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Thursday, 14 December 2017

आम आदमी के जीवन को दर्शाता सिनेमा


सिनेमा, मनोरंजन का एक बेहतरीन माध्यम। जब भी मूड खराब हो या खाली समय में कुछ करने के लिए ना हो, तो हम सभी के दिमाग में पहला खयाल फिल्में देखने का ही आता है। मूड को ठीक करने के मामले में ये कारगर भी साबित होता है। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी भी होती हैं, जो अपने पीछे एक सवाल छोड़ जाती हैं। ये वो फिल्में होती हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। इन फिल्मों का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन ही नहीं बल्कि 'कुछ' कहना भी होता है। कभी ये फिल्में किसी इंसान के आत्मीय दर्द को बयाँ करती हैं, तो कभी हमारे सिस्टम व समाज के रवैये पर चोट करती हैं।

बचपन से जिस तरह की फिल्में मैं देखता आया हूँ, उसका मुख्य केंद्र बिंदु मनोरंजन ही रहा है। वही 'लार्जर दैन लाईफ' वाली फिल्में, जिसका हमारे वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं होता। लेकिन पिछले एक दो सालों में जिस तरह के सिनेमा से मेरा परिचय हुआ है, वे सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से बनायीं गयी फिल्में नहीं थी। बल्कि उनकी कहानी में यथार्थ नजर आता है। ' एक डाॅक्टर की मौत ' को देखने से पहले मैं नहीं जानता था कि आर्ट फिल्म क्या होती है, पैरेलल सिनेमा क्या होता है। इसके पहले तो हमें बस बाॅलीवुड, हाॅलीवुड और साउथ इंडियन सिनेमा के बारे में ही पता था। इसे देखने के बाद पता चला कि किसी भी फिल्म में मुख्य किरदार हीरो या हीरोईन नहीं, बल्कि कहानी भी हो सकती है।

मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, तपन सिन्हा, गोविन्द निहलानी और भी न जाने कितने ऐसे फिल्मकारों के नाम है; जिन्होंने काॅमर्शियल फिल्मों से इतर हटकर बेहतरीन यथार्थपरक फिल्में बनायी हैं। यदि पैरेलल सिनेमा के किरदारों की बात की जाए, तो हम स्मिता पाटिल, शबाना आजमी व नसीरुद्दीन शाह के योगदान को कैसे भूल सकते हैं। इन्होंने भारतीय सिनेमा के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है और अपनी अदाकारी से सबको प्रभावित किया है।

ऐसा नहीं है कि पहले ऐसी फिल्में नहीं बनती थीं। 60 के दशक के पहले हमारे सिनेमा में पैरेलल व कामर्शियल का बँटवारा नहीं था। उस समय फिल्में सिर्फ अच्छी या बुरी ही होती थीं। उस दौर की फिल्मों को यदि याद किया जाये, तो गुरूदत्त की 'प्यासा', 'कागज के फूल' , महबूब खान की 'मदर इंडिया', सत्यजीत रे की 'पाथेर पांचाली' इसी तरह की ही फिल्में थीं। इन सब के अलावा वी. शांताराम, ऋषिकेश मुखर्जी, विमलराय, ऋत्विक घटक भी यथार्थपरक फिल्में बनाने के लिए ही जाने जाते हैं। लेकिन 60 के दशक के बाद ऐसी फिल्मों का बनना लगभग बंद ही हो गया था। उस दौरान फिल्मों में बस मसाला डाला जा रहा था और शायद लोगों की भी डिमांड उस वक्त यही रही हो। ऐसा नहीं था कि 60 के दशक के बाद की फिल्में अच्छी नहीं थी। लेकिन वो समाज को कुछ दर्शा नहीं रही थी।

1968 में जब मृणाल सेन ने 'भुवनशोम' बनायी, तो भारतीय सिनेमा में आर्ट फिल्मों ( पैरेलल सिनेमा ) की नींव पड़ी और इसने एक नये आंदोलन का शुभारंभ किया। पूरी फिल्म इंडस्ट्री दो भागों में बँट गयी। एक तरफ लोगों को भरपूर मनोरंजन परोसने वाला मेनस्ट्रीम (कामर्शियल) सिनेमा था, तो वहीं दूसरी तरफ आम जन की जिंदगी से रूबरु कराने वाला पैरेलल सिनेमा। दोनों अपने-अपने रास्ते पर आगे बढ़े, लेकिन यहाँ पर प्रोड्यूसर्स व डिस्ट्रीब्यूटर्स की पहली पसंद मेनस्ट्रीम सिनेमा ही था। फिर भी श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकारों ने मुख्यधारा में रहकर कभी फिल्में नहीं बनायी। ऐसे फिल्मकारों ने वही बनाया, जो वे बनाना चाहते थे और उस समय कुछ हद तक सरकार ने भी आर्ट फिल्मों को प्रोत्साहित किया। भले ही ये फिल्में चली न हों, लेकिन इन्होंने अपनी कहानी से क्रिटिक्स व दर्शकों के एक तबके को प्रभावित तो जरूर किया। 
यदि हम 21वीं सदी के पैरेलल सिनेमा की बात करें, तो नीरज घेवान, आनंद गाँधी, रजत कपूर जैसे फिल्मकारों का नाम सामने आता है। नीरज घेवान द्वारा निर्देशित 'मसान' ने तो कांस फिल्म फेस्टिवल्स में भी अपनी छाप छोड़ी थी। अब हालात थोड़े बदलते हुए दिखायी दे रहे हैं और दर्शकों की डिमांड भी बदलती जा रही है। आज के दर्शक 'बिना आधार, केवल मनोरंजन' वाले सिनेमा को उतना महत्व नहीं दे रहे हैं। बल्कि अच्छे कंटेट को स्वीकार किया जा रहा है। अब पैरेलल सिनेमा बनकर एक कोने में यूँ ही पड़ा नहीं रहता, बल्कि वो आम दर्शकों तक भी पहुँच रहा है। 'दृश्यम फिल्म्स' जैसे प्रोडक्शन हाऊस ने भी इस दिशा में एक बेहतरीन कदम उठाया है। इसके बैनर तले बनी सारी फिल्में एक अच्छे सिनेमा का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।