Saturday, 16 November 2019

ख्वाहिशों व प्रेम के अंतर्जाल में बुनी जनार्दन की कहानी : रॉकस्टार




" तू सबकी ज़िन्दगी उठा के देख ले, जितने भी हैं संगीतकार, गायक, आर्टिस्ट, पेंटर, राईटर। इन सबमें एक ऐसी चीज है, जो काॅमन मिलेगी तुझे......दु:ख, दर्द, आँसू। " इतना सुनकर जनार्दन निकल पड़ता है किसी ऐसे की तलाश में जो उसका दिल तोड़ दे। उसे हीर मिलती है, जो उसका दिल तोड़ती है और फिर वो बड़े नाटकीय अंदाज में अपने आप को बयाँ करता है। जैसे उसे कोई दुःख हो ही नहीं। फिर दोनों मिलते हैं, दोस्ती होती है और फिर लड़की शादी करके चली जाती है। लड़का घर के काम में लग जाता है और वो अपने संगीत से दूर हो जाता है। वही होता है जो सालों से होता आया है, एक ख्वाहिश को दबा दिया जाता है। पर लड़के का दिल तो अभी भी नहीं टूटता। दिल तो तब टूटता है, जब लड़के को चोरी के इंजाम में घर से बाहर निकाल दिया जाता है। यहाँ संगीत फिर साथ देने आता है, और जनार्दन बन जाता है जार्डन द राॅकस्टार। जार्डन वो नाम जिसे हीर ने ही उसे दिया था। हीर के लिए वो प्राग जाता है, वही सब होता है जब बिछड़े प्रेमी दोबारा मिलते हैं। लेकिन यहाँ राॅक्स्टार प्रेम के चक्कर में उग्र हो जाता है और वही करता है जो उसका दिल करता है और एक सेलेब्रिटी से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। जनार्दन को दर्द तो मिल गया और उसका सहारा लेकर उसने बहुत कुछ पा भी लिया। लेकिन उसके पास एक ऐसा दर्द भी है जिससे वो निकल नहीं पाता। उस दर्द के आगे सब कुछ छोटा है, कोई नेम नहीं, कोई फेम नहीं, कोई पैसा नहीं।

इम्तियाज अली की स्टोरीटेलिंग लाजवाब है, वो कहानी को परत दर परत बुनते हैं और हर एक परत एक दूसरे से जुड़ा हुआ होता है। उनके निर्देशन की शैली कमाल की है और स्थानों का चुनाव भी शानदार है। इनकी फिल्म में मस्ती, खुशी, दु:ख, दर्द और प्रेम सब कुछ सही सही मात्रा में मिल जायेगा। रणबीर कपूर ये वो नाम है, जिसने एक बड़े फिल्मी परिवार से आने के बावजूद अपना मुकाम अपने दम पर हासिल किया है। इन्होंने सबको दिखा दिया है कि अच्छा मुकाम हासिल करने के लिए टैलेंट की भी अहमियत होती है। ये भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के उन स्टार्स में से हैं, जो स्टार होने के साथ-साथ एक अच्छे एक्टर भी हैं। इस बात का सबूत इस फिल्म को देखने के बाद पता चल जायेगा। इस फिल्म में उन्होंने कई शेड्स में अपने कलाकारी का प्रभाव छोड़ा है।  पीयूष मिश्रा तो पीयूष मिश्रा है, वो किसी भी फिल्म में हों चाहे कितने भी देर के लिए हो, उनकी अदाकारी हमेशा ही प्रभावित करती है। फिल्म में शम्मी कपूर का कुछ सीन्स में होना फिल्म में चार चाँद लगा देता है।

यदि हम इस फिल्म में से संगीत को और गानों को निकाल दे, तो ये फिल्म वैसी ही हो जायेगी जैसे बिना दिल और फेफड़ों के कोई बेजान शरीर होता है। इसीलिए इस पूरी फिल्म में इनकी बहुत बड़ी भूमिका है। इरशाद कामिल और ए.आर. रहमान की जुगलबंदी ने कमाल कर दिया है।  इसमें कोई अकेला ऐसा गाना नहीं है, जो कहा जा सके कि ये यहाँ पर नहीं होता तो भी अच्छा होता। 'कुन फाया कुन' एक ऐसा गीत है जो खुद को नि:स्वार्थ बनाता है, इसको सुनते हुए एक आजादी की भावना प्रकट होती है...ऐसी आजादी जो हमारे नहीं होने में है।

Thursday, 7 November 2019

गिरमिटियों के संघर्ष की कहानी कहती : कुली लाइन्स


गिरमिटिया, स्कूल के दिनों में जब ये नाम सुना था तो इनके बारे में सिर्फ इतना पता था कि ये वो लोग थे जिनको देश के बाहर मजदूरी करने के लिए ले जाया गया और वहां पर उनका शोषण किया गया। उस समय ना ही हमने इसके पीछे की परिस्थितियों को जानने की कोशिश की और ना ही हमारे अन्दर इसे लेकर कोई उत्सुकता थी, क्योंकि तब ये गिरमिटिया हमारे लिए सिर्फ एक syllabus का हिस्सा भर थे। लेकिन अब जब इतिहास को जानने व समझने की थोड़ी उत्सुकता बढ़ चुकी है तो लगता है की हमें इनके बारे में जानना चाहिए, क्योंकि इनके बिना हमारा इतिहास अधूरा है।
        प्रवीण कुमार झा द्वारा लिखी गयी किताब “कुली लाइन्स” इन्हीं गिरमिटियों के बारे में है। ये उन भारतीयों की कहानी कहती है जो आज से दो सौ साल पहले भारत से ले जाकर विश्व के कोने-कोने में पटक दिये गए। जिन्हें वहां पर सिर्फ मशीन समझा जाता था और कुछ नहीं। भले ही इन मजदूरों के वंशज आज वहां अच्छी-खासी स्थिति में हों, लेकिन इन मजदूरों ने वहां पर काफी जुल्म सहे थे। अंग्रेज, फ्रेंच और डच लोग इनके साथ इंसानों की तरह बर्ताव नहीं करते थे। वहां पर उनके अधिकार ना के बराबर थे और यदि थे भी तो वे एग्रीमेंट के साथ बंधे हुए थे और इतने पढ़े-लिखे भी नहीं थे कि अपने अधिकारों को समझ सकें। उन वीराने द्वीपों में इनका जमकर शोषण किया जाता था।
         इस किताब में इन लोगों का इतिहास है, उन परिस्तिथियों का वर्णन है जिसने इन्हें पलायित होने पर मजबूर किया और साथ ही साथ एक नयी तरह की संस्कृति के उद्गम व विकास की यात्रा भी है। किताब में कुछ सवाल पूछे गए हैं, जैसे जातिवाद जिसकी जड़ें भारत में अभी भी चारों तरफ पसरी हुई हैं, आखिर इन सुदूर देशों व द्वीपों में ये जातिवाद कैसे ख़त्म हो गया वो भी इन मजदूर वर्ग के लोगों के द्वारा, जो पढ़े लिखे भी नहीं थे ? और भारत मजदूरों के लिए बेहतर विकल्प क्यों था ? इन सभी सवालों के जवाब आगे चलकर मिल जाते हैं।
         किताब को पढ़ते वक़्त पता चलता है कि कैसे कुछ एजेंट जिन्हें अरकाटी कहा जाता था, लोगों को बहला-फुसला कर अपने साथ ले जाते थे। ये एजेंट लोगों को कोलकाता ले आते थे जहाँ पर इन्हें डिपो में रखा जाता था, वहां से इन्हें जहाजों पर बिठाकर अलग-अलग द्वीपों पर भेज दिया जाता था। इस किताब में रियूनियन द्वीप, मारीशस, फिजी, गुयाना, ट्रिनिडाड, टोबैगो, जमैका, सूरीनाम, यूगांडा के अलावा और भी अन्य द्वीपों के गिरमिटियों की कथा कही गयी है। इसके साथ ही सिक्खों के प्रवास को लेकर भी एक अध्याय समर्पित है। कई जगहों पर माहौल एक जैसा था तो कुछ जगहों पर बिल्कुल ही अलग। कहीं पर मजदूरों का शोषण बहुत ज्यादा हुआ तो कहीं पर ज्यादे से थोड़ा कम। द्वीपों के साथ- साथ मजदूरों का शोषण जहाजों पर भी होता था, खासकर महिलाओं का। जहाज पर गोरे अधिकारी, डॉक्टर, सरदार सभी महिलाओं के साथ जबरदस्ती करते थे। हालांकि उनमे कुछ ऐसे भी थे जो मजदूरों की वास्तव में मदद करते थे। ऐसा नहीं है कि मजदूर अपने विरुद्ध हो रहे शोषण का विद्रोह नहीं करते थे। यहाँ पर कई ऐसी घटनाओं का जिक्र है जहां पर मजदूरों ने संघटित होकर विद्रोह किया और कुछ अधिकारीयों को जान से भी मार डाला। ऐसा ही महिलाओं ने भी किया। लेकिन ज्यादातर विद्रोहों को बलपूर्वक दबा दिया जाता था।
        जब भारत से लाये गए गिरमिटिया इन द्वीपों पर रहने लगे तो उनकी संस्कृतियों में भी कुछ बदलाव आया। कुछ चीजें वैसी ही रहीं तो कुछ बदल गयी। इनकी भाषाओं में कुछ स्थानीय शब्द जुड़ गए। संगीत ने भी नया रूप लिया जिसे “चटनी म्यूजिक” के नाम से जाना गया। कुछ नए समुदायों ने भी जन्म लिया। इस किताब में जमैका के ‘रस्ताफेरियन’ समुदाय का भी जिक्र है। इस समुदाय के लोगों ने हिन्दू साधुओं की तरह बालों में जटा बनाना शुरू किया। जिसे बॉब मार्ले जैसे रस्ताफेरियन ने लोकप्रिय बनाया।
        भले ही लोगों को अपने देश से विस्थापित होने का का दुःख था, लेकिन इस विस्थापन से उन्हें कुछ फायदे भी हुए। जिसमे जाति-प्रथा का ख़त्म होना व लोगों का समृद्ध होना भी शामिल है। जैसे किताब में एक जगह एक नवयुवक का जिक्र आता है, जो बिहार के किसी गाँव से निकलकर सुदूर देश में मजदूरी करने जाता है और कुछ साल मजदूरी कर के वहां पर एक जमीन खरीदता है। धीरे-धीरे वो वहां पर एक बड़ा जमींदार बन जाता है। इसके साथ ही साथ वह दूसरे लोगों को भी ऊपर उठाता है। आज जहाँ बिहार का उसका गाँव अभी भी बहुत अच्छी हालत में नहीं है, वहीँ पर उसने उस दूसरे देश में एक शहर ही बसा दिया है और उसके वहां पर कई व्यवसाय चल रहे हैं। लेकिन फिर भी हम समृद्धी को देखते हुए उनके शोषण के दर्द को दरकिनार नहीं कर सकते। क्योंकि उन लोगों ने वहां पर जो सहा, जो झेला वो मामूली नहीं था।

Sunday, 28 January 2018

आधुनिक परिवेश में प्राचीन भारतीय ज्ञान के दर्शन कराती 'द कृष्णा की' (कृष्ण कुंजी)


The Krishna Key
अश्विन सांघी के बारे में मैंने अखबारों व मैग्जीनों में काफी पढ़ा हुआ था। लेकिन अभी तक मैंने इनके द्वारा लिखी गयी कोई किताब नहीं पढ़ी थी। पिछले महीने मैंने इनकी किताब 'द कृष्णा की (कृष्ण कुंजी) को पढ़ना शुरू किया। इस किताब को चुनने का मुख्य कारण इसका टाइटल ही था। जो कि भगवान कृष्ण के साथ जुड़ा हुआ था। जब मैंने इसे पढ़ना शुरू किया तो कुछ ही पन्ने पढ़ने के बाद मैं रोमांचित हो उठा और आगे पढ़ने पर कई रोचक तथ्य सामने आते चले गये। इस किताब में लेखक ने आधुनिक समय की कहानी के साथ-साथ प्राचीन इतिहास खासकर महाभारत के समय काल (सिंधु घाटी सभ्यता) व उस दौर की कथाओं का भी वर्णन किया है जो इसे और भी मजबूत स्तंभ प्रदान करता है। इन सब के बीच में भगवान कृष्ण बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका में और इस पूरे किताब के केंद्र में हैं।

हममें से बहुत लोगों ने आज तक अध्यात्म, धर्म व विज्ञान को एक नजरिये से कभी भी नहीं देखा है। कुछ लोग धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, वहीं कुछ विज्ञान को महत्व देते हैं। इन सभी के लिए तो ये दोनों, दो धूरियों पर स्थित अलग-अलग बिंदु हैं, जिनका कभी मिलन हो ही नहीं सकता। लेकिन इस किताब को पढ़ने के बाद लोगों की सोच शायद बदल जाये। इसमें लेखक ने आधुनिक विज्ञान व वैदिक ज्ञान के बीच के संबंधों को खोज निकला है और इन संबंधो को ठोस तर्कों का प्रयोग करते हुए प्रस्तुत किया है। जैसे कि एक जगह लेखक ने प्राचीन ऋषियों की साधना को और ॐ की ध्वनि के महत्व को विज्ञान की भाषा में समझाया है। इसी तरह के कई और भी संबंध हमें इस किताब में पढ़ने को मिलेंगे। बेशक उनके लिए ये कोई आसान काम नहीं रहा होगा, इसके लिए लेखक ने बहुत शोध और गहन विचार किया होगा। जिसका नतीजा ये शानदार किताब आज हमारे बीच मौजूद है, जो कि हमें दोबारा सोचने व खोजने पर मजबूर कर देती  है। सिंधु घाटी सभ्यता के अलावा लेखक ने दूसरे कालों व स्थानों के बारे में भी बेहतरीन तथ्य प्रस्तुत किये हैं। जैसे कि द्वारिका, सोमनाथ, कैलाश, आगरा, ताजमहल, राजस्थान इन सभी स्थानों के बारे में भी काफी कुछ बताया गया है और ये सब कहानी से ही सरोकार रखते हैं।  इसके साथ-साथ हमें इस किताब में अंकों, नक्शों व चिह्नों का भी अद्भुत खेल देखने को मिलेगा। इन सभी अंकों के पैटर्नों व चिह्नों का संबंध भी प्राचीन भारतीय सभ्यता से जुड़ा हुआ है और इनका प्रयोग इस किताब को और भी रोचक बना देता है।

हम सभी इतना तो जानते हैं कि हमारा प्राचीन ज्ञान-विज्ञान बहुत ही समृद्ध रहा है, लेकिन हम अपना ज्ञान धीरे-धीरे भूलते चले गये और दूसरों के पीछे-पीछे चलने लगे। ये सब जानते हुए भी हम इससे अनजान बनते हैं और आज भी हमारे देश में वेदों, पुराणों के अध्ययन को धर्म से जोड़कर देखा जाता है, न कि एक ज्ञान के स्रोत के रूप में। हमारे इस प्राचीन ज्ञान के महत्व को अश्विन सांघी ने एक पुस्तक के माध्यम से उजागर किया है। भले ही ये किताब एक फिक्शन बुक हो, लेकिन इसके माध्यम से हमें अपने इतिहास व संस्कृति से जुड़ने का मौका मिलता है।

Sunday, 17 December 2017

कठिन परिस्थितियों में पनपे विचारों को बतलाती ऐन की डायरी


'द डायरी आॅफ ए यंग गर्ल', दुनिया की सबसे चर्चित डायरी और द्वितीय विश्व युद्ध के महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक। एक 14-15 साल की यहूदी लड़की ऐन फ्रैंक द्वारा लिखी गयी इस डायरी में, सिर्फ रोजाना की घटनाओं का वर्णन भर ही नहीं है। बल्कि इसमें उन सभी लोगों का दर्द छिपा हुआ है; जिन्होंने उस दौरान एक ऐसे समय को झेला था, जहाँ पर उन सभी की इंसानी मान्यता न के बराबर थी। इस डायरी में एक लड़की की आंतरिक भावनायें छुपी हैं, वो अहसास छिपा है जिसे उसकी चाहत थी। 

1942 का साल, द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू हुए तीन साल हो चुके थे और एडोल्फ हिटलर पूरे यूरोप में यहूदियों के खिलाफ अभियान शुरू कर चुका था। इसी साल 12 जून को ऐन को उनके जन्मदिन पर अपने पिता से एक लाल रंग की डायरी उपहार में मिलती है और वो डायरी लिखना शुरू कर देती हैं। ये डायरी उनके सबसे अच्छे तोहफों में से एक थी। क्योंकि अभी तक उनके पास कोई ऐसा नहीं था, जिससे वो अपनी हर बात कह सके। लेकिन अब उनके पास उनकी 'किटी' थी, जैसा कि वो डायरी को संबोधित करती हैं। इस डायरी में उन्होंने यहूदियों पर लगाई गयी पाबंदियों के बारे में लिखा है, " यहूदियों को पीला सितारा लगाना होता था, उन्हें कार से चलने की मनाही थी चाहे वो उनकी अपनी ही क्यों न हो, यहूदी थिएटर नहीं जा सकते थे "। इससे पता चलता है कि उस समय यहूदी आजाद होते हुए भी आजाद नहीं थे। फिर भी उस समय वो अपने घर पर तो रह सकते थे। लेकिन ऐसा समय ज्यादा दिन तक नहीं रहा। कुछ महीनों बाद जर्मन सेना नीदरलैंड पहुँची और उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा। जर्मन सेना से बचने के लिए वो अपने परिवार के साथ ऐम्सटर्डम की उस इमारत के ऊपरी हिस्से में किताबों की आलमारी के पीछे छिपने चली गयीं, जहाँ उनके पिता काम करते थे। यहाँ पर ऐन के परिवार के अलावा उनके साथ एक और परिवार उस छोटी सी जगह में छिपा रहा। इस जगह पर छिपने के लिए ऐन के पिता आॅटो फ्रैंक के कुछ ईसाई दोस्तों ने उनकी मदद की।

इस छोटी सी बंद जगह पर ये आठ लोग सालों तक रहे। यहाँ से वो न तो कहीं बाहर जा सकते थे और न ही कुछ चुने हुए लोगों के अलावा किसी से बात कर सकते थे। ऐन अपनी डायरी में उस जगह को अनेक्स कह कर बुलाती हैं। अनेक्स में रहते हुए ये सभी कई बार ऐसे समय से गुजरे, जब उन्हें बिना बोले, बिना हिले-डुले पूरा दिन गुजारना पड़ता था। इस डायरी में अनेक्स में मनाये जाने वाले उत्सवों व अक्सर होने वाले आपसी झगड़ों के बारे में भी पता चलता है। जो यहाँ होना लाजमी था। इसके अलावा उन्होंने हमेशा होने वाले गोला, बारूदों व गोलियों के आवाजों की चर्चा भी की है। जिसकी तेज आवाजों से उस जगह पर सोना भी दुसवार था। 

इस डायरी को पढ़ने पर ये कभी नहीं लगता कि ये डायरी एक चौदह साल की लड़की के द्वारा लिखी गयी है। यहाँ पर उन्होंने अपने कुछ ऐसे विचारों को साझा किया है, जो एक बहुत अनुभवी विचारक ही सोच सकता है। जिसने पूरी दुनिया देखी हो व अलग-अलग परिस्थितियों का सामना किया हो। मेरा ऐसा मानना है कि एक बंद जगह पर रहते हुए और वहाँ पर खुद को अलग पाकर, ऐन के विचारों में परिपक्वता जल्दी आयी हो। इस डायरी के माध्यम से उन्होंने अपने आप को पूरा खोल कर रख दिया। जो शायद आसान बात नहीं थी और ऐसे शख्स के लिए तो बिल्कुल भी नहीं, जो हर वक्त एक डर के साथ जी रहा हो। 'कागज में लोगों से ज्यादा धीरज होता है' , ये कहकर ऐन अपनी डायरी के बहुत ही करीब दिखायी पड़ती हैं।

अनेक्स में ये आठों लोग करीब दो सालों तक छिपे रहे। अगस्त 1944 में किसी ने उन लोगों के छुपे होने की खबर दे दी और उन सभी लोगों को बंदी शिविर में डाल दिया गया। साथ ही उनकी मदद करने वाले ईसाई दोस्तों को भी गिरफ्तार कर लिया गया। फरवरी के आखिर में बंदी शिविर में फैले टाइफस के कारण ऐन फ्रैंक की मृत्यु हो गयी। उन आठ लोगों में से एक अकेले आॅटो फ्रैंक ही थे, जो उस बंदी शिविर से जिंदा बचकर निकले थे। इसके बाद उन्होंने अपनी बेटी के विचारों को पूरी दुनिया तक पहुँचाया।

ऐन फ्रैंक बहुत छोटी सी ही उम्र में ही दुनिया को अलविदा कह गयी, लेकिन उनके विचार, अलग अलग लोगों के प्रति उनका नजरिया, दुनिया के प्रति उनकी समझ व उनकी कलात्मक दृष्टि अभी भी ज़िन्दा है। उनकी डायरी के माध्यम से युद्ध के दौरान का वो खौफनाक मंजर अभी भी हमारे सामने बिल्कुल वैसा ही दिखायी पड़ता है।

Saturday, 16 December 2017

वो मेजर जिसने एक पैर न होने के बावजूद भी सेना को कमांड किया


आज का दिन भारत के लिए ऐतिहासिक है, क्योंकि आज ही के दिन सन् 1971 में भारत ने पाकिस्तान को शिकस्त दी थी और पूर्वी पाकिस्तान को आजाद कराया था। जिसके फलस्वरूप बांग्लादेश अस्तित्व में आया। पूरे देश में हम 16 दिसम्बर को विजय दिवस के रूप में मनाते हैं। उस समय पाकिस्तानी बलों के कमांडर जनरल ए.ए.के. नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। जिसके बाद 93000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्ध बंदी बनाया गया।

1971 के इस युद्ध में करीब 3,900 भारतीय सैनिक शहीद हो गये थे और 9,851 सैनिक घायल हुए थे। हमारे देश के हर एक सैनिक ने दुश्मन का जाबांजी से मुकाबला किया और अपनी वीरता का परिचय दिया। उन्हीं जाबांज सैनिक में से एक थे मेजर जनरल इयान कारदोज़ो, जो उस समय मेजर के पद पर थे। इस युद्ध में उन्होंने अपना एक पैर खुद ही काट डाला था।

युद्ध के दौरान मेजर कारदोज़ो का पैर लैंडमाइन पर पड़ गया, जिसकी वजह से उनका एक पैर गंभीर रूप से घायल हो गया। जब वो डाॅक्टर के पास गये, तो उन्होंने डाॅक्टर से माॅरफीन माँगा‌‍। लेकिन माॅरफीन तो खत्म हो चुकी थी। फिर उन्होंने वहाँ मौजूद एक सैनिक से कोई काटने वाली चीज लाने को कहा। वो सैनिक जब खुखरी लेकर उनके पास पहुँचा, तो उन्होंने उससे अपना पैर काटने को कहा। लेकिन सैनिक ने कहा कि ये मुझसे नहीं हो पायेगा। तब उन्होंने खुद ही खुखरी उठायी और अपना पैर काट डाला। ऐसा करना बेशक आसान काम नहीं था, लेकिन उस समय उन्होंने वो हिम्मत दिखायी और वीरता की मिशाल कायम की।

मेजर कारदोज़ो यहीं नहीं रूके, एक पैर गँवाने के बावजूद भी उनके अन्दर सैनिकों वाला जज्बा अभी भी कायम था। वो फौज में अपनी सेवा जारी रखना चाहते थे। लेकिन अंग नष्ट होने के कारण उनका सेना में बना रहना मुश्किल था। इसके लिए उन्होंने नकली पैर लगाकर ही कड़ी मेहनत की और खुद को साबित किया। कई चरणों से गुजरने के बाद वे मेजर जनरल के ओहदे तक पहुँचे। वे भारतीय सेना के पहले ऐसे अधिकारी बने, जिसने अंग नष्ट होने के बावजूद भी सेना के बटालियन और ब्रिगेड का कमांड किया और सेना मेडल से नवाजे जाने वाले पहले अधिकारी भी मेजर जनरल कारदोज़ो ही थे। उनके इस हौसले व जज्बे ने उन सैनिकों के लिए राह आसान कर दी, जो अंग नष्ट होने के बावजूद भी देश की सेवा करते रहना चाहते हैं। उन्होंने ये दिखा दिया कि शारीरिक अक्षमता भी एक सैनिक को देश की सेवा करने से रोक नहीं सकती।


                                                                                                  ( फोटो - विकिपीडिया )

Friday, 15 December 2017

लोकतंत्र में जनता की विचारधारा और कर्तव्य

चुनावों के इस सीजन में जब भी कोई न्यूज चैनल खोलकर बैठो, तो अक्सर राजनेता आपस में लड़ते हुए ही दिखायी पड़ते हैं। कोई किसी की गलतियों को गिना रहा होता है, तो कोई अपने द्वारा किये गये महत्वपूर्ण कार्यों का उल्लेख कर रहा होता है। इन लोगों की कोशिश यही रहती है कि किसी भी तरह दूसरों को नीचा दिखायें व खुद को ऊँचा उठायें। कभी-कभी तो ये लड़ाईयाँ टीवी से निकलकर उन लोगों के बीच भी आ पहुँचती हैं, जो इन्हें देख रहे होते हैं। दर्शकों के बीच दो गुट बन जाता हैं। यहाँ पर जनता भी अपनी-अपनी पार्टियाँ चुनती है और अपनी पसंद की पार्टीयों का अच्छी तरह से प्रचार प्रसार करती है। इस तरह की स्थितियों में जनता 'सरकार चुनने वाला आम नागरिक' न बन कर, किसी पार्टी की कार्यकर्ता अधिक दिखायी पड़ती है। आजकल तो सोशल मीडिया इस तरह के प्रचार प्रसार का अच्छा माध्यम बन गया है और यहाँ पर अधिकतर प्रचार 'आम जनता-cum-आम कार्यकर्ता' के द्वारा ही किया जा रहा है।

सरकार द्वारा किये गये कार्यों की सराहना करना व पार्टीयों का प्रचार करना, दो अलग-अलग चीजें हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि वर्तमान की सरकार ने जो निर्णय लिए हैं या फिर जो कार्य किया है, वो पिछली सरकार द्वारा किये गये कार्यों से बहुत ही बेहतर है। उनके द्वारा उठाये गये कदमों की हमें वाकई प्रशंसा करनी चाहिए। लेकिन इसका मतलब ये तो बिल्कुल भी नहीं है कि हम इनकी कमियों को नजरअंदाज कर दें। किसी भी देश में लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी वहाँ की जनता ही होती है। देश के नागरिकों का ये कर्तव्य बनता है कि वो सही और गलत में फर्क करे। यदि सरकार का किसी विषय पर ध्यान नहीं जा रहा, तो जनता को ये चाहिए कि वो उसे उस बारे में याद दिलाये। यदि सरकार द्वारा लिया गया कोई फैसला गलत है, तो वो उसका विरोध करे या फिर अपनी राय प्रकट करे। मगर आज ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

आज से सालों पहले इंदिरा गाँधी की लहर थी। लोग उनके भाषणों से बहुत प्रभावित होते थे और उन्हें बहुत मानते थे। लेकिन उस समय के 1984 के दंगों को कौन भूल सकता है, जहाँ पर पूरे देश में सिखों को अपने सिख होने का दंश झेलना पड़ा था। कुछ ऐसा ही आज भी है; जहाँ पर यदि कोई सरकार की गलतियों को गिनाने भी लगता है, तो उसे या तो दूसरे पार्टी का समर्थक कहा जाता है, नहीं तो फिर धर्म को आड़े लाया जाता है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि ऐसा वही लोग कहते हैं, जो 'आम कार्यकर्ता' हैं। हमें ये तय करना होगा कि हमें कार्यकर्ता बनना है या फिर आम जनता। दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं। लेकिन दोनों जब साथ में आकर 'आम कार्यकर्ता' बन जाते हैं, तो ये हमारे देश व लोकतंत्र दोनों के लिए घातक साबित हो सकता है। जिस किसी को लगता है कि वो राजनीति में जाकर देश के विकास में अपना योगदान दे सकता है, तो उसे उस दिशा में जरूर आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन आम जनता रहते हुए, किसी एक पार्टी का कार्यकर्ता बन जाना, उसका प्रचार करना व उसके विरूद्ध कुछ न सुनना, ये एक अच्छे लोकतंत्र की निशानी नहीं है।

Thursday, 14 December 2017

आम आदमी के जीवन को दर्शाता सिनेमा


सिनेमा, मनोरंजन का एक बेहतरीन माध्यम। जब भी मूड खराब हो या खाली समय में कुछ करने के लिए ना हो, तो हम सभी के दिमाग में पहला खयाल फिल्में देखने का ही आता है। मूड को ठीक करने के मामले में ये कारगर भी साबित होता है। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी भी होती हैं, जो अपने पीछे एक सवाल छोड़ जाती हैं। ये वो फिल्में होती हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। इन फिल्मों का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन ही नहीं बल्कि 'कुछ' कहना भी होता है। कभी ये फिल्में किसी इंसान के आत्मीय दर्द को बयाँ करती हैं, तो कभी हमारे सिस्टम व समाज के रवैये पर चोट करती हैं।

बचपन से जिस तरह की फिल्में मैं देखता आया हूँ, उसका मुख्य केंद्र बिंदु मनोरंजन ही रहा है। वही 'लार्जर दैन लाईफ' वाली फिल्में, जिसका हमारे वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं होता। लेकिन पिछले एक दो सालों में जिस तरह के सिनेमा से मेरा परिचय हुआ है, वे सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से बनायीं गयी फिल्में नहीं थी। बल्कि उनकी कहानी में यथार्थ नजर आता है। ' एक डाॅक्टर की मौत ' को देखने से पहले मैं नहीं जानता था कि आर्ट फिल्म क्या होती है, पैरेलल सिनेमा क्या होता है। इसके पहले तो हमें बस बाॅलीवुड, हाॅलीवुड और साउथ इंडियन सिनेमा के बारे में ही पता था। इसे देखने के बाद पता चला कि किसी भी फिल्म में मुख्य किरदार हीरो या हीरोईन नहीं, बल्कि कहानी भी हो सकती है।

मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, तपन सिन्हा, गोविन्द निहलानी और भी न जाने कितने ऐसे फिल्मकारों के नाम है; जिन्होंने काॅमर्शियल फिल्मों से इतर हटकर बेहतरीन यथार्थपरक फिल्में बनायी हैं। यदि पैरेलल सिनेमा के किरदारों की बात की जाए, तो हम स्मिता पाटिल, शबाना आजमी व नसीरुद्दीन शाह के योगदान को कैसे भूल सकते हैं। इन्होंने भारतीय सिनेमा के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है और अपनी अदाकारी से सबको प्रभावित किया है।

ऐसा नहीं है कि पहले ऐसी फिल्में नहीं बनती थीं। 60 के दशक के पहले हमारे सिनेमा में पैरेलल व कामर्शियल का बँटवारा नहीं था। उस समय फिल्में सिर्फ अच्छी या बुरी ही होती थीं। उस दौर की फिल्मों को यदि याद किया जाये, तो गुरूदत्त की 'प्यासा', 'कागज के फूल' , महबूब खान की 'मदर इंडिया', सत्यजीत रे की 'पाथेर पांचाली' इसी तरह की ही फिल्में थीं। इन सब के अलावा वी. शांताराम, ऋषिकेश मुखर्जी, विमलराय, ऋत्विक घटक भी यथार्थपरक फिल्में बनाने के लिए ही जाने जाते हैं। लेकिन 60 के दशक के बाद ऐसी फिल्मों का बनना लगभग बंद ही हो गया था। उस दौरान फिल्मों में बस मसाला डाला जा रहा था और शायद लोगों की भी डिमांड उस वक्त यही रही हो। ऐसा नहीं था कि 60 के दशक के बाद की फिल्में अच्छी नहीं थी। लेकिन वो समाज को कुछ दर्शा नहीं रही थी।

1968 में जब मृणाल सेन ने 'भुवनशोम' बनायी, तो भारतीय सिनेमा में आर्ट फिल्मों ( पैरेलल सिनेमा ) की नींव पड़ी और इसने एक नये आंदोलन का शुभारंभ किया। पूरी फिल्म इंडस्ट्री दो भागों में बँट गयी। एक तरफ लोगों को भरपूर मनोरंजन परोसने वाला मेनस्ट्रीम (कामर्शियल) सिनेमा था, तो वहीं दूसरी तरफ आम जन की जिंदगी से रूबरु कराने वाला पैरेलल सिनेमा। दोनों अपने-अपने रास्ते पर आगे बढ़े, लेकिन यहाँ पर प्रोड्यूसर्स व डिस्ट्रीब्यूटर्स की पहली पसंद मेनस्ट्रीम सिनेमा ही था। फिर भी श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकारों ने मुख्यधारा में रहकर कभी फिल्में नहीं बनायी। ऐसे फिल्मकारों ने वही बनाया, जो वे बनाना चाहते थे और उस समय कुछ हद तक सरकार ने भी आर्ट फिल्मों को प्रोत्साहित किया। भले ही ये फिल्में चली न हों, लेकिन इन्होंने अपनी कहानी से क्रिटिक्स व दर्शकों के एक तबके को प्रभावित तो जरूर किया। 
यदि हम 21वीं सदी के पैरेलल सिनेमा की बात करें, तो नीरज घेवान, आनंद गाँधी, रजत कपूर जैसे फिल्मकारों का नाम सामने आता है। नीरज घेवान द्वारा निर्देशित 'मसान' ने तो कांस फिल्म फेस्टिवल्स में भी अपनी छाप छोड़ी थी। अब हालात थोड़े बदलते हुए दिखायी दे रहे हैं और दर्शकों की डिमांड भी बदलती जा रही है। आज के दर्शक 'बिना आधार, केवल मनोरंजन' वाले सिनेमा को उतना महत्व नहीं दे रहे हैं। बल्कि अच्छे कंटेट को स्वीकार किया जा रहा है। अब पैरेलल सिनेमा बनकर एक कोने में यूँ ही पड़ा नहीं रहता, बल्कि वो आम दर्शकों तक भी पहुँच रहा है। 'दृश्यम फिल्म्स' जैसे प्रोडक्शन हाऊस ने भी इस दिशा में एक बेहतरीन कदम उठाया है। इसके बैनर तले बनी सारी फिल्में एक अच्छे सिनेमा का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।