Thursday, 14 December 2017

आम आदमी के जीवन को दर्शाता सिनेमा


सिनेमा, मनोरंजन का एक बेहतरीन माध्यम। जब भी मूड खराब हो या खाली समय में कुछ करने के लिए ना हो, तो हम सभी के दिमाग में पहला खयाल फिल्में देखने का ही आता है। मूड को ठीक करने के मामले में ये कारगर भी साबित होता है। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी भी होती हैं, जो अपने पीछे एक सवाल छोड़ जाती हैं। ये वो फिल्में होती हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। इन फिल्मों का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन ही नहीं बल्कि 'कुछ' कहना भी होता है। कभी ये फिल्में किसी इंसान के आत्मीय दर्द को बयाँ करती हैं, तो कभी हमारे सिस्टम व समाज के रवैये पर चोट करती हैं।

बचपन से जिस तरह की फिल्में मैं देखता आया हूँ, उसका मुख्य केंद्र बिंदु मनोरंजन ही रहा है। वही 'लार्जर दैन लाईफ' वाली फिल्में, जिसका हमारे वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं होता। लेकिन पिछले एक दो सालों में जिस तरह के सिनेमा से मेरा परिचय हुआ है, वे सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से बनायीं गयी फिल्में नहीं थी। बल्कि उनकी कहानी में यथार्थ नजर आता है। ' एक डाॅक्टर की मौत ' को देखने से पहले मैं नहीं जानता था कि आर्ट फिल्म क्या होती है, पैरेलल सिनेमा क्या होता है। इसके पहले तो हमें बस बाॅलीवुड, हाॅलीवुड और साउथ इंडियन सिनेमा के बारे में ही पता था। इसे देखने के बाद पता चला कि किसी भी फिल्म में मुख्य किरदार हीरो या हीरोईन नहीं, बल्कि कहानी भी हो सकती है।

मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, तपन सिन्हा, गोविन्द निहलानी और भी न जाने कितने ऐसे फिल्मकारों के नाम है; जिन्होंने काॅमर्शियल फिल्मों से इतर हटकर बेहतरीन यथार्थपरक फिल्में बनायी हैं। यदि पैरेलल सिनेमा के किरदारों की बात की जाए, तो हम स्मिता पाटिल, शबाना आजमी व नसीरुद्दीन शाह के योगदान को कैसे भूल सकते हैं। इन्होंने भारतीय सिनेमा के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है और अपनी अदाकारी से सबको प्रभावित किया है।

ऐसा नहीं है कि पहले ऐसी फिल्में नहीं बनती थीं। 60 के दशक के पहले हमारे सिनेमा में पैरेलल व कामर्शियल का बँटवारा नहीं था। उस समय फिल्में सिर्फ अच्छी या बुरी ही होती थीं। उस दौर की फिल्मों को यदि याद किया जाये, तो गुरूदत्त की 'प्यासा', 'कागज के फूल' , महबूब खान की 'मदर इंडिया', सत्यजीत रे की 'पाथेर पांचाली' इसी तरह की ही फिल्में थीं। इन सब के अलावा वी. शांताराम, ऋषिकेश मुखर्जी, विमलराय, ऋत्विक घटक भी यथार्थपरक फिल्में बनाने के लिए ही जाने जाते हैं। लेकिन 60 के दशक के बाद ऐसी फिल्मों का बनना लगभग बंद ही हो गया था। उस दौरान फिल्मों में बस मसाला डाला जा रहा था और शायद लोगों की भी डिमांड उस वक्त यही रही हो। ऐसा नहीं था कि 60 के दशक के बाद की फिल्में अच्छी नहीं थी। लेकिन वो समाज को कुछ दर्शा नहीं रही थी।

1968 में जब मृणाल सेन ने 'भुवनशोम' बनायी, तो भारतीय सिनेमा में आर्ट फिल्मों ( पैरेलल सिनेमा ) की नींव पड़ी और इसने एक नये आंदोलन का शुभारंभ किया। पूरी फिल्म इंडस्ट्री दो भागों में बँट गयी। एक तरफ लोगों को भरपूर मनोरंजन परोसने वाला मेनस्ट्रीम (कामर्शियल) सिनेमा था, तो वहीं दूसरी तरफ आम जन की जिंदगी से रूबरु कराने वाला पैरेलल सिनेमा। दोनों अपने-अपने रास्ते पर आगे बढ़े, लेकिन यहाँ पर प्रोड्यूसर्स व डिस्ट्रीब्यूटर्स की पहली पसंद मेनस्ट्रीम सिनेमा ही था। फिर भी श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकारों ने मुख्यधारा में रहकर कभी फिल्में नहीं बनायी। ऐसे फिल्मकारों ने वही बनाया, जो वे बनाना चाहते थे और उस समय कुछ हद तक सरकार ने भी आर्ट फिल्मों को प्रोत्साहित किया। भले ही ये फिल्में चली न हों, लेकिन इन्होंने अपनी कहानी से क्रिटिक्स व दर्शकों के एक तबके को प्रभावित तो जरूर किया। 
यदि हम 21वीं सदी के पैरेलल सिनेमा की बात करें, तो नीरज घेवान, आनंद गाँधी, रजत कपूर जैसे फिल्मकारों का नाम सामने आता है। नीरज घेवान द्वारा निर्देशित 'मसान' ने तो कांस फिल्म फेस्टिवल्स में भी अपनी छाप छोड़ी थी। अब हालात थोड़े बदलते हुए दिखायी दे रहे हैं और दर्शकों की डिमांड भी बदलती जा रही है। आज के दर्शक 'बिना आधार, केवल मनोरंजन' वाले सिनेमा को उतना महत्व नहीं दे रहे हैं। बल्कि अच्छे कंटेट को स्वीकार किया जा रहा है। अब पैरेलल सिनेमा बनकर एक कोने में यूँ ही पड़ा नहीं रहता, बल्कि वो आम दर्शकों तक भी पहुँच रहा है। 'दृश्यम फिल्म्स' जैसे प्रोडक्शन हाऊस ने भी इस दिशा में एक बेहतरीन कदम उठाया है। इसके बैनर तले बनी सारी फिल्में एक अच्छे सिनेमा का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

Sunday, 29 October 2017

परिवर्तन की यात्रा

एक समय था, जब कुछ नहीं था। ना जीव, ना पेड़ पौधे और ना ही रोशनी। फिर शुरूआत हुयी जीवन की। पेड़-पौधे आये, जानवर आये, मनुष्य आये। हम मनुष्यों ने जीना सीखा, रहना सीखा, खेती करना सीखा और उन सभी चीजों को सीखते गये; जिसकी हमें जरूरत थी। धीरे-धीरे हममें बदलाव आता गया और हम आगे बढ़ते रहे। बदलाव के इस चरण में हमारी बुद्धि का भी विकास होता रहा और आस-पास के चीजों को समझने की हमारी समझ बढ़ती गयी। हमने प्रकृति को अपने हिसाब से बदलना शुरू किया या फिर ऐसा कह लें, उसका इस्तेमाल करना शुरू किया। फिर हमारी बुद्धि और भी खुली। हमने लोगों का समूह बनाया और फिर शुरू हुआ बँटवारे का खेल।

लोगों द्वारा बनाये गये समूहों ने अलग-अलग इलाकों पर कब्जा करना शुरू किया और 'अधिकार' की उत्पत्ति हुयी। इस 'अधिकार' ने न जाने कितने शब्दों को जन्म दिया - 'युद्ध', 'लालच', 'घृणा' , 'छल' और भी ऐसे बहुत से शब्द। चीजें बदलती रहीं, वक्त बदलता रहा और सबसे बड़ी बात हम मनुष्यों के विचार बदलते रहे। इन बदलते हुए विचारों के परिणाम स्वरूप कुछ ने 'उत्पत्ति' का रहस्य जानना चाहा, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए साधन ढूँढने शुरू कर दिये। इन दोनों ही तरह के लोगों ने अपने-अपने क्षेत्रों में कामयाबी पायी। पहले ने साक्ष्य ढूँढे, समय और परिवर्तन का विश्लेषण किया और फिर कुछ नियम बनाये और नियमों को आने वाली पीढ़ियों को सौंपा। जिन लोगों को ऐसा लगता था कि उन्हें अपने अस्तित्व को बचाये रखना है, उन लोगों ने नींव डाली नए मान्यताओं की, नए धर्मों की। ऐसा नहीं है कि इन लोगों ने नियम नहीं बनाये, नियम तो इन लोगों ने भी बनाये। लेकिन इसका इस्तेमाल बाकी लोगों को डराने के लिए किया गया, अपनी साख को बचाये रखने के लिए किया गया। कहीं ना कहीं इन मान्यताओं और धर्मों की जरूरत भी थी, क्योंकि सबके विचार एक जैसे नहीं थे। ये धर्म उन लोगों के बड़े काम आये, जो जिज्ञासु प्रवृत्ति के नहीं थे। इन सब के बीच भाषा और शैली ने भी अपनी-अपनी भूमिकायें निभायीं।

वक्त ने फिर अपनी रफ्तार पकड़ी और परिवर्तन की आँधी एक बार फिर जोरों से चली। हम अब पूरी तरह से बदल चुके थे। जिस धर्म की शुरूआत, लोगों के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए की गयी थी, उसी धर्म ने लोगों के अस्तित्व को खतरे में डालना शुरू कर दिया। लोग धर्म को लेकर लड़ने लगे, सब ने अपने-अपने धर्मों को महान बताना शुरू किया। अब मनुष्य सिर्फ दो प्रकार के नहीं रह गये थे। इस बदलाव ने अलग-अलग तरह के लोगों को जन्म दिया। पहले दो तरह के लोग तो अब भी मौजूद थे। लेकिन इसके अलावा कुछ और तरह के लोग भी आये। जैसे कि वे, जिसे सिर्फ दूसरे लोगों पर राज करना था, दूसरे वे जिन्हें केवल धन का मोह था। इन लोगों का ना ही धर्म के प्रति कोई आदर था और ना ही ये जिज्ञासु थे।

समय के साथ-साथ परिवर्तन की गति बढ़ती ही जा रही थी और हमने उसी दर के साथ विकास भी किया। हमने अपनी सुविधाओं के लिए बहुत सी वस्तुओं का निर्माण किया और प्रकृति का पूर्ण दोहन किया। हमने मशीने बनायीं, पूरी पृथ्वी को खत्म करने वाले हथियार बनाये, जंगलों को काटकर बिल्डिंगें बनायी। प्रकृति ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी, लेकिन हममें से कुछ भले मानुषों को कहाँ समझ आने वाला था। प्रकृति को तबाह करने का काम उसी तरह चलता रहा।

तब से लेकर अब तक हम बहुत बदल चुके हैं, बहुत ही ज्यादा। आज हम पूरी तरह से ही मशीनों पर निर्भर है। हालात ऐसे हैं, हमारे चारों तरफ प्रकृति से ज्यादा मानव निर्मित वस्तुएँ उपलब्ध हैं। आज हम एक ऐसे संसार में रह रहे हैं, जहाँ लोग सच से ज्यादा झूठ पर यकीन करते हैं। यहाँ पर विश्वास से ज्यादा अंधविश्वास है। अब तो लोग धर्म के नाम पर पूरी पृथ्वी को तबाह करने के लिए आतुर हैं।

Tuesday, 24 October 2017

शिक्षा पद्धति में बदलाव की जरूरत

भारत की शिक्षा पद्धति में आखिर इतनी खामियाँ क्यों हैं ? यहाँ पर ज्ञान से ज्यादा डिग्री को इतनी तवज्जो क्यों दी जाती है ? ऐसे ही अनेक उभरते हुए प्रश्नों के पीछे कहीं ना कहीं हम स्वयं जिम्मेदार हैं। एक जमाना था, जब भारतीय शिक्षा प्रणाली की दुनिया भर में धाक थी। तक्षशिला, नालंदा जैसे विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों को अपनी तरफ आकर्षित करते थे; ठीक उसी तरह जिस तरह आज आॅक्सफोर्ड और हार्वर्ड यूनिवर्सिटीज विश्व भर के छात्रों को अपनी ओर खींचती हैं। लेकिन आज का परिदृश्य बिल्कुल ही बदल गया है। एक तो विश्व रैकिंग के मामले में हमारे देश की संस्थायें स्थान नहीं बना पाती और दूसरी ओर बाहर से आये पढ़ने वाले छात्रों की संख्या हमारे यहाँ न के बराबर है। यदि शोध की बात की जाए, तो फिर पूछना ही नहीं है। कुछ संस्थानों को छोड़ दिया जाए; जैसे की IISc, IITs, तो बाकी के संस्थानों में न तो शोध के लिए जरूरी उपकरण उपलब्ध हैं और ना ही फैकल्टी की इसमें कोई रूचि दिखायी देती है। वो बस अपनी नौकरी करते हैं और तनख्वाह वसूलते हैं। वैसे ये लोग करें भी क्या, इनका ज्ञान जो इनके आड़े आ जाता है। जो इन्हें बताता है कि हमारे देश में शोध की जरूरत ही नहीं है। इसके लिए तो कुछ चुनिंदा संस्थान और विश्व के बाकी संस्थान तो हैं ही।
        
        इन शिक्षण संस्थानों को यदि हम रैंकिंग के नजरिये से ना भी देखें, तो भी हमारे यहाँ शिक्षा की गुणवत्ता बिल्कुल ही खराब है। यहाँ पर छात्र बस किसी भी तरह परीक्षा में पास होना चाहते हैं और वे ऐसा करने के लिए तथ्यों को समझने की बजाये रटते हैं। भले ही उनको उस विषय से सबंधित बातें समझ में आयीं हों या ना आयीं हों, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। अभिवावक व शिक्षकों की भी इसमें उतनी ही भागीदारी है, जितनी की छात्रों की। क्योंकि वे भी उन्हें परीक्षा में आये गये नम्बरों के आधार पर ही आँकते हैं। इस बात की संभावना है कि किसी परीक्षा में उच्च स्थान प्राप्त करने वाले छात्र की अपने विषय पर मजबूत पकड़ ना हो, लेकिन उसी परीक्षा में औसत या कम अंक लाने वाला छात्र, टाॅप करने वाले छात्र से बेहतर जानकारी रखता हो।
         सबसे बड़ी बात तो नौकरी की है। ये सही है कि भविष्य में जीवन निर्वाह के लिए हमारा आर्थिक रूप से सक्षम होना जरूरी है। लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि सभी छात्रों का एकमात्र लक्ष्य, सिर्फ नौकरी पाना ही हो और वे शिक्षा इसीलिए ग्रहण करें, ताकि उन्हें एक अच्छी नौकरी मिल सके। बहुत से अभिवाक या छात्र, शिक्षा को नौकरी पाने का एक जरिया भर मानते हैं, जबकि ऐसा मानना पूर्ण रूप से गलत है। छात्रों को शुरू से ही ये बताया जाता है कि यदि वो मन लगाकर नहीं पढ़ेगे, तो आगे चलकर अच्छी नौकरी नहीं मिलने वाली, शादी नहीं होने वाली और घर नहीं बनने वाला। इन सब के चक्कर में शिक्षा का अर्थ ही बदलता जा रहा है। शिक्षा हम सभी का एक अधिकार है, और ये अधिकार सिर्फ इसलिए नहीं है कि हमें आगे चलकर लाईफ में सेटल होना है; बल्कि ये अधिकार इसलिए भी है, क्योंकि हम समाज व देश के विकास में भागीदार हो सकें। दुनिया को व लोगों को समझ सकें, नयी चीजों का आविष्कार कर सकें। जब तक अभिवावकों व छात्रों के मन में शिक्षा को लेकर विचार नहीं बदलेंगे, तब तक लोगों को शिक्षा का महत्व नहीं समझ में आने वाला है।

हमें यदि अपने देश की शिक्षण पद्धति में सुधार लाना है, तो बदलाव शुरूआती स्तर से करनी होगी। प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों की शिक्षण व्यवस्था को बदलना होगा। हमें Quantity( Marks) की जगह Quality( ज्ञान) पर जोर देना होगा। ऐसा नहीं है कि Quality Education पर ध्यान देने वाले विद्यालय हमारे देश में नहीं हैं। सोनम वांगचूक द्वारा स्थापित SECMOL जैसै संस्थानों का ध्यान पूरी तरह से Quality Education पर ही है और ऐसे संस्थान हमारे देश के बाकी विद्यालयों व विश्वविद्यालयों के लिए एक अच्छा उदाहरण साबित हो सकते हैं। बस जरूरत है तो हम सभी को अपने विचारों को बदलने की और यदि विचार बदले, तो देश जरूर बदलेगा।
  

Sunday, 24 September 2017

भारत में काॅफी का विकास

सुबह उठने के बाद हम सभी को चाय या काॅफी का इंतजार रहता ही है। हममें से बहुत लोगों को यदि सुबह-सुबह ये पेय न मिले, तो दिमाग फ्रेश नहीं होता। जो लोग रात भर काम करते हैं, उनके लिए भी काॅफी किसी वरदान से कम नहीं है। यहाँ पर लोग बरिस्ता जैसे हाई क्वालिटी के कैफे में भी काॅफी पीते हैं और घर पर एक रूपये के पैकेट वाली कॉफी भी बनाते हैं। भारत में काॅफी मुख्य पेय पदार्थों में से एक है। लेकिन 17वीं सदी के पहले भारत में काॅफी का नामोंनिशान तक मौजूद नहीं था। भारत में काॅफी लाने का श्रेय एक सूफी संत बाबा बूदान को जाता है। बाबा बूदान जब हज करके भारत वापस आ रहे थे, तो उन्होंने मोका यमन के पोर्ट से सात काॅफी बीन्स लिए और उसे लेकर भारत आ गये। इन काॅफी बीन्स को कर्नाटक के चिक्कामगलुर जिले में चंद्रगिरी की पहाड़ियों पर उगाया गया और आजकल इसे बाबा बुदान गिरी या बाबा बुदान फाॅरेस्ट के नाम से जाना जाता है। 
       
        बाबा बुदान ने 17वीं सदी में सात काॅफी बीन्स लाकर एक नयी शुरूआत की थी, क्योंकि उस समय काॅफी पर अरब साम्राज्य का एकाधिकार था और वे उन्हें सिर्फ roasted या boiled form में ही बाहर ले जाने देते थे। वे नहीं चाहते थे कि उनके अलावा कोई दूसरा देश काॅफी का व्यापार करे। बाबा बुदान के संत होने की वजह से उन्हें इन काॅफी बीन्स को भारत लाने में कोई दिक्कत नहीं हुयी। उनके द्वारा काॅफी को लाने के बाद, कर्नाटक के अलावा तमिलनाडु व केरल में भी बड़े पैमाने पर काॅफी के बागान लगाये गये। भारत में उगायी जाने वाली काॅफी दुनिया भर में सबसे अच्छी गुणवत्ता की काॅफी मानी जाती है, उसका कारण यह है कि इसे छाया में उगाया जाता है।
     
 काॅफी शब्द, अरबी शब्द 'कावा' से बना है, जिसका अर्थ वायु होता है। सबसे पहले इथियोपिया के लोगों ने काॅफी के बारे में जाना था। ऐसा माना जाता है कि 9वीं सदी में इथियोपिया में रहने वाले काल्दी नाम के माली ने देखा कि उसकी बकरियाँ काॅफी खाकर अधिक ऊर्जावान रहती हैं। इसके बाद तो काॅफी इथियोपिया से होते हुए यमन में पहुँचा और फिर वहाँ से पूरी दुनिया में कॉफी का विस्तार हुआ। बहुत से लोगों ने तो काॅफी का इस्तेमाल रात भर जगने के लिए भी किया, क्योंकि उन्हें काॅफी पीने से नींद नहीं आती थी। वैसे आज भी काॅफी या चाय का इस्तेमाल रात को जगने के लिए किया जाता है। मोका यमन में 'ओमर' नाम के एक हकीम तो काॅफी का इस्तेमाल अपने मरीजों के लिए भी करते थे। 
        
         पहले भारत में काॅफी में शक्कर की जगह शहद का इस्तेमाल होता था। 17वीं और 18वीं सदी में अच्छी काॅफी की पहचान दूध के द्वारा की जाती थी और इस प्रकार की काॅफी को डिग्री काॅफी कहा जाता था। इसमें मिलाया गया दूध एकदम शुद्ध होता था और इस तरह का काॅफी पीना अमीर होने की पहचान माना जाता था।

     
  भारत में पहला काॅफी शाॅप, प्लासी की युद्ध के बाद कोलकाता में खोला गया। काॅफी की उत्पादकता व गुणवत्ता को बढ़ाने के उद्देश्य से भारत में पहला काॅफी रिसर्च सेंटर 1925 में चिक्कामगलुर जिले में बेलेहोनर के पास स्थापित किया गया। 1936 में भारतीय काॅफी हाऊस की पहली चेन की शुरूआत हुई और सबसे पहले इसे मुम्बई में खोला गया, फिर कोलकाता और केरल में भी इसके ब्रांचेस खोले गये। 1970 तक आते-आते भारत में काॅफी ने एक पूरा उद्योग खड़ा कर दिया था। काॅफी की इस जरूरत को महसूस करते हुए सन् 1942 में काॅफी बोर्ड की नींव रखी गयी। भारत का काॅफी बोर्ड, एक स्वायत्त निकाय है, जो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय; भारत सरकार के अधीन कार्य करता है।
       आज भारत में करीब 1,71,000 काॅफी के बागान हैं; जहाँ नौ लाख एकड़ की जमीन पर काॅफी ऊगायी जाती है। भारतीय दुनिया का छठे नम्बर का काॅफी पैदा करने वाला देश है। यहाँ पर पूरी दुनिया की 4.5% काॅफी ऊगायी जाती है। साल 2015 में भारत ने 349,980,000 kg काॅफी बीन्स का उत्पादन किया था। तो भारत में काॅफी की जो यात्रा सात बीन्स से शुरू हुयी थी, उसने आज बढ़कर एक बड़े कारोबार का शक्ल ले लिया है। 

                                                                                                 ( फोटो - विकिपीडिया )
     

Saturday, 23 September 2017

यथार्थ की तलाश : आँखों देखी

हमारे जीवन का सच क्या है? आखिर ऐसा क्या है जिस पर हम विश्वास कर लें। क्या हर वक्त, हर जगह विश्वास करना सही होता है? क्या हमें आँखें मूँद कर सब कुछ मान लेना चाहिए या फिर ढूँढनी चाहिए, वो वजह जिसके वजह से वो सच, सच बना है। ये तो सही बात है कि हम उस बात पर कैसे विश्वास करे लें, जो हमारी 'आँखों देखी' नहीं है। हमें बचपन से सिखाया गया है कि ये ऐसा है, ये वैसा है और ये तुम्हें मानना ही है, और मानना इसलिए नहीं है कि ये ऐसा है या फिर ऐसा होता होगा। बल्कि मानना इसलिए है कि लोग इसे ऐसा ही मानते आये हैं। भले ही उसका वास्तविक रूप वो हो ही न, जैसा उसे लोगों ने स्वीकार किया है। लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि हम हर एक चीज पर ही सवाल करें। कुछ इसी तरह के सवालों के जवाब तलाशती है, रजत कपूर की फिल्म 'आँखों देखी'। 
    
 इस फिल्म के मुख्य किरदार बाऊजी, जिसको संजय मिश्रा ने बड़ी संजीदगी के साथ निभाया है; ऐसे ही सवालों के जवाब पाने के लिए अपने अंदर झाँकते हैं। वो अपने आप को महसूस करने की कोशिश करते हैं और खुद को और दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं। लेकिन उनकी इस कोशिश को बाकी सब लोग पागलपन समझते हैं। कुछ उनकी नकल उतारते हैं, तो कुछ उन्हें चिढ़ाते हैं। लेकिन समझ कोई नहीं पाता है।
इस फिल्म का एक सीन बहुत ही अच्छा है; जब पंडित जी, बाऊजी को 'प्रसाद' देते हैं और बापूजी कहते हैं कि नहीं ये तो 'मिठाई' है। बाऊजी की ज़िन्दगी में सब कुछ एक ढर्रे पर नहीं चलता है, बल्कि वो तो अलग-अलग नाव में सवार होकर तैरते रहते हैं। यहाँ पर बाऊजी में उस इंसान की परछाई नजर आती है, जो यथार्थ से वाकिफ होना चाहता है, उसको जीना चाहता है। फिल्म के आखिरी सीन में बाऊजी इसी यथार्थ के पीछे भागते हुए नजर आते हैं और उस यथार्थ का अनुभव करते हैं। वो उड़ रहे होते हैं, उन्हें इसमें खुशी मिलती है। उनके ही शब्दों में उनकी इस खुशी को शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है।
        
इस फिल्म में मध्यवर्गीय समाज को बहुत ही करीब से दिखाया गया है। संयुक्त परिवार की उलझनों से लेकर बाहरी समाज की सोच तक को तक को रजत कपूर ने बड़े अच्छे ढंग से पर्दे पर उतारा है। यहाँ यही है कि कहीं कोई विचार किसी पर थोपे जा रहे हैं, तो कहीं किसी के विचारों का महत्व ही नहीं है।
      
 संजय मिश्रा को हम बाकी की फिल्मों में एक काॅमेडियन के दौर पर ही देखते आये हैं। जैसे कि वो All the best में 'Dhondu just chill' बोल कर के हँसाते हैं। लेकिन इस फिल्म में उन्होंने बिल्कुल इसके विपरीत काम किया है और एक आम इंसान के किरदार को पूरी तरह से जीवंत किया है। उनका अभिनय कहीं भी बनावटी नहीं लगता। हमें ये तो मानना ही पड़ेगा कि संजय मिश्रा उन कलाकारों में से हैं, जो कि हर तरह का किरदार निभा सकता है। संजय मिश्रा के अलावा रजत कपूर ने भी अपने सशक्त अभिनय की छाप छोड़ी है।
           
गीतों की बात की जाये तो वरूण ग्रोवर को तो शब्दों से खेलने में महारथ हासिल है। यहाँ पर भी उन्होंने इसका प्रदर्शन किया है। सागर देसाई ने भी उनका भरपूर साथ दिया है, जिनकी बनायी संगीत वरूण ग्रोवर के गीतों पर बिल्कुल फिट बैठती है। इसका एक गानी 'लागी नयी धूप' तो दिल को छू जाता है।
       

Friday, 22 September 2017

विज्ञान की समझ को आसान बनाते विज्ञान केंद्र

विज्ञान का संसार बहुत ही बड़ा है और ये विषय मानवीय सभ्यता के विकास के साथ-साथ कई रोचक तथ्यों को भी अपने आप में समेटे हुए है। जैसे कि इंद्रधनुष का बनना, सूर्य या चन्द्र ग्रहण का लगना और भी बहुत कुछ। वैसे तो हम अपने आस-पास हर वक्त विज्ञान से ही रुबरू रहते हैं, लेकिन विज्ञान द्वारा निर्धारित इन प्राकृतिक क्रियाओं को हर एक आम इंसान नहीं समझ पाता। विज्ञान की इसी समझ को आसान बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् द्वारा देश भर में 49 विज्ञान केंद्रों की स्थापना की गई। ये विज्ञान केंद्र आम लोगों को भी सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित करता है और उसके मन में भी विज्ञान के प्रति रूचि पैदा करता है।
    
  नई दिल्ली में प्रगति मैदान के पास भैरों मार्ग पर स्थित 'राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र' इन्हीं 49 विज्ञान केंद्रों में से एक है। विज्ञान से संबंधित प्राचीन काल की जानकारियों से लेकर 21वीं सदी के डिजिटल युग तक, हर कुछ देखने व सुनने को मिलेगा इस विज्ञान केंद्र में। यहाँ पर आप विज्ञान के प्रयोगों को खुद भी कर के देख सकते हैं, उपकरणों को छू सकते हैं और यहाँ आपको कोई कुछ नहीं बोलेगा। यहाँ आप ये देख सकते हैं कि कैसे पियानो को बिना छुए, बस हवा में हाथ घुमाने से ही पियानो बजने लगता है। दरअसल ये इंफ्रारेड किरणों के कारण होता है। वहाँ जाकर आप इन सब के पीछे छिपे संपूर्ण तथ्यों को भी जान सकते हैं।
        
 इस विज्ञान केंद्र में 'हमारी वैज्ञानिक और प्रोद्यौगिक धरोहर' नाम का एक सेक्शन है, जिसमें प्राचीन भारत के वैज्ञानिक विकास को दिखाया गया है। इस सेक्शन में अनेक भारतीय वैज्ञानिकों जैसे आर्यभट्ट, कणाद, नागार्जुन की उपलब्धियों को भी दर्शाया गया है। इसके अलावा शल्य चिकित्सा व सुश्रुत द्वारा बनाये गये उपकरणों के माॅडल भी यहाँ देखने को मिल जायेंगे। 


 इसके आगे 'मानव जीव विज्ञान' नाम का एक सेक्शन है, जहाँ हमारे शरीर से संबंधित अनेक जानकारियाँ दी गयी हैं। थोड़ा और आगे जाने पर प्रागैतिहासिक काल से भी जुड़ी चीजें देखने को मिलती हैं। 
       
       'सूचना का इतिहास' नामक एक सेक्शन में बहुत ही रोचक वस्तुएँ देखने को मिलती हैं। ये सेक्शन उन युवाओं को काफी मजेदार लगेगा, जो 20वीं सदी के अंत में पैदा हुए। क्योंकि पुराने जमाने कि बहुत सी ऐसी वस्तुएँ यहाँ रखी हुयी हैं, जो कि हमें उसी समय में लेकर चली जाती हैं। जैसे कि पहले के तार घर, लाईट हाउस, रेलवे स्टेशन के पुराने माॅडल, पुराने कैमरे, पुराने वाद्य यंत्र और भी बहुत कुछ। इस सेक्शन के आगे बढ़ने पर हम 'डिजिटल क्रांति' नाम के एक सेक्शन में प्रवेश करते हैं और ये सेक्शन डिजिटल दुनिया के विकास को प्रदर्शित करता है। यहाँ पर पहले के वो कम्यूटर भी रखे हुए हैं, जो कि आकार में बहुत बड़े होते थे और उनकी स्पीड कम होती थी। साथ ही साथ आजकल के आधुनिक कम्प्यूटर व स्मार्टफोन भी मौजूद हैं। इस सेक्शन में डिजिल इलेक्ट्राॅनिक्स से संबंधित कई कंपोनेन्ट्स जैसे IC(Integrated Circuit), transistors  के बारे में भी बताया गया है।
  
   इस सेक्शन के नीचे आने पर हमें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों के विकास की झलक देखने को मिलती है। इसके बाद का सेक्सन इतिहास व राजनीति से संबंधित है; जहाँ आॅडियो व विडियो के माध्यम से बहुत से नेताओं के भाषण, देश-दुनिया की तमाम जानकारियाँ देखने व सुनने को मिलती हैं।
      
 नई दिल्ली के अलावा कोलकाता, मुबंई, लखनऊ जैसे शहरों में भी इसी तरह के विज्ञान केंद्रों की स्थापना की गयी है। जहाँ पर विज्ञान को जानने व समझने के लिए मजेदार तरीकों का उपयोग किया गया है। लखनऊ के अलीगंज में स्थित 'आंचलिक विज्ञान नगरी' में आंतरिक प्रदर्शनी के अलावा बाहर खुले में भी विज्ञान के कई उपकरण रखे गये हैं, जो कि विज्ञान के नियमों को आसानी से समझाते हैं। यहाँ सबसे रोचक एक नल है जो कि हवा में लटका हुआ है और वहाँ से पानी लगातार गिरता ही रहता है। यहाँ आने वाले सभी पर्यटकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण का केंद्र यही नल है। अब इसके पीछे माँजरा क्या है, ये तो वहाँ जा कर ही पता लगेगा। 
       
       तो जो लोग विज्ञान के इस रोचक संसार को करीब से जीना चाहते हैं, उसे जानना व समझना चाहते हैं, इतिहास को जीवित रूप में देखना चाहते हैं, ऐसे लोगों को इन विज्ञान केंद्रों के दर्शन जरूर करने चाहिए और अपनी सोच व समझ को विकसित करना चाहिए।

Saturday, 9 September 2017

संस्कृत बोलता एक गांव....


हम सभी संस्कृत को एक भाषा के तौर पर जानते तो हैं, लेकिन उसका इस्तेमाल न के बराबर करते हैं। आज के समय में यदि कोई संस्कृत में बात करता दिख जाए, तो उसे एक अलग नजर से ही देखा जायेगा। लेकिन कर्नाटक के एक गाँव मत्तूर में लोग आज भी संस्कृत में ही बात करते हैं।
     

    संस्कृत पूरे विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है। प्राचीन भारत में मुख्य रूप से संस्कृत ही लिखी, पढ़ी व बोली जाती थी। वेद, ग्रंथ, पुराण व उपनिषद् ये सभी संस्कृत भाषा में ही लिखे गये। संस्कृत भाषा का प्रभाव विश्व की अन्य भाषाओं पर भी रहा है; जैसे कि अंग्रेजी का शब्द 'man', संस्कृत के शब्द 'मनु' से बना है। लेकिन समय के बदलने के साथ-साथ इस भाषा का महत्व कम होता चला गया और ये सिर्फ विद्यालयों व किताबों तक सिमट कर रह गयी। इन सब के बावजूद मत्तूर गाँव ने इस प्राचीन भाषा को आज भी ज़िन्दा रखा हुआ है। शिमोगा जिले में तुंगभद्रा नदी के किनारे बसे इस गाँव में हर एक इंसान संस्कृत बोलता नजर आ जायेगा। यहाँ पर संस्कृत बोलचाल की भाषा है; ठीक उसी तरह जैसे हिन्दी, भोजपुरी, गुजराती, बंगाली व अन्य भाषायें हैं।
       
     ऐसा माना जाता है कि मत्तुर भारत का आखिरी ऐसा गाँव है, जहाँ संस्कृत बोली जाती है। इस गाँव के सभी निवासी वैदिक जीवन व्यतीत करते हैं अर्थात् वो संस्कृत के ग्रंथों का सदैव पाठ करते हैं। यहाँ पर संस्कृत बोलने वाला शख्स कहीं भी और कभी भी देखा जा सकता है। दुकानदार और पंडित से लेकर छोटे बच्चे तक धड़ाधड़ संस्कृत बोलते हैं। और तो और, यहाँ पर तो कई लोग मोबाईल पर भी संस्कृत में बात करते दिख जायेंगे।
    संस्कृत बोलने की वजह से यह गाँव बाहरी लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। बहुत से लोग दूसरे शहरों से यहाँ संस्कृत सीखने आते हैं। मत्तूर के एक आचार्य के अनुसार, अब तो वे विदेशी लोगों को भी संस्कृत की शिक्षा दे रहे हैं; जो लोग इस गाँव में नहीं आ पाते, उन्हें 'skype'  पर शिक्षा दी जाती है। ये इस बात का प्रमाण है कि मत्तूर के निवासियों ने वैदिक परंपरा को तो बनाये ही रखा है, साथ में वो आजकल की technology से भी up-to-date हैं।
       शिक्षा के बाकी क्षेत्रों में भी मत्तूर पीछे नहीं है। यहाँ के लगभग हर परिवार में एक साॅफ्टवेयर इंजीनियर है और भी बहुत से छात्र मेडिकल, कला व विज्ञान के क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसके अलावा इस गाँव के कुछ व्यक्ति संस्कृत के प्रोफेसर के तौर पर भी विश्वविद्यालयों में कार्यरत हैं।
       
                                                                                                   ( फोटो- विकिपीडिया )