगहों पर माहौल एक जैसा था तो कुछ जगहों पर बिल्कुल ही अलग। कहीं पर मजदूरों का शोषण बहुत ज्यादा हुआ तो कहीं पर ज्यादे से थोड़ा कम। द्वीपों के साथ- साथ मजदूरों का शोषण जहाजों पर भी होता था, खासकर महिलाओं का। जहाज पर गोरे अधिकारी, डॉक्टर, सरदार सभी महिलाओं के साथ जबरदस्ती करते थे। हालांकि उनमे कुछ ऐसे भी थे जो मजदूरों की वास्तव में मदद करते थे। ऐसा नहीं है कि मजदूर अपने विरुद्ध हो रहे शोषण का विद्रोह नहीं करते थे। यहाँ पर कई ऐसी घटनाओं का जिक्र है जहां पर मजदूरों ने संघटित होकर विद्रोह किया और कुछ अधिकारीयों को जान से भी मार डाला। ऐसा ही महिलाओं ने भी किया। लेकिन ज्यादातर विद्रोहों को बलपूर्वक दबा दिया जाता था।
        जब भारत से लाये गए गिरमिटिया इन द्वीपों पर रहने लगे तो उनकी संस्कृतियों में भी कुछ बदलाव आया। कुछ चीजें वैसी ही रहीं तो कुछ बदल गयी। इनकी भाषाओं में कुछ स्थानीय शब्द जुड़ गए। संगीत ने भी नया रूप लिया जिसे “चटनी म्यूजिक” के नाम से जाना गया। कुछ नए समुदायों ने भी जन्म लिया। इस किताब में जमैका के ‘रस्ताफेरियन’ समुदाय का भी जिक्र है। इस समुदाय के लोगों ने हिन्दू साधुओं की तरह बालों में जटा बनाना शुरू किया। जिसे बॉब मार्ले जैसे रस्ताफेरियन ने लोकप्रिय बनाया।
        भले ही लोगों को अपने देश से विस्थापित होने का का दुःख था, लेकिन इस विस्थापन से उन्हें कुछ फायदे भी हुए। जिसमे जाति-प्रथा का ख़त्म होना व लोगों का समृद्ध होना भी शामिल है। जैसे किताब में एक जगह एक नवयुवक का जिक्र आता है, जो बिहार के किसी गाँव से निकलकर सुदूर देश में मजदूरी करने जाता है और कुछ साल मजदूरी कर के वहां पर एक जमीन खरीदता है। धीरे-धीरे वो वहां पर एक बड़ा जमींदार बन जाता है। इसके साथ ही साथ वह दूसरे लोगों को भी ऊपर उठाता है। आज जहाँ बिहार का उसका गाँव अभी भी बहुत अच्छी हालत में नहीं है, वहीँ पर उसने उस दूसरे देश में एक शहर ही बसा दिया है और उसके वहां पर कई व्यवसाय चल रहे हैं। लेकिन फिर भी हम समृद्धी को देखते हुए उनके शोषण के दर्द को दरकिनार नहीं कर सकते। क्योंकि उन लोगों ने वहां पर जो सहा, जो झेला वो मामूली नहीं था।

Sunday, 28 January 2018

आधुनिक परिवेश में प्राचीन भारतीय ज्ञान के दर्शन कराती 'द कृष्णा की' (कृष्ण कुंजी)


The Krishna Key
अश्विन सांघी के बारे में मैंने अखबारों व मैग्जीनों में काफी पढ़ा हुआ था। लेकिन अभी तक मैंने इनके द्वारा लिखी गयी कोई किताब नहीं पढ़ी थी। पिछले महीने मैंने इनकी किताब 'द कृष्णा की (कृष्ण कुंजी) को पढ़ना शुरू किया। इस किताब को चुनने का मुख्य कारण इसका टाइटल ही था। जो कि भगवान कृष्ण के साथ जुड़ा हुआ था। जब मैंने इसे पढ़ना शुरू किया तो कुछ ही पन्ने पढ़ने के बाद मैं रोमांचित हो उठा और आगे पढ़ने पर कई रोचक तथ्य सामने आते चले गये। इस किताब में लेखक ने आधुनिक समय की कहानी के साथ-साथ प्राचीन इतिहास खासकर महाभारत के समय काल (सिंधु घाटी सभ्यता) व उस दौर की कथाओं का भी वर्णन किया है जो इसे और भी मजबूत स्तंभ प्रदान करता है। इन सब के बीच में भगवान कृष्ण बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका में और इस पूरे किताब के केंद्र में हैं।

हममें से बहुत लोगों ने आज तक अध्यात्म, धर्म व विज्ञान को एक नजरिये से कभी भी नहीं देखा है। कुछ लोग धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, वहीं कुछ विज्ञान को महत्व देते हैं। इन सभी के लिए तो ये दोनों, दो धूरियों पर स्थित अलग-अलग बिंदु हैं, जिनका कभी मिलन हो ही नहीं सकता। लेकिन इस किताब को पढ़ने के बाद लोगों की सोच शायद बदल जाये। इसमें लेखक ने आधुनिक विज्ञान व वैदिक ज्ञान के बीच के संबंधों को खोज निकला है और इन संबंधो को ठोस तर्कों का प्रयोग करते हुए प्रस्तुत किया है। जैसे कि एक जगह लेखक ने प्राचीन ऋषियों की साधना को और ॐ की ध्वनि के महत्व को विज्ञान की भाषा में समझाया है। इसी तरह के कई और भी संबंध हमें इस किताब में पढ़ने को मिलेंगे। बेशक उनके लिए ये कोई आसान काम नहीं रहा होगा, इसके लिए लेखक ने बहुत शोध और गहन विचार किया होगा। जिसका नतीजा ये शानदार किताब आज हमारे बीच मौजूद है, जो कि हमें दोबारा सोचने व खोजने पर मजबूर कर देती  है। सिंधु घाटी सभ्यता के अलावा लेखक ने दूसरे कालों व स्थानों के बारे में भी बेहतरीन तथ्य प्रस्तुत किये हैं। जैसे कि द्वारिका, सोमनाथ, कैलाश, आगरा, ताजमहल, राजस्थान इन सभी स्थानों के बारे में भी काफी कुछ बताया गया है और ये सब कहानी से ही सरोकार रखते हैं।  इसके साथ-साथ हमें इस किताब में अंकों, नक्शों व चिह्नों का भी अद्भुत खेल देखने को मिलेगा। इन सभी अंकों के पैटर्नों व चिह्नों का संबंध भी प्राचीन भारतीय सभ्यता से जुड़ा हुआ है और इनका प्रयोग इस किताब को और भी रोचक बना देता है।

हम सभी इतना तो जानते हैं कि हमारा प्राचीन ज्ञान-विज्ञान बहुत ही समृद्ध रहा है, लेकिन हम अपना ज्ञान धीरे-धीरे भूलते चले गये और दूसरों के पीछे-पीछे चलने लगे। ये सब जानते हुए भी हम इससे अनजान बनते हैं और आज भी हमारे देश में वेदों, पुराणों के अध्ययन को धर्म से जोड़कर देखा जाता है, न कि एक ज्ञान के स्रोत के रूप में। हमारे इस प्राचीन ज्ञान के महत्व को अश्विन सांघी ने एक पुस्तक के माध्यम से उजागर किया है। भले ही ये किताब एक फिक्शन बुक हो, लेकिन इसके माध्यम से हमें अपने इतिहास व संस्कृति से जुड़ने का मौका मिलता है।

Sunday, 17 December 2017

कठिन परिस्थितियों में पनपे विचारों को बतलाती ऐन की डायरी


'द डायरी आॅफ ए यंग गर्ल', दुनिया की सबसे चर्चित डायरी और द्वितीय विश्व युद्ध के महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक। एक 14-15 साल की यहूदी लड़की ऐन फ्रैंक द्वारा लिखी गयी इस डायरी में, सिर्फ रोजाना की घटनाओं का वर्णन भर ही नहीं है। बल्कि इसमें उन सभी लोगों का दर्द छिपा हुआ है; जिन्होंने उस दौरान एक ऐसे समय को झेला था, जहाँ पर उन सभी की इंसानी मान्यता न के बराबर थी। इस डायरी में एक लड़की की आंतरिक भावनायें छुपी हैं, वो अहसास छिपा है जिसे उसकी चाहत थी। 

1942 का साल, द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू हुए तीन साल हो चुके थे और एडोल्फ हिटलर पूरे यूरोप में यहूदियों के खिलाफ अभियान शुरू कर चुका था। इसी साल 12 जून को ऐन को उनके जन्मदिन पर अपने पिता से एक लाल रंग की डायरी उपहार में मिलती है और वो डायरी लिखना शुरू कर देती हैं। ये डायरी उनके सबसे अच्छे तोहफों में से एक थी। क्योंकि अभी तक उनके पास कोई ऐसा नहीं था, जिससे वो अपनी हर बात कह सके। लेकिन अब उनके पास उनकी 'किटी' थी, जैसा कि वो डायरी को संबोधित करती हैं। इस डायरी में उन्होंने यहूदियों पर लगाई गयी पाबंदियों के बारे में लिखा है, " यहूदियों को पीला सितारा लगाना होता था, उन्हें कार से चलने की मनाही थी चाहे वो उनकी अपनी ही क्यों न हो, यहूदी थिएटर नहीं जा सकते थे "। इससे पता चलता है कि उस समय यहूदी आजाद होते हुए भी आजाद नहीं थे। फिर भी उस समय वो अपने घर पर तो रह सकते थे। लेकिन ऐसा समय ज्यादा दिन तक नहीं रहा। कुछ महीनों बाद जर्मन सेना नीदरलैंड पहुँची और उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा। जर्मन सेना से बचने के लिए वो अपने परिवार के साथ ऐम्सटर्डम की उस इमारत के ऊपरी हिस्से में किताबों की आलमारी के पीछे छिपने चली गयीं, जहाँ उनके पिता काम करते थे। यहाँ पर ऐन के परिवार के अलावा उनके साथ एक और परिवार उस छोटी सी जगह में छिपा रहा। इस जगह पर छिपने के लिए ऐन के पिता आॅटो फ्रैंक के कुछ ईसाई दोस्तों ने उनकी मदद की।

इस छोटी सी बंद जगह पर ये आठ लोग सालों तक रहे। यहाँ से वो न तो कहीं बाहर जा सकते थे और न ही कुछ चुने हुए लोगों के अलावा किसी से बात कर सकते थे। ऐन अपनी डायरी में उस जगह को अनेक्स कह कर बुलाती हैं। अनेक्स में रहते हुए ये सभी कई बार ऐसे समय से गुजरे, जब उन्हें बिना बोले, बिना हिले-डुले पूरा दिन गुजारना पड़ता था। इस डायरी में अनेक्स में मनाये जाने वाले उत्सवों व अक्सर होने वाले आपसी झगड़ों के बारे में भी पता चलता है। जो यहाँ होना लाजमी था। इसके अलावा उन्होंने हमेशा होने वाले गोला, बारूदों व गोलियों के आवाजों की चर्चा भी की है। जिसकी तेज आवाजों से उस जगह पर सोना भी दुसवार था। 

इस डायरी को पढ़ने पर ये कभी नहीं लगता कि ये डायरी एक चौदह साल की लड़की के द्वारा लिखी गयी है। यहाँ पर उन्होंने अपने कुछ ऐसे विचारों को साझा किया है, जो एक बहुत अनुभवी विचारक ही सोच सकता है। जिसने पूरी दुनिया देखी हो व अलग-अलग परिस्थितियों का सामना किया हो। मेरा ऐसा मानना है कि एक बंद जगह पर रहते हुए और वहाँ पर खुद को अलग पाकर, ऐन के विचारों में परिपक्वता जल्दी आयी हो। इस डायरी के माध्यम से उन्होंने अपने आप को पूरा खोल कर रख दिया। जो शायद आसान बात नहीं थी और ऐसे शख्स के लिए तो बिल्कुल भी नहीं, जो हर वक्त एक डर के साथ जी रहा हो। 'कागज में लोगों से ज्यादा धीरज होता है' , ये कहकर ऐन अपनी डायरी के बहुत ही करीब दिखायी पड़ती हैं।

अनेक्स में ये आठों लोग करीब दो सालों तक छिपे रहे। अगस्त 1944 में किसी ने उन लोगों के छुपे होने की खबर दे दी और उन सभी लोगों को बंदी शिविर में डाल दिया गया। साथ ही उनकी मदद करने वाले ईसाई दोस्तों को भी गिरफ्तार कर लिया गया। फरवरी के आखिर में बंदी शिविर में फैले टाइफस के कारण ऐन फ्रैंक की मृत्यु हो गयी। उन आठ लोगों में से एक अकेले आॅटो फ्रैंक ही थे, जो उस बंदी शिविर से जिंदा बचकर निकले थे। इसके बाद उन्होंने अपनी बेटी के विचारों को पूरी दुनिया तक पहुँचाया।

ऐन फ्रैंक बहुत छोटी सी ही उम्र में ही दुनिया को अलविदा कह गयी, लेकिन उनके विचार, अलग अलग लोगों के प्रति उनका नजरिया, दुनिया के प्रति उनकी समझ व उनकी कलात्मक दृष्टि अभी भी ज़िन्दा है। उनकी डायरी के माध्यम से युद्ध के दौरान का वो खौफनाक मंजर अभी भी हमारे सामने बिल्कुल वैसा ही दिखायी पड़ता है।

Saturday, 16 December 2017

वो मेजर जिसने एक पैर न होने के बावजूद भी सेना को कमांड किया


आज का दिन भारत के लिए ऐतिहासिक है, क्योंकि आज ही के दिन सन् 1971 में भारत ने पाकिस्तान को शिकस्त दी थी और पूर्वी पाकिस्तान को आजाद कराया था। जिसके फलस्वरूप बांग्लादेश अस्तित्व में आया। पूरे देश में हम 16 दिसम्बर को विजय दिवस के रूप में मनाते हैं। उस समय पाकिस्तानी बलों के कमांडर जनरल ए.ए.के. नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। जिसके बाद 93000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्ध बंदी बनाया गया।

1971 के इस युद्ध में करीब 3,900 भारतीय सैनिक शहीद हो गये थे और 9,851 सैनिक घायल हुए थे। हमारे देश के हर एक सैनिक ने दुश्मन का जाबांजी से मुकाबला किया और अपनी वीरता का परिचय दिया। उन्हीं जाबांज सैनिक में से एक थे मेजर जनरल इयान कारदोज़ो, जो उस समय मेजर के पद पर थे। इस युद्ध में उन्होंने अपना एक पैर खुद ही काट डाला था।

युद्ध के दौरान मेजर कारदोज़ो का पैर लैंडमाइन पर पड़ गया, जिसकी वजह से उनका एक पैर गंभीर रूप से घायल हो गया। जब वो डाॅक्टर के पास गये, तो उन्होंने डाॅक्टर से माॅरफीन माँगा‌‍। लेकिन माॅरफीन तो खत्म हो चुकी थी। फिर उन्होंने वहाँ मौजूद एक सैनिक से कोई काटने वाली चीज लाने को कहा। वो सैनिक जब खुखरी लेकर उनके पास पहुँचा, तो उन्होंने उससे अपना पैर काटने को कहा। लेकिन सैनिक ने कहा कि ये मुझसे नहीं हो पायेगा। तब उन्होंने खुद ही खुखरी उठायी और अपना पैर काट डाला। ऐसा करना बेशक आसान काम नहीं था, लेकिन उस समय उन्होंने वो हिम्मत दिखायी और वीरता की मिशाल कायम की।

मेजर कारदोज़ो यहीं नहीं रूके, एक पैर गँवाने के बावजूद भी उनके अन्दर सैनिकों वाला जज्बा अभी भी कायम था। वो फौज में अपनी सेवा जारी रखना चाहते थे। लेकिन अंग नष्ट होने के कारण उनका सेना में बना रहना मुश्किल था। इसके लिए उन्होंने नकली पैर लगाकर ही कड़ी मेहनत की और खुद को साबित किया। कई चरणों से गुजरने के बाद वे मेजर जनरल के ओहदे तक पहुँचे। वे भारतीय सेना के पहले ऐसे अधिकारी बने, जिसने अंग नष्ट होने के बावजूद भी सेना के बटालियन और ब्रिगेड का कमांड किया और सेना मेडल से नवाजे जाने वाले पहले अधिकारी भी मेजर जनरल कारदोज़ो ही थे। उनके इस हौसले व जज्बे ने उन सैनिकों के लिए राह आसान कर दी, जो अंग नष्ट होने के बावजूद भी देश की सेवा करते रहना चाहते हैं। उन्होंने ये दिखा दिया कि शारीरिक अक्षमता भी एक सैनिक को देश की सेवा करने से रोक नहीं सकती।


                                                                                                  ( फोटो - विकिपीडिया )

Friday, 15 December 2017

लोकतंत्र में जनता की विचारधारा और कर्तव्य

चुनावों के इस सीजन में जब भी कोई न्यूज चैनल खोलकर बैठो, तो अक्सर राजनेता आपस में लड़ते हुए ही दिखायी पड़ते हैं। कोई किसी की गलतियों को गिना रहा होता है, तो कोई अपने द्वारा किये गये महत्वपूर्ण कार्यों का उल्लेख कर रहा होता है। इन लोगों की कोशिश यही रहती है कि किसी भी तरह दूसरों को नीचा दिखायें व खुद को ऊँचा उठायें। कभी-कभी तो ये लड़ाईयाँ टीवी से निकलकर उन लोगों के बीच भी आ पहुँचती हैं, जो इन्हें देख रहे होते हैं। दर्शकों के बीच दो गुट बन जाता हैं। यहाँ पर जनता भी अपनी-अपनी पार्टियाँ चुनती है और अपनी पसंद की पार्टीयों का अच्छी तरह से प्रचार प्रसार करती है। इस तरह की स्थितियों में जनता 'सरकार चुनने वाला आम नागरिक' न बन कर, किसी पार्टी की कार्यकर्ता अधिक दिखायी पड़ती है। आजकल तो सोशल मीडिया इस तरह के प्रचार प्रसार का अच्छा माध्यम बन गया है और यहाँ पर अधिकतर प्रचार 'आम जनता-cum-आम कार्यकर्ता' के द्वारा ही किया जा रहा है।

सरकार द्वारा किये गये कार्यों की सराहना करना व पार्टीयों का प्रचार करना, दो अलग-अलग चीजें हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि वर्तमान की सरकार ने जो निर्णय लिए हैं या फिर जो कार्य किया है, वो पिछली सरकार द्वारा किये गये कार्यों से बहुत ही बेहतर है। उनके द्वारा उठाये गये कदमों की हमें वाकई प्रशंसा करनी चाहिए। लेकिन इसका मतलब ये तो बिल्कुल भी नहीं है कि हम इनकी कमियों को नजरअंदाज कर दें। किसी भी देश में लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी वहाँ की जनता ही होती है। देश के नागरिकों का ये कर्तव्य बनता है कि वो सही और गलत में फर्क करे। यदि सरकार का किसी विषय पर ध्यान नहीं जा रहा, तो जनता को ये चाहिए कि वो उसे उस बारे में याद दिलाये। यदि सरकार द्वारा लिया गया कोई फैसला गलत है, तो वो उसका विरोध करे या फिर अपनी राय प्रकट करे। मगर आज ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

आज से सालों पहले इंदिरा गाँधी की लहर थी। लोग उनके भाषणों से बहुत प्रभावित होते थे और उन्हें बहुत मानते थे। लेकिन उस समय के 1984 के दंगों को कौन भूल सकता है, जहाँ पर पूरे देश में सिखों को अपने सिख होने का दंश झेलना पड़ा था। कुछ ऐसा ही आज भी है; जहाँ पर यदि कोई सरकार की गलतियों को गिनाने भी लगता है, तो उसे या तो दूसरे पार्टी का समर्थक कहा जाता है, नहीं तो फिर धर्म को आड़े लाया जाता है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि ऐसा वही लोग कहते हैं, जो 'आम कार्यकर्ता' हैं। हमें ये तय करना होगा कि हमें कार्यकर्ता बनना है या फिर आम जनता। दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं। लेकिन दोनों जब साथ में आकर 'आम कार्यकर्ता' बन जाते हैं, तो ये हमारे देश व लोकतंत्र दोनों के लिए घातक साबित हो सकता है। जिस किसी को लगता है कि वो राजनीति में जाकर देश के विकास में अपना योगदान दे सकता है, तो उसे उस दिशा में जरूर आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन आम जनता रहते हुए, किसी एक पार्टी का कार्यकर्ता बन जाना, उसका प्रचार करना व उसके विरूद्ध कुछ न सुनना, ये एक अच्छे लोकतंत्र की निशानी नहीं है।

Thursday, 14 December 2017

आम आदमी के जीवन को दर्शाता सिनेमा


सिनेमा, मनोरंजन का एक बेहतरीन माध्यम। जब भी मूड खराब हो या खाली समय में कुछ करने के लिए ना हो, तो हम सभी के दिमाग में पहला खयाल फिल्में देखने का ही आता है। मूड को ठीक करने के मामले में ये कारगर भी साबित होता है। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी भी होती हैं, जो अपने पीछे एक सवाल छोड़ जाती हैं। ये वो फिल्में होती हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। इन फिल्मों का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन ही नहीं बल्कि 'कुछ' कहना भी होता है। कभी ये फिल्में किसी इंसान के आत्मीय दर्द को बयाँ करती हैं, तो कभी हमारे सिस्टम व समाज के रवैये पर चोट करती हैं।

बचपन से जिस तरह की फिल्में मैं देखता आया हूँ, उसका मुख्य केंद्र बिंदु मनोरंजन ही रहा है। वही 'लार्जर दैन लाईफ' वाली फिल्में, जिसका हमारे वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं होता। लेकिन पिछले एक दो सालों में जिस तरह के सिनेमा से मेरा परिचय हुआ है, वे सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से बनायीं गयी फिल्में नहीं थी। बल्कि उनकी कहानी में यथार्थ नजर आता है। ' एक डाॅक्टर की मौत ' को देखने से पहले मैं नहीं जानता था कि आर्ट फिल्म क्या होती है, पैरेलल सिनेमा क्या होता है। इसके पहले तो हमें बस बाॅलीवुड, हाॅलीवुड और साउथ इंडियन सिनेमा के बारे में ही पता था। इसे देखने के बाद पता चला कि किसी भी फिल्म में मुख्य किरदार हीरो या हीरोईन नहीं, बल्कि कहानी भी हो सकती है।

मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, तपन सिन्हा, गोविन्द निहलानी और भी न जाने कितने ऐसे फिल्मकारों के नाम है; जिन्होंने काॅमर्शियल फिल्मों से इतर हटकर बेहतरीन यथार्थपरक फिल्में बनायी हैं। यदि पैरेलल सिनेमा के किरदारों की बात की जाए, तो हम स्मिता पाटिल, शबाना आजमी व नसीरुद्दीन शाह के योगदान को कैसे भूल सकते हैं। इन्होंने भारतीय सिनेमा के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है और अपनी अदाकारी से सबको प्रभावित किया है।

ऐसा नहीं है कि पहले ऐसी फिल्में नहीं बनती थीं। 60 के दशक के पहले हमारे सिनेमा में पैरेलल व कामर्शियल का बँटवारा नहीं था। उस समय फिल्में सिर्फ अच्छी या बुरी ही होती थीं। उस दौर की फिल्मों को यदि याद किया जाये, तो गुरूदत्त की 'प्यासा', 'कागज के फूल' , महबूब खान की 'मदर इंडिया', सत्यजीत रे की 'पाथेर पांचाली' इसी तरह की ही फिल्में थीं। इन सब के अलावा वी. शांताराम, ऋषिकेश मुखर्जी, विमलराय, ऋत्विक घटक भी यथार्थपरक फिल्में बनाने के लिए ही जाने जाते हैं। लेकिन 60 के दशक के बाद ऐसी फिल्मों का बनना लगभग बंद ही हो गया था। उस दौरान फिल्मों में बस मसाला डाला जा रहा था और शायद लोगों की भी डिमांड उस वक्त यही रही हो। ऐसा नहीं था कि 60 के दशक के बाद की फिल्में अच्छी नहीं थी। लेकिन वो समाज को कुछ दर्शा नहीं रही थी।

1968 में जब मृणाल सेन ने 'भुवनशोम' बनायी, तो भारतीय सिनेमा में आर्ट फिल्मों ( पैरेलल सिनेमा ) की नींव पड़ी और इसने एक नये आंदोलन का शुभारंभ किया। पूरी फिल्म इंडस्ट्री दो भागों में बँट गयी। एक तरफ लोगों को भरपूर मनोरंजन परोसने वाला मेनस्ट्रीम (कामर्शियल) सिनेमा था, तो वहीं दूसरी तरफ आम जन की जिंदगी से रूबरु कराने वाला पैरेलल सिनेमा। दोनों अपने-अपने रास्ते पर आगे बढ़े, लेकिन यहाँ पर प्रोड्यूसर्स व डिस्ट्रीब्यूटर्स की पहली पसंद मेनस्ट्रीम सिनेमा ही था। फिर भी श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकारों ने मुख्यधारा में रहकर कभी फिल्में नहीं बनायी। ऐसे फिल्मकारों ने वही बनाया, जो वे बनाना चाहते थे और उस समय कुछ हद तक सरकार ने भी आर्ट फिल्मों को प्रोत्साहित किया। भले ही ये फिल्में चली न हों, लेकिन इन्होंने अपनी कहानी से क्रिटिक्स व दर्शकों के एक तबके को प्रभावित तो जरूर किया। 
यदि हम 21वीं सदी के पैरेलल सिनेमा की बात करें, तो नीरज घेवान, आनंद गाँधी, रजत कपूर जैसे फिल्मकारों का नाम सामने आता है। नीरज घेवान द्वारा निर्देशित 'मसान' ने तो कांस फिल्म फेस्टिवल्स में भी अपनी छाप छोड़ी थी। अब हालात थोड़े बदलते हुए दिखायी दे रहे हैं और दर्शकों की डिमांड भी बदलती जा रही है। आज के दर्शक 'बिना आधार, केवल मनोरंजन' वाले सिनेमा को उतना महत्व नहीं दे रहे हैं। बल्कि अच्छे कंटेट को स्वीकार किया जा रहा है। अब पैरेलल सिनेमा बनकर एक कोने में यूँ ही पड़ा नहीं रहता, बल्कि वो आम दर्शकों तक भी पहुँच रहा है। 'दृश्यम फिल्म्स' जैसे प्रोडक्शन हाऊस ने भी इस दिशा में एक बेहतरीन कदम उठाया है। इसके बैनर तले बनी सारी फिल्में एक अच्छे सिनेमा का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

Sunday, 29 October 2017

परिवर्तन की यात्रा

एक समय था, जब कुछ नहीं था। ना जीव, ना पेड़ पौधे और ना ही रोशनी। फिर शुरूआत हुयी जीवन की। पेड़-पौधे आये, जानवर आये, मनुष्य आये। हम मनुष्यों ने जीना सीखा, रहना सीखा, खेती करना सीखा और उन सभी चीजों को सीखते गये; जिसकी हमें जरूरत थी। धीरे-धीरे हममें बदलाव आता गया और हम आगे बढ़ते रहे। बदलाव के इस चरण में हमारी बुद्धि का भी विकास होता रहा और आस-पास के चीजों को समझने की हमारी समझ बढ़ती गयी। हमने प्रकृति को अपने हिसाब से बदलना शुरू किया या फिर ऐसा कह लें, उसका इस्तेमाल करना शुरू किया। फिर हमारी बुद्धि और भी खुली। हमने लोगों का समूह बनाया और फिर शुरू हुआ बँटवारे का खेल।

लोगों द्वारा बनाये गये समूहों ने अलग-अलग इलाकों पर कब्जा करना शुरू किया और 'अधिकार' की उत्पत्ति हुयी। इस 'अधिकार' ने न जाने कितने शब्दों को जन्म दिया - 'युद्ध', 'लालच', 'घृणा' , 'छल' और भी ऐसे बहुत से शब्द। चीजें बदलती रहीं, वक्त बदलता रहा और सबसे बड़ी बात हम मनुष्यों के विचार बदलते रहे। इन बदलते हुए विचारों के परिणाम स्वरूप कुछ ने 'उत्पत्ति' का रहस्य जानना चाहा, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए साधन ढूँढने शुरू कर दिये। इन दोनों ही तरह के लोगों ने अपने-अपने क्षेत्रों में कामयाबी पायी। पहले ने साक्ष्य ढूँढे, समय और परिवर्तन का विश्लेषण किया और फिर कुछ नियम बनाये और नियमों को आने वाली पीढ़ियों को सौंपा। जिन लोगों को ऐसा लगता था कि उन्हें अपने अस्तित्व को बचाये रखना है, उन लोगों ने नींव डाली नए मान्यताओं की, नए धर्मों की। ऐसा नहीं है कि इन लोगों ने नियम नहीं बनाये, नियम तो इन लोगों ने भी बनाये। लेकिन इसका इस्तेमाल बाकी लोगों को डराने के लिए किया गया, अपनी साख को बचाये रखने के लिए किया गया। कहीं ना कहीं इन मान्यताओं और धर्मों की जरूरत भी थी, क्योंकि सबके विचार एक जैसे नहीं थे। ये धर्म उन लोगों के बड़े काम आये, जो जिज्ञासु प्रवृत्ति के नहीं थे। इन सब के बीच भाषा और शैली ने भी अपनी-अपनी भूमिकायें निभायीं।

वक्त ने फिर अपनी रफ्तार पकड़ी और परिवर्तन की आँधी एक बार फिर जोरों से चली। हम अब पूरी तरह से बदल चुके थे। जिस धर्म की शुरूआत, लोगों के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए की गयी थी, उसी धर्म ने लोगों के अस्तित्व को खतरे में डालना शुरू कर दिया। लोग धर्म को लेकर लड़ने लगे, सब ने अपने-अपने धर्मों को महान बताना शुरू किया। अब मनुष्य सिर्फ दो प्रकार के नहीं रह गये थे। इस बदलाव ने अलग-अलग तरह के लोगों को जन्म दिया। पहले दो तरह के लोग तो अब भी मौजूद थे। लेकिन इसके अलावा कुछ और तरह के लोग भी आये। जैसे कि वे, जिसे सिर्फ दूसरे लोगों पर राज करना था, दूसरे वे जिन्हें केवल धन का मोह था। इन लोगों का ना ही धर्म के प्रति कोई आदर था और ना ही ये जिज्ञासु थे।

समय के साथ-साथ परिवर्तन की गति बढ़ती ही जा रही थी और हमने उसी दर के साथ विकास भी किया। हमने अपनी सुविधाओं के लिए बहुत सी वस्तुओं का निर्माण किया और प्रकृति का पूर्ण दोहन किया। हमने मशीने बनायीं, पूरी पृथ्वी को खत्म करने वाले हथियार बनाये, जंगलों को काटकर बिल्डिंगें बनायी। प्रकृति ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी, लेकिन हममें से कुछ भले मानुषों को कहाँ समझ आने वाला था। प्रकृति को तबाह करने का काम उसी तरह चलता रहा।

तब से लेकर अब तक हम बहुत बदल चुके हैं, बहुत ही ज्यादा। आज हम पूरी तरह से ही मशीनों पर निर्भर है। हालात ऐसे हैं, हमारे चारों तरफ प्रकृति से ज्यादा मानव निर्मित वस्तुएँ उपलब्ध हैं। आज हम एक ऐसे संसार में रह रहे हैं, जहाँ लोग सच से ज्यादा झूठ पर यकीन करते हैं। यहाँ पर विश्वास से ज्यादा अंधविश्वास है। अब तो लोग धर्म के नाम पर पूरी पृथ्वी को तबाह करने के लिए आतुर हैं।

Tuesday, 24 October 2017

शिक्षा पद्धति में बदलाव की जरूरत

भारत की शिक्षा पद्धति में आखिर इतनी खामियाँ क्यों हैं ? यहाँ पर ज्ञान से ज्यादा डिग्री को इतनी तवज्जो क्यों दी जाती है ? ऐसे ही अनेक उभरते हुए प्रश्नों के पीछे कहीं ना कहीं हम स्वयं जिम्मेदार हैं। एक जमाना था, जब भारतीय शिक्षा प्रणाली की दुनिया भर में धाक थी। तक्षशिला, नालंदा जैसे विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों को अपनी तरफ आकर्षित करते थे; ठीक उसी तरह जिस तरह आज आॅक्सफोर्ड और हार्वर्ड यूनिवर्सिटीज विश्व भर के छात्रों को अपनी ओर खींचती हैं। लेकिन आज का परिदृश्य बिल्कुल ही बदल गया है। एक तो विश्व रैकिंग के मामले में हमारे देश की संस्थायें स्थान नहीं बना पाती और दूसरी ओर बाहर से आये पढ़ने वाले छात्रों की संख्या हमारे यहाँ न के बराबर है। यदि शोध की बात की जाए, तो फिर पूछना ही नहीं है। कुछ संस्थानों को छोड़ दिया जाए; जैसे की IISc, IITs, तो बाकी के संस्थानों में न तो शोध के लिए जरूरी उपकरण उपलब्ध हैं और ना ही फैकल्टी की इसमें कोई रूचि दिखायी देती है। वो बस अपनी नौकरी करते हैं और तनख्वाह वसूलते हैं। वैसे ये लोग करें भी क्या, इनका ज्ञान जो इनके आड़े आ जाता है। जो इन्हें बताता है कि हमारे देश में शोध की जरूरत ही नहीं है। इसके लिए तो कुछ चुनिंदा संस्थान और विश्व के बाकी संस्थान तो हैं ही।
        
        इन शिक्षण संस्थानों को यदि हम रैंकिंग के नजरिये से ना भी देखें, तो भी हमारे यहाँ शिक्षा की गुणवत्ता बिल्कुल ही खराब है। यहाँ पर छात्र बस किसी भी तरह परीक्षा में पास होना चाहते हैं और वे ऐसा करने के लिए तथ्यों को समझने की बजाये रटते हैं। भले ही उनको उस विषय से सबंधित बातें समझ में आयीं हों या ना आयीं हों, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। अभिवावक व शिक्षकों की भी इसमें उतनी ही भागीदारी है, जितनी की छात्रों की। क्योंकि वे भी उन्हें परीक्षा में आये गये नम्बरों के आधार पर ही आँकते हैं। इस बात की संभावना है कि किसी परीक्षा में उच्च स्थान प्राप्त करने वाले छात्र की अपने विषय पर मजबूत पकड़ ना हो, लेकिन उसी परीक्षा में औसत या कम अंक लाने वाला छात्र, टाॅप करने वाले छात्र से बेहतर जानकारी रखता हो।
         सबसे बड़ी बात तो नौकरी की है। ये सही है कि भविष्य में जीवन निर्वाह के लिए हमारा आर्थिक रूप से सक्षम होना जरूरी है। लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि सभी छात्रों का एकमात्र लक्ष्य, सिर्फ नौकरी पाना ही हो और वे शिक्षा इसीलिए ग्रहण करें, ताकि उन्हें एक अच्छी नौकरी मिल सके। बहुत से अभिवाक या छात्र, शिक्षा को नौकरी पाने का एक जरिया भर मानते हैं, जबकि ऐसा मानना पूर्ण रूप से गलत है। छात्रों को शुरू से ही ये बताया जाता है कि यदि वो मन लगाकर नहीं पढ़ेगे, तो आगे चलकर अच्छी नौकरी नहीं मिलने वाली, शादी नहीं होने वाली और घर नहीं बनने वाला। इन सब के चक्कर में शिक्षा का अर्थ ही बदलता जा रहा है। शिक्षा हम सभी का एक अधिकार है, और ये अधिकार सिर्फ इसलिए नहीं है कि हमें आगे चलकर लाईफ में सेटल होना है; बल्कि ये अधिकार इसलिए भी है, क्योंकि हम समाज व देश के विकास में भागीदार हो सकें। दुनिया को व लोगों को समझ सकें, नयी चीजों का आविष्कार कर सकें। जब तक अभिवावकों व छात्रों के मन में शिक्षा को लेकर विचार नहीं बदलेंगे, तब तक लोगों को शिक्षा का महत्व नहीं समझ में आने वाला है।

हमें यदि अपने देश की शिक्षण पद्धति में सुधार लाना है, तो बदलाव शुरूआती स्तर से करनी होगी। प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों की शिक्षण व्यवस्था को बदलना होगा। हमें Quantity( Marks) की जगह Quality( ज्ञान) पर जोर देना होगा। ऐसा नहीं है कि Quality Education पर ध्यान देने वाले विद्यालय हमारे देश में नहीं हैं। सोनम वांगचूक द्वारा स्थापित SECMOL जैसै संस्थानों का ध्यान पूरी तरह से Quality Education पर ही है और ऐसे संस्थान हमारे देश के बाकी विद्यालयों व विश्वविद्यालयों के लिए एक अच्छा उदाहरण साबित हो सकते हैं। बस जरूरत है तो हम सभी को अपने विचारों को बदलने की और यदि विचार बदले, तो देश जरूर बदलेगा।
  

Sunday, 24 September 2017

भारत में काॅफी का विकास

सुबह उठने के बाद हम सभी को चाय या काॅफी का इंतजार रहता ही है। हममें से बहुत लोगों को यदि सुबह-सुबह ये पेय न मिले, तो दिमाग फ्रेश नहीं होता। जो लोग रात भर काम करते हैं, उनके लिए भी काॅफी किसी वरदान से कम नहीं है। यहाँ पर लोग बरिस्ता जैसे हाई क्वालिटी के कैफे में भी काॅफी पीते हैं और घर पर एक रूपये के पैकेट वाली कॉफी भी बनाते हैं। भारत में काॅफी मुख्य पेय पदार्थों में से एक है। लेकिन 17वीं सदी के पहले भारत में काॅफी का नामोंनिशान तक मौजूद नहीं था। भारत में काॅफी लाने का श्रेय एक सूफी संत बाबा बूदान को जाता है। बाबा बूदान जब हज करके भारत वापस आ रहे थे, तो उन्होंने मोका यमन के पोर्ट से सात काॅफी बीन्स लिए और उसे लेकर भारत आ गये। इन काॅफी बीन्स को कर्नाटक के चिक्कामगलुर जिले में चंद्रगिरी की पहाड़ियों पर उगाया गया और आजकल इसे बाबा बुदान गिरी या बाबा बुदान फाॅरेस्ट के नाम से जाना जाता है। 
       
        बाबा बुदान ने 17वीं सदी में सात काॅफी बीन्स लाकर एक नयी शुरूआत की थी, क्योंकि उस समय काॅफी पर अरब साम्राज्य का एकाधिकार था और वे उन्हें सिर्फ roasted या boiled form में ही बाहर ले जाने देते थे। वे नहीं चाहते थे कि उनके अलावा कोई दूसरा देश काॅफी का व्यापार करे। बाबा बुदान के संत होने की वजह से उन्हें इन काॅफी बीन्स को भारत लाने में कोई दिक्कत नहीं हुयी। उनके द्वारा काॅफी को लाने के बाद, कर्नाटक के अलावा तमिलनाडु व केरल में भी बड़े पैमाने पर काॅफी के बागान लगाये गये। भारत में उगायी जाने वाली काॅफी दुनिया भर में सबसे अच्छी गुणवत्ता की काॅफी मानी जाती है, उसका कारण यह है कि इसे छाया में उगाया जाता है।
     
 काॅफी शब्द, अरबी शब्द 'कावा' से बना है, जिसका अर्थ वायु होता है। सबसे पहले इथियोपिया के लोगों ने काॅफी के बारे में जाना था। ऐसा माना जाता है कि 9वीं सदी में इथियोपिया में रहने वाले काल्दी नाम के माली ने देखा कि उसकी बकरियाँ काॅफी खाकर अधिक ऊर्जावान रहती हैं। इसके बाद तो काॅफी इथियोपिया से होते हुए यमन में पहुँचा और फिर वहाँ से पूरी दुनिया में कॉफी का विस्तार हुआ। बहुत से लोगों ने तो काॅफी का इस्तेमाल रात भर जगने के लिए भी किया, क्योंकि उन्हें काॅफी पीने से नींद नहीं आती थी। वैसे आज भी काॅफी या चाय का इस्तेमाल रात को जगने के लिए किया जाता है। मोका यमन में 'ओमर' नाम के एक हकीम तो काॅफी का इस्तेमाल अपने मरीजों के लिए भी करते थे। 
        
         पहले भारत में काॅफी में शक्कर की जगह शहद का इस्तेमाल होता था। 17वीं और 18वीं सदी में अच्छी काॅफी की पहचान दूध के द्वारा की जाती थी और इस प्रकार की काॅफी को डिग्री काॅफी कहा जाता था। इसमें मिलाया गया दूध एकदम शुद्ध होता था और इस तरह का काॅफी पीना अमीर होने की पहचान माना जाता था।

     
  भारत में पहला काॅफी शाॅप, प्लासी की युद्ध के बाद कोलकाता में खोला गया। काॅफी की उत्पादकता व गुणवत्ता को बढ़ाने के उद्देश्य से भारत में पहला काॅफी रिसर्च सेंटर 1925 में चिक्कामगलुर जिले में बेलेहोनर के पास स्थापित किया गया। 1936 में भारतीय काॅफी हाऊस की पहली चेन की शुरूआत हुई और सबसे पहले इसे मुम्बई में खोला गया, फिर कोलकाता और केरल में भी इसके ब्रांचेस खोले गये। 1970 तक आते-आते भारत में काॅफी ने एक पूरा उद्योग खड़ा कर दिया था। काॅफी की इस जरूरत को महसूस करते हुए सन् 1942 में काॅफी बोर्ड की नींव रखी गयी। भारत का काॅफी बोर्ड, एक स्वायत्त निकाय है, जो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय; भारत सरकार के अधीन कार्य करता है।
       आज भारत में करीब 1,71,000 काॅफी के बागान हैं; जहाँ नौ लाख एकड़ की जमीन पर काॅफी ऊगायी जाती है। भारतीय दुनिया का छठे नम्बर का काॅफी पैदा करने वाला देश है। यहाँ पर पूरी दुनिया की 4.5% काॅफी ऊगायी जाती है। साल 2015 में भारत ने 349,980,000 kg काॅफी बीन्स का उत्पादन किया था। तो भारत में काॅफी की जो यात्रा सात बीन्स से शुरू हुयी थी, उसने आज बढ़कर एक बड़े कारोबार का शक्ल ले लिया है। 

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Saturday, 23 September 2017

यथार्थ की तलाश : आँखों देखी

हमारे जीवन का सच क्या है? आखिर ऐसा क्या है जिस पर हम विश्वास कर लें। क्या हर वक्त, हर जगह विश्वास करना सही होता है? क्या हमें आँखें मूँद कर सब कुछ मान लेना चाहिए या फिर ढूँढनी चाहिए, वो वजह जिसके वजह से वो सच, सच बना है। ये तो सही बात है कि हम उस बात पर कैसे विश्वास करे लें, जो हमारी 'आँखों देखी' नहीं है। हमें बचपन से सिखाया गया है कि ये ऐसा है, ये वैसा है और ये तुम्हें मानना ही है, और मानना इसलिए नहीं है कि ये ऐसा है या फिर ऐसा होता होगा। बल्कि मानना इसलिए है कि लोग इसे ऐसा ही मानते आये हैं। भले ही उसका वास्तविक रूप वो हो ही न, जैसा उसे लोगों ने स्वीकार किया है। लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि हम हर एक चीज पर ही सवाल करें। कुछ इसी तरह के सवालों के जवाब तलाशती है, रजत कपूर की फिल्म 'आँखों देखी'। 
    
 इस फिल्म के मुख्य किरदार बाऊजी, जिसको संजय मिश्रा ने बड़ी संजीदगी के साथ निभाया है; ऐसे ही सवालों के जवाब पाने के लिए अपने अंदर झाँकते हैं। वो अपने आप को महसूस करने की कोशिश करते हैं और खुद को और दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं। लेकिन उनकी इस कोशिश को बाकी सब लोग पागलपन समझते हैं। कुछ उनकी नकल उतारते हैं, तो कुछ उन्हें चिढ़ाते हैं। लेकिन समझ कोई नहीं पाता है।
इस फिल्म का एक सीन बहुत ही अच्छा है; जब पंडित जी, बाऊजी को 'प्रसाद' देते हैं और बापूजी कहते हैं कि नहीं ये तो 'मिठाई' है। बाऊजी की ज़िन्दगी में सब कुछ एक ढर्रे पर नहीं चलता है, बल्कि वो तो अलग-अलग नाव में सवार होकर तैरते रहते हैं। यहाँ पर बाऊजी में उस इंसान की परछाई नजर आती है, जो यथार्थ से वाकिफ होना चाहता है, उसको जीना चाहता है। फिल्म के आखिरी सीन में बाऊजी इसी यथार्थ के पीछे भागते हुए नजर आते हैं और उस यथार्थ का अनुभव करते हैं। वो उड़ रहे होते हैं, उन्हें इसमें खुशी मिलती है। उनके ही शब्दों में उनकी इस खुशी को शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है।
        
इस फिल्म में मध्यवर्गीय समाज को बहुत ही करीब से दिखाया गया है। संयुक्त परिवार की उलझनों से लेकर बाहरी समाज की सोच तक को तक को रजत कपूर ने बड़े अच्छे ढंग से पर्दे पर उतारा है। यहाँ यही है कि कहीं कोई विचार किसी पर थोपे जा रहे हैं, तो कहीं किसी के विचारों का महत्व ही नहीं है।
      
 संजय मिश्रा को हम बाकी की फिल्मों में एक काॅमेडियन के दौर पर ही देखते आये हैं। जैसे कि वो All the best में 'Dhondu just chill' बोल कर के हँसाते हैं। लेकिन इस फिल्म में उन्होंने बिल्कुल इसके विपरीत काम किया है और एक आम इंसान के किरदार को पूरी तरह से जीवंत किया है। उनका अभिनय कहीं भी बनावटी नहीं लगता। हमें ये तो मानना ही पड़ेगा कि संजय मिश्रा उन कलाकारों में से हैं, जो कि हर तरह का किरदार निभा सकता है। संजय मिश्रा के अलावा रजत कपूर ने भी अपने सशक्त अभिनय की छाप छोड़ी है।
           
गीतों की बात की जाये तो वरूण ग्रोवर को तो शब्दों से खेलने में महारथ हासिल है। यहाँ पर भी उन्होंने इसका प्रदर्शन किया है। सागर देसाई ने भी उनका भरपूर साथ दिया है, जिनकी बनायी संगीत वरूण ग्रोवर के गीतों पर बिल्कुल फिट बैठती है। इसका एक गानी 'लागी नयी धूप' तो दिल को छू जाता है।
       

Friday, 22 September 2017

विज्ञान की समझ को आसान बनाते विज्ञान केंद्र

विज्ञान का संसार बहुत ही बड़ा है और ये विषय मानवीय सभ्यता के विकास के साथ-साथ कई रोचक तथ्यों को भी अपने आप में समेटे हुए है। जैसे कि इंद्रधनुष का बनना, सूर्य या चन्द्र ग्रहण का लगना और भी बहुत कुछ। वैसे तो हम अपने आस-पास हर वक्त विज्ञान से ही रुबरू रहते हैं, लेकिन विज्ञान द्वारा निर्धारित इन प्राकृतिक क्रियाओं को हर एक आम इंसान नहीं समझ पाता। विज्ञान की इसी समझ को आसान बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् द्वारा देश भर में 49 विज्ञान केंद्रों की स्थापना की गई। ये विज्ञान केंद्र आम लोगों को भी सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित करता है और उसके मन में भी विज्ञान के प्रति रूचि पैदा करता है।
    
  नई दिल्ली में प्रगति मैदान के पास भैरों मार्ग पर स्थित 'राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र' इन्हीं 49 विज्ञान केंद्रों में से एक है। विज्ञान से संबंधित प्राचीन काल की जानकारियों से लेकर 21वीं सदी के डिजिटल युग तक, हर कुछ देखने व सुनने को मिलेगा इस विज्ञान केंद्र में। यहाँ पर आप विज्ञान के प्रयोगों को खुद भी कर के देख सकते हैं, उपकरणों को छू सकते हैं और यहाँ आपको कोई कुछ नहीं बोलेगा। यहाँ आप ये देख सकते हैं कि कैसे पियानो को बिना छुए, बस हवा में हाथ घुमाने से ही पियानो बजने लगता है। दरअसल ये इंफ्रारेड किरणों के कारण होता है। वहाँ जाकर आप इन सब के पीछे छिपे संपूर्ण तथ्यों को भी जान सकते हैं।
        
 इस विज्ञान केंद्र में 'हमारी वैज्ञानिक और प्रोद्यौगिक धरोहर' नाम का एक सेक्शन है, जिसमें प्राचीन भारत के वैज्ञानिक विकास को दिखाया गया है। इस सेक्शन में अनेक भारतीय वैज्ञानिकों जैसे आर्यभट्ट, कणाद, नागार्जुन की उपलब्धियों को भी दर्शाया गया है। इसके अलावा शल्य चिकित्सा व सुश्रुत द्वारा बनाये गये उपकरणों के माॅडल भी यहाँ देखने को मिल जायेंगे। 


 इसके आगे 'मानव जीव विज्ञान' नाम का एक सेक्शन है, जहाँ हमारे शरीर से संबंधित अनेक जानकारियाँ दी गयी हैं। थोड़ा और आगे जाने पर प्रागैतिहासिक काल से भी जुड़ी चीजें देखने को मिलती हैं। 
       
       'सूचना का इतिहास' नामक एक सेक्शन में बहुत ही रोचक वस्तुएँ देखने को मिलती हैं। ये सेक्शन उन युवाओं को काफी मजेदार लगेगा, जो 20वीं सदी के अंत में पैदा हुए। क्योंकि पुराने जमाने कि बहुत सी ऐसी वस्तुएँ यहाँ रखी हुयी हैं, जो कि हमें उसी समय में लेकर चली जाती हैं। जैसे कि पहले के तार घर, लाईट हाउस, रेलवे स्टेशन के पुराने माॅडल, पुराने कैमरे, पुराने वाद्य यंत्र और भी बहुत कुछ। इस सेक्शन के आगे बढ़ने पर हम 'डिजिटल क्रांति' नाम के एक सेक्शन में प्रवेश करते हैं और ये सेक्शन डिजिटल दुनिया के विकास को प्रदर्शित करता है। यहाँ पर पहले के वो कम्यूटर भी रखे हुए हैं, जो कि आकार में बहुत बड़े होते थे और उनकी स्पीड कम होती थी। साथ ही साथ आजकल के आधुनिक कम्प्यूटर व स्मार्टफोन भी मौजूद हैं। इस सेक्शन में डिजिल इलेक्ट्राॅनिक्स से संबंधित कई कंपोनेन्ट्स जैसे IC(Integrated Circuit), transistors  के बारे में भी बताया गया है।
  
   इस सेक्शन के नीचे आने पर हमें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों के विकास की झलक देखने को मिलती है। इसके बाद का सेक्सन इतिहास व राजनीति से संबंधित है; जहाँ आॅडियो व विडियो के माध्यम से बहुत से नेताओं के भाषण, देश-दुनिया की तमाम जानकारियाँ देखने व सुनने को मिलती हैं।
      
 नई दिल्ली के अलावा कोलकाता, मुबंई, लखनऊ जैसे शहरों में भी इसी तरह के विज्ञान केंद्रों की स्थापना की गयी है। जहाँ पर विज्ञान को जानने व समझने के लिए मजेदार तरीकों का उपयोग किया गया है। लखनऊ के अलीगंज में स्थित 'आंचलिक विज्ञान नगरी' में आंतरिक प्रदर्शनी के अलावा बाहर खुले में भी विज्ञान के कई उपकरण रखे गये हैं, जो कि विज्ञान के नियमों को आसानी से समझाते हैं। यहाँ सबसे रोचक एक नल है जो कि हवा में लटका हुआ है और वहाँ से पानी लगातार गिरता ही रहता है। यहाँ आने वाले सभी पर्यटकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण का केंद्र यही नल है। अब इसके पीछे माँजरा क्या है, ये तो वहाँ जा कर ही पता लगेगा। 
       
       तो जो लोग विज्ञान के इस रोचक संसार को करीब से जीना चाहते हैं, उसे जानना व समझना चाहते हैं, इतिहास को जीवित रूप में देखना चाहते हैं, ऐसे लोगों को इन विज्ञान केंद्रों के दर्शन जरूर करने चाहिए और अपनी सोच व समझ को विकसित करना चाहिए।

Saturday, 9 September 2017

संस्कृत बोलता एक गांव....


हम सभी संस्कृत को एक भाषा के तौर पर जानते तो हैं, लेकिन उसका इस्तेमाल न के बराबर करते हैं। आज के समय में यदि कोई संस्कृत में बात करता दिख जाए, तो उसे एक अलग नजर से ही देखा जायेगा। लेकिन कर्नाटक के एक गाँव मत्तूर में लोग आज भी संस्कृत में ही बात करते हैं।
     

    संस्कृत पूरे विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है। प्राचीन भारत में मुख्य रूप से संस्कृत ही लिखी, पढ़ी व बोली जाती थी। वेद, ग्रंथ, पुराण व उपनिषद् ये सभी संस्कृत भाषा में ही लिखे गये। संस्कृत भाषा का प्रभाव विश्व की अन्य भाषाओं पर भी रहा है; जैसे कि अंग्रेजी का शब्द 'man', संस्कृत के शब्द 'मनु' से बना है। लेकिन समय के बदलने के साथ-साथ इस भाषा का महत्व कम होता चला गया और ये सिर्फ विद्यालयों व किताबों तक सिमट कर रह गयी। इन सब के बावजूद मत्तूर गाँव ने इस प्राचीन भाषा को आज भी ज़िन्दा रखा हुआ है। शिमोगा जिले में तुंगभद्रा नदी के किनारे बसे इस गाँव में हर एक इंसान संस्कृत बोलता नजर आ जायेगा। यहाँ पर संस्कृत बोलचाल की भाषा है; ठीक उसी तरह जैसे हिन्दी, भोजपुरी, गुजराती, बंगाली व अन्य भाषायें हैं।
       
     ऐसा माना जाता है कि मत्तुर भारत का आखिरी ऐसा गाँव है, जहाँ संस्कृत बोली जाती है। इस गाँव के सभी निवासी वैदिक जीवन व्यतीत करते हैं अर्थात् वो संस्कृत के ग्रंथों का सदैव पाठ करते हैं। यहाँ पर संस्कृत बोलने वाला शख्स कहीं भी और कभी भी देखा जा सकता है। दुकानदार और पंडित से लेकर छोटे बच्चे तक धड़ाधड़ संस्कृत बोलते हैं। और तो और, यहाँ पर तो कई लोग मोबाईल पर भी संस्कृत में बात करते दिख जायेंगे।
    संस्कृत बोलने की वजह से यह गाँव बाहरी लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। बहुत से लोग दूसरे शहरों से यहाँ संस्कृत सीखने आते हैं। मत्तूर के एक आचार्य के अनुसार, अब तो वे विदेशी लोगों को भी संस्कृत की शिक्षा दे रहे हैं; जो लोग इस गाँव में नहीं आ पाते, उन्हें 'skype'  पर शिक्षा दी जाती है। ये इस बात का प्रमाण है कि मत्तूर के निवासियों ने वैदिक परंपरा को तो बनाये ही रखा है, साथ में वो आजकल की technology से भी up-to-date हैं।
       शिक्षा के बाकी क्षेत्रों में भी मत्तूर पीछे नहीं है। यहाँ के लगभग हर परिवार में एक साॅफ्टवेयर इंजीनियर है और भी बहुत से छात्र मेडिकल, कला व विज्ञान के क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसके अलावा इस गाँव के कुछ व्यक्ति संस्कृत के प्रोफेसर के तौर पर भी विश्वविद्यालयों में कार्यरत हैं।
       
                                                                                                   ( फोटो- विकिपीडिया )