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Thursday, 7 November 2019

गिरमिटियों के संघर्ष की कहानी कहती : कुली लाइन्स


गिरमिटिया, स्कूल के दिनों में जब ये नाम सुना था तो इनके बारे में सिर्फ इतना पता था कि ये वो लोग थे जिनको देश के बाहर मजदूरी करने के लिए ले जाया गया और वहां पर उनका शोषण किया गया। उस समय ना ही हमने इसके पीछे की परिस्थितियों को जानने की कोशिश की और ना ही हमारे अन्दर इसे लेकर कोई उत्सुकता थी, क्योंकि तब ये गिरमिटिया हमारे लिए सिर्फ एक syllabus का हिस्सा भर थे। लेकिन अब जब इतिहास को जानने व समझने की थोड़ी उत्सुकता बढ़ चुकी है तो लगता है की हमें इनके बारे में जानना चाहिए, क्योंकि इनके बिना हमारा इतिहास अधूरा है।
        प्रवीण कुमार झा द्वारा लिखी गयी किताब “कुली लाइन्स” इन्हीं गिरमिटियों के बारे में है। ये उन भारतीयों की कहानी कहती है जो आज से दो सौ साल पहले भारत से ले जाकर विश्व के कोने-कोने में पटक दिये गए। जिन्हें वहां पर सिर्फ मशीन समझा जाता था और कुछ नहीं। भले ही इन मजदूरों के वंशज आज वहां अच्छी-खासी स्थिति में हों, लेकिन इन मजदूरों ने वहां पर काफी जुल्म सहे थे। अंग्रेज, फ्रेंच और डच लोग इनके साथ इंसानों की तरह बर्ताव नहीं करते थे। वहां पर उनके अधिकार ना के बराबर थे और यदि थे भी तो वे एग्रीमेंट के साथ बंधे हुए थे और इतने पढ़े-लिखे भी नहीं थे कि अपने अधिकारों को समझ सकें। उन वीराने द्वीपों में इनका जमकर शोषण किया जाता था।
         इस किताब में इन लोगों का इतिहास है, उन परिस्तिथियों का वर्णन है जिसने इन्हें पलायित होने पर मजबूर किया और साथ ही साथ एक नयी तरह की संस्कृति के उद्गम व विकास की यात्रा भी है। किताब में कुछ सवाल पूछे गए हैं, जैसे जातिवाद जिसकी जड़ें भारत में अभी भी चारों तरफ पसरी हुई हैं, आखिर इन सुदूर देशों व द्वीपों में ये जातिवाद कैसे ख़त्म हो गया वो भी इन मजदूर वर्ग के लोगों के द्वारा, जो पढ़े लिखे भी नहीं थे ? और भारत मजदूरों के लिए बेहतर विकल्प क्यों था ? इन सभी सवालों के जवाब आगे चलकर मिल जाते हैं।
         किताब को पढ़ते वक़्त पता चलता है कि कैसे कुछ एजेंट जिन्हें अरकाटी कहा जाता था, लोगों को बहला-फुसला कर अपने साथ ले जाते थे। ये एजेंट लोगों को कोलकाता ले आते थे जहाँ पर इन्हें डिपो में रखा जाता था, वहां से इन्हें जहाजों पर बिठाकर अलग-अलग द्वीपों पर भेज दिया जाता था। इस किताब में रियूनियन द्वीप, मारीशस, फिजी, गुयाना, ट्रिनिडाड, टोबैगो, जमैका, सूरीनाम, यूगांडा के अलावा और भी अन्य द्वीपों के गिरमिटियों की कथा कही गयी है। इसके साथ ही सिक्खों के प्रवास को लेकर भी एक अध्याय समर्पित है। कई जगहों पर माहौल एक जैसा था तो कुछ जगहों पर बिल्कुल ही अलग। कहीं पर मजदूरों का शोषण बहुत ज्यादा हुआ तो कहीं पर ज्यादे से थोड़ा कम। द्वीपों के साथ- साथ मजदूरों का शोषण जहाजों पर भी होता था, खासकर महिलाओं का। जहाज पर गोरे अधिकारी, डॉक्टर, सरदार सभी महिलाओं के साथ जबरदस्ती करते थे। हालांकि उनमे कुछ ऐसे भी थे जो मजदूरों की वास्तव में मदद करते थे। ऐसा नहीं है कि मजदूर अपने विरुद्ध हो रहे शोषण का विद्रोह नहीं करते थे। यहाँ पर कई ऐसी घटनाओं का जिक्र है जहां पर मजदूरों ने संघटित होकर विद्रोह किया और कुछ अधिकारीयों को जान से भी मार डाला। ऐसा ही महिलाओं ने भी किया। लेकिन ज्यादातर विद्रोहों को बलपूर्वक दबा दिया जाता था।
        जब भारत से लाये गए गिरमिटिया इन द्वीपों पर रहने लगे तो उनकी संस्कृतियों में भी कुछ बदलाव आया। कुछ चीजें वैसी ही रहीं तो कुछ बदल गयी। इनकी भाषाओं में कुछ स्थानीय शब्द जुड़ गए। संगीत ने भी नया रूप लिया जिसे “चटनी म्यूजिक” के नाम से जाना गया। कुछ नए समुदायों ने भी जन्म लिया। इस किताब में जमैका के ‘रस्ताफेरियन’ समुदाय का भी जिक्र है। इस समुदाय के लोगों ने हिन्दू साधुओं की तरह बालों में जटा बनाना शुरू किया। जिसे बॉब मार्ले जैसे रस्ताफेरियन ने लोकप्रिय बनाया।
        भले ही लोगों को अपने देश से विस्थापित होने का का दुःख था, लेकिन इस विस्थापन से उन्हें कुछ फायदे भी हुए। जिसमे जाति-प्रथा का ख़त्म होना व लोगों का समृद्ध होना भी शामिल है। जैसे किताब में एक जगह एक नवयुवक का जिक्र आता है, जो बिहार के किसी गाँव से निकलकर सुदूर देश में मजदूरी करने जाता है और कुछ साल मजदूरी कर के वहां पर एक जमीन खरीदता है। धीरे-धीरे वो वहां पर एक बड़ा जमींदार बन जाता है। इसके साथ ही साथ वह दूसरे लोगों को भी ऊपर उठाता है। आज जहाँ बिहार का उसका गाँव अभी भी बहुत अच्छी हालत में नहीं है, वहीँ पर उसने उस दूसरे देश में एक शहर ही बसा दिया है और उसके वहां पर कई व्यवसाय चल रहे हैं। लेकिन फिर भी हम समृद्धी को देखते हुए उनके शोषण के दर्द को दरकिनार नहीं कर सकते। क्योंकि उन लोगों ने वहां पर जो सहा, जो झेला वो मामूली नहीं था।