Friday, 6 January 2017

रविन्द्र कौशिक- भारत का ब्लैक टाईगर


हमने फिल्मों व कहानियों में कई दफा जासूसों के बारे में देखा व पढ़ा होगा। इन्हें देखकर तो यही लगता है कि इनकी ज़िन्दगी कितनी रोमांचक होती होगी, लेकिन सच्चाई तो कुछ और ही होती है। इनकी ज़िन्दगी में रोमांच तो होता है, लेकिन इसके साथ ही हर वक्त, हर पल मौत का सायां इनके साथ-साथ चलता रहता है। ऐसे ही एक भारतीय जासूस थे, रविन्द्र कौशिक। जिन्होंने देश के लिए अपनी जान तक न्यौछावर कर दी। 
       रविन्द्र कौशिक का जन्म राजस्थान के श्रीगंगानगर में 11 अप्रैल, 1952 को हुआ था और वो यहीं पर पले-बढ़े। रविन्द्र को बचपन से ही एक्टिंग का शौक था। स्कूल के दिनों में वो दूसरे लोगों की नकल(mimicry) बड़े ही अच्छे ढंग से किया करते  थे, जिसके चलते वो अपने पूरे स्कूल में चर्चित थे। वे अपने ख्वाब को पूरा करते हुए आगे चलकर एक थियेटर आर्टिस्ट भी बने। ऐसे ही जब वो एक बार लखनऊ में अपना प्रोगाम कर रहे थे, तो उनके इस एक्टिंग की प्रतिभा को भारतीय खुफिया एजेंसी राॅ के कुछ अधिकारियों ने देखा। उन्होंने रविन्द्र को पाकिस्तान में भारत का अंडरकवर एजेंट (जासूस) बनने का आॅफर दिया। जिसे रविन्द्र ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद दो साल तक दिल्ली में उन्हें प्रशिक्षित किया गया। इस दौरान उन्हें उर्दू भाषा सीखायी गयी व पाकिस्तान से जुड़ी अन्य सभी जानकारियाँ भी दी गयीं।
     सन् 1975 में पूरी तैयारी के साथ रविन्द्र   पाकिस्तान पहुँचे। यहाँ पर इनका नाम नबी अहमद शाकिर था। पाकिस्तान में आकर इन्होंने कानून की पढ़ाई के लिए काॅलेज में दाखिला ले लिया। इसे पूरा करने के बाद उनको पाकिस्तानी आर्मी में एक कमीशंड आॅफिसर के रूप में नौकरी मिल गयी। धीरे-धीरे प्रमोशन करके वो आर्मी में मेजर की रैंक तक पहुँचने में सफल हुए। यहाँ पर इन्होंने एक पाकिस्तानी लड़की अमानत से शादी भी कर ली। बाद में उनका एक बच्चा भी हुआ। सन् 1979 से 1983 के दौरान रविन्द्र कौशिक ने कई महत्वपूर्ण सूचनायें राॅ को भेजीं। जिसकी वजह से भारतीय बलों को बहुत सहायता मिली। इस दौरान उन्हें एक और नया नाम  "ब्लैक टाईगर" मिला। यह नाम उनको भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा दिया गया था।
       सन् 1983 का साल रविन्द्र कौशिक के लिए बुरा साबित हुआ। इस साल भारतीय खुफिया एजेंसियों ने एक   और जासूस इनायत मसीहा को पाकिस्तान में रविन्द्र कौशिक की मदद करने के लिए भेजा। लेकिन वो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के द्वारा पकड़े गये। इनायत मसीहा ने पकड़े जाने के बाद रविन्द्र कौशिक के बारे में भी सबकुछ बता दिया। इसके बाद रविन्द्र कौशिक को भी गिरफ्तार कर लिया गया। सन् 1985 में उन्हें मौत की सजा सुनायी गयी। लेकिन बाद में पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे उम्रकैद में बदल दिया गया। इसके बाद उन्हें सियालकोट व कोट लखपत जैसे कई जेलों में रखा गया। अपनी सजा के दौरान रविन्द्र ने चुपके से कई चिट्ठियाँ अपने परिवार वालों को लिखीं। इन चिट्ठियों के माध्यम से वह अपने ऊपर होने वाले जुल्मों के बारे में बताते थे। एक चिट्ठी में तो उन्होंने लिखा है, "क्या भारत जैसे देश के लिए कुर्बानी देने वालों को यही मिलता है?" जाहिर सी बात है कि रविन्द्र के पाकिस्तान में पकड़े जाने के बाद उस समय की तत्कालीन सरकार ने उनको भारत में वापस लाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने करीब 16 साल जेल में बिताये। इन 16 सालों में वो टीबी व अस्थमा जैसी कई बिमारियों के शिकार हो गये और अंत में सन् 2001 में पाकिस्तान के मियांवली जेल में उनकी मौत हो गयी।
      रविन्द्र कौशिक की माँ अमलादेवी ने उनको वापस लाने के लिए ढेरों पत्र भारत सरकार को लिखे थे, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। सरकार ने रविन्द्र की कोई भी मदद नहीं की। अंततः उनको मौत ही नसीब हुयी। रविन्द्र की मौत के बाद सरकार ने बस इतना ही किया कि उनकी माँ को 500 रूपये प्रति महीने पेंशन के तौर पर दिये जाने लगे, जिसे कुछ सालों बाद बढ़ाकर 2000 कर दिया गया। सन् 2006 में रविन्द्र के माँ की भी मौत हो गयी।
      रविन्द्र कौशिक ने देश की खातिर अपनी जिन्दगी के 26 साल कुर्बान कर दिये, जिसमें से वो 16 से अधिक सालों तक तो जेल में रहे। वास्तव में वे उन चंद लोगों में से हैं, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान तक दाँव पर लगा दी। उनकी मौत के इतने सालों के बाद वो सरकार द्वारा तो भुला दिये गये हैं, लेकिन हमारा यह फर्ज बनता है कि हम उनकी कुर्बानी को याद रखें और उनके प्रति एक सम्मान की भावना को बनाये रखें।


                                                                                               (Photo- The Telegraph)

Tuesday, 20 December 2016

कोडिन्ही- एक ऐसा गाँव जहाँ हर तरफ जुड़वा ही रहते हैं

दुनिया में तरह-तरह की विचित्रतायें मौजूद हैं। इनमें से कुछ वस्तुयें हैं, तो कुछ जगहें हैं या फिर कुछ लोग। हमारे भारत में भी बहुत सी विचित्र जगहें हैं। इन्हीं में से एक है केरल का कोडिन्ही गाँव। मलप्पुरम जिले में स्थित इस गाँव को जुड़वों का गाँव (Twin Town) के नाम से जाना जाता है। यदि हम यहाँ जायें तो हमें चारों ओर जुड़वे ही दिखायी देंगे। सोचिये इनके घर वालों को कितनी परेशानी होती होगी। कभी ऐसा भी हुआ हो कि गलती किसी और ने की हो और डाँट कोई और खाया हो। खैर वहाँ के लोगों को इसकी आदत भी हो गयी होगी। भारत में जहाँ जुड़वे बच्चे पैदा होने का औसत बहुत ही कम है, वहीं इस गाँव में हर 1000 बच्चे पर 45 जुड़वा बच्चे पैदा होते हैं। जुड़वा बच्चे पैदा होने का यह औसत एशिया में पहले नम्बर पर आता है, जबकि विश्व में दूसरे नम्बर पर। विश्व में पहले नम्बर पर नाइज़ीरिया का इग्बो-ओरा है, जहाँ जुड़वा बच्चे पैदा होने का औसत 145 के आस-पास है। 
   इस गाँव की आबादी 2000 के करीब है और यहाँ पर अधिकतम मुस्लिम समुदाय के लोग ही रहते हैं। कोडिन्ही गाँव के स्थानीय लोगों के अनुसार यहाँ सबसे पुराने जुड़वा बच्चे 1949 में पैदा हुये थे। पहले तो जुड़वा बच्चे पैदा होने का यह सिलसिला बहुत धीमा था, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें वृद्धि आयी है। पिछले 10 सालों में यहाँ जुड़वा बच्चे पहले के दोगुने हो गये हैं। यहाँ तो 79 जुड़वा जोड़े केवल 0-10 साल के बीच हैं। जुड़वों के बारे में अध्ययन करने के लिए सरकार ने इस गाँव में एक डाॅक्टर भी नियुक्त किया है, जिनका नाम कृष्णन श्री बीजू है। कोडिन्ही में जुड़वा लोगों के 220 जोड़े  गाँव में officially registered हैं। जबकि डाॅक्टर श्री बीजू के अनुसार इन जोड़ों की संख्या 300-350 है। यहाँ तो दो जोड़े ऐसे भी हैं जो कि तुड़वा (triplets) हैं। पिछले कुछ सालों में यह गाँव बहुत ही चर्चित हो चुका है। विदेशों से भी कई लोग इसे देखने व यहाँ पर शोध करने के लिये आते हैं। कुछ डाॅक्टरों का यह मानना है कि इस गाँव के खान-पान के चलते यहाँ जुड़वा बच्चे पैदा होते हैं, जबकि यहाँ का खान-पान केरल के बाकी इलाकों से कोई खास अलग नहीं है। इसलिए डाॅक्टरों का यह तर्क सही नहीं लगता। अभी तक जुड़वा बच्चे पैदा होने का कोई ठोस कारण नहीं पता चल सका है। क्योंकि जिन औरतों की शादी कोडिन्ही के बाहर होती है और आदमी जो दूसरे गाँव की औरतों से शादी करते हैं, ऐसी औरतें भी जुड़वा बच्चों को जन्म देती हैं। अब पता नहीं वो क्या वजह है, जिसके कारण ऐसा हो रहा है। अब इसका पता तो इस पर होने वाले बाकी शोधों के परिणामों से ही पता चलेगा।
      जो भी हो इस गाँव के लोग अपनी इस खासियत के कारण आकर्षण का केंद्र तो बन ही गये हैं और बने भी क्यों नहीं उनमें ऐसी बात ही है, जो उनको बाकीयों से अलग करती है। 
                                                                                          (Photo- Niklas Halle'n)
       
     

Thursday, 10 November 2016

भ्रष्टाचारियों पर घोर प्रहार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जैसे ही 500 व 1000 के नोटों के बंद होने की घोषणा की, वैसे ही घंटे भर के भीतर पूरे देश में हलचल मच गयी। बेशक इन नोटों को बंद करने का यह फैसला ऐतिहासिक है व पूरी तरह से सार्थक भी। इसे बंद करके उन्होंने काले धन, नकली नोटों के व्यापार व आतंकवाद जैसी ही कई अन्य गतिविधियों पर घोर प्रहार किया है, जो अभी तक हमारी अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँचा रहे थे। देश के अधिकतर लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया है, सिवाय उनके जिनके पास कालाधन है या जो आर्थिक नीतियों को ठीक से नहीं समझते हैं। ये लोग बिना सोचे समझे कुछ भी बोलते रहते हैं। यह खबर मिलने के बाद तो भ्रष्ट नेताओं व अधिकारियों के रातों की नींद ही उड़ गयी होगी। अब इनको अपनी जमापूँजी को नष्ट ही करना होगा। यदि वे इसे बैंक में जमा करते हैं, तो उन्हें इस पर 30 प्रतिशत टैक्स के अलावा 200 प्रतिशत पेनाल्टी भी देनी पड़ेगी और जो जेल होगी सो अलग। कुछ लोगों का यह कहना है कि इससे गरीब किसानों व दुकानदारों को नुकसान होगा और आम आदमी को परेशानी का सामना करना पड़ेगा। उनकी यह बात भी सही है। कल से बाजार बिल्कुल बंद पड़ा हुआ है और बहुत से लोग परेशानी का सामना कर रहे हैं, मैं इस बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ। लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी बिल्कुल सत्य है कि बीमारी को खत्म करने के लिये थोड़ा कष्ट तो सहना ही पड़ता है। यदि सरकार के इस निर्णायक कदम में हम उनका साथ दें, तो हमें ही फायदा होने वाला है। हमें कुछ दिनों की परेशानी को स्वीकार्य करना चाहिये।
      इसके पहले भी सरकार ने इन भ्रष्टाचारियों को आय घोषणा योजना (IDS) के तहत एक मौका दिया था कि 30 सितंबर तक अपनी सारी संम्पत्ति की घोषणा कर दें। IDS में करीब 66 हजार करोड़ रूपये की अघोषित आय सामने आयी थी, जबकि कालाधन इसके कई गुना है।  सरकार ने यह भी कहा था कि जिन लोगों ने अभी तक काले धन की घोषणा नहीं की है वह दंड भुगतने के लिए तैयार रहें। लेकिन कुछ महान लोगों ने इसे मजाक में लिया और सोचा कि सरकार कहाँ-कहाँ रेड डालेगी। लेकिन सरकार ने तो एक ही बार, एक ही समय में भ्रष्टाचारियों के घरों में रेड डाल दी। इन सब के अलावा कुछ बातें ऐसी भी हैं, जो थोड़ा अजीब लग रही हैं। जैसे की 1000 की जगह 2000 के नोटों को लाना। जिसकी वजह से धन इकट्ठा करने में और भी आसानी होगी। लेकिन ये आगे की बात है। फिलहाल कुछ समय तक तो काले धन पर रोक लगेगी ही। जहाँ तक नकली नोटों के कारोबार की बात है, रिजर्व बैंक के अनुसार नए नोटों में ऐसे सुरक्षा फीचर्स हैं, जिसकी वजह से नकली नोट छापना आसान नहीं  होगा। हालांकि इस फैसले के बाद भी पूरी तरह से काले धन पर लागाम नहीं लगा है, क्योंकि बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिन्होंने यह काला धन भारतीय मुद्रा में नहीं बल्कि स्विस बैंक के खातों में जमा किया है। फिर भी इसके बावजूद काला धन का वो हिस्सा जो मुद्रा में है, या तो नष्ट हो जायेगा या फिर सरकार के पास आयेगा। ये वही रकम है, जिसका उपयोग राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव के दौरान करती हैं व जिसके जरिये आतंकवादी देश में आतंकवाद फैलाते हैं।

Saturday, 15 October 2016

भोर का शहर

सोचिए कैसा हो, यदि हम एक ऐसी जगह पर रहें, जहाँ पर पैसे का कोई स्थान नहीं हो, ना ही कोई धर्म हो और ना ही कोई जाति। पूरी दुनिया के लगभग प्रत्येक देश की कोई ना कोई मुद्रा है और वहाँ कम से कम एक धर्म तो है ही। लेकिन आप लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि भारत में एक ऐसा ही प्रयोगिक शहर बसाया गया है, जहाँ पर ना तो कोई धर्म है, न तो वहाँ की कोई सरकार है और ना ही वहाँ कोई मुद्रा चलती है। यहाँ राजनीति का कोई स्थान नहीं है। पुडुचेरी के पास तमिलनाडु राज्य के विलुप्पुरम जिले में बसा यह प्रायोगिक शहर ओरोविल  के नाम से जाना जाता है। इसकी स्थापना सन् 1968 में मीरा रिचर्ड ने की थी। भारत सरकार ने भी मीरा रिचर्ड के इस अद्वितीय कार्य का समर्थन किया। इस शहर को भोर का शहर ( City of Dawn ) भी कहा जाता है। यहाँ पर कोई भी आकर रह सकता है, भले ही वह किसी भी देश का हो या किसी भी धर्म का। यहाँ पर रहने वाले लोग बँटे हुए नहीं हैं, उनकी तो बस एक ही पहचान है कि वे मनुष्य हैं। इस शहर को भी यही भावना लेकर बनाया गया था कि लोग अपनी इस एकता को महसूस कर सकें। 
       वैसे तो इस शहर में 50,000 लोगों को जगह देने की योजना थी। लेकिन इस समय यहाँ  44 देशों के कुल 2,047 लोग निवास करते हैं, जिसमें से 836 भारतीय मूल के लोग हैं। जैसा कि मैं आपको पहले भी बता चुका हूँ कि यहाँ की कोई मुद्रा नहीं है, इसलिए यहाँ पर रहने वाले लोग एक केन्द्रीय खाते का इस्तेमाल करते हैं। शहर में एक मंदिर भी स्थापित है, जिसे मातृमंदिर कहा जाता है। हालांकि यह मंदिर किसी भी धर्म से नहीं जुड़ा हुआ है, लेकिन यहाँ पर लोग ध्यान लगाने के लिए आते हैं व शांति की अनुभूति करते हैं। इस मंदिर के आसपास का क्षेत्र प्रशांत क्षेत्र कहलाता है। मंदिर में एक स्वर्ण क्रिस्टल बाॅल भी है, जो  'भविष्य के अनुभूति के प्रतीक' का प्रतिनिधित्व करता है। इस शहर के चार क्षेत्र हैं : "आवासीय क्षेत्र", " औद्योगिक क्षेत्र", "सांस्कृतिक(व शैक्षणिक) क्षेत्र" तथा " अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र" । नगरी क्षेत्र के पास संसाधन क्षेत्र हैं, जहाँ पर खेत, वन, उद्यान व बांध स्थापित हैं। श्री औरोबिन्दो इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ एजुकेशनल रिसर्च (SAIIER) की मदद से ओरोविल कई शैक्षणिक संस्थान भी चलाता है। ओरोविल के निवासियों से समुदाय में योगदान की अपेक्षा की जाती है। उन्हें हर एक प्रकार से समुदाय की सेवा करने को कहा जाता है। इसीलिए वहाँ रहने वाला कोई भी व्यक्ति मालिक नहीं होता है, बल्कि वो तो एक सेवक की तरह होता है। यहाँ पर आने वाले नए लोगों के लिए सबसे बड़ी परेशानी गृह-निर्माण की है, क्योंकि वर्तमान में ओरोविल सभी लोगों को आवास उपलब्ध करा पाने की स्थिति में नहीं है। नए लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपना घर बनाने में आर्थिक सहयोग दें। ओरोविल टुडे के अनुसार " नए लोगों के लिए काम के अवसर की कमी और रखरखाव का निम्नस्तर ये दो बाधाएं हैं। क्योंकि नए लोग व्यवसायिक इकाइयों या सेवा में कोई उचित काम नहीं ढूंढ पाते हैं। "

 सन् 2004 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने ओरोविल का दौरा किया तथा इसकी प्रशंसा की व अपनी सराहना व्यक्त की। UNESCO ने भी अभी तक इसका चार बार समर्थन किया है। इसकी स्थापना के समय मीरा रिचर्ड ने कहा था कि "ओरोविल भूत व भविष्य के बीच पुल बनने का आकांक्षी है। " निःसंदेह उनकी इस बात में सच्चाई है, क्योंकि जब दुनिया की शुरूआत हुयी तो मनुष्य किसी भी देश या धर्म से संबंधित नहीं थे। वो तो सिर्फ और सिर्फ मनुष्य ही थे। यही उनकी पहचान थी और आने वाले समय में शायद ऐसा ही कुछ हो। यदि कोई व्यक्ति अपनी आंतरिक परेशानियों से मुक्त होना चाहता है, एक शांति की अनुभूति व अपने अस्तित्व के होने का अहसास करना चाहता है, तो उसे यहाँ जरूर आना चाहिए।

                                                                                       (साभार- ओरोविल वेब पेज, विकिपीडिया )

Friday, 14 October 2016

कश्मीर- एक अनसुलझी कहानी

भारत और पाकिस्तान के बीच अभी तक चार युद्ध हो चुके हैं और इसमें से लगभग तीन बार इन युद्धों का कारण कश्मीर रहा है। सारे युद्ध में पाकिस्तान को हार का ही सामना करना पड़ा। लेकिन कश्मीर के कुछ क्षेत्रों में पाकिस्तान का अवैध कब्जा है, जिसे हम पाक अधिकृत कश्मीर(POK) के नाम से जानते हैं और अभी भी पाकिस्तान कश्मीर को लेकर कोई ना कोई मुद्दा उठाता ही रहता है। इस विवाद की शुरूआत सन् 1947 में शुरू हुयी, जब भारतीय रियासतों के विलय हो रहे थे। जम्मू व कश्मीर जैसे कुछ रियासत विलय में देरी लगा रहे थे। इस बात का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने अपनी सेना को कबाइली लुटेरों के भेष में कश्मीर भेज दिया। चूँकि कश्मीर की सीमा पाकिस्तान से लगती थी, इसलिए वे वहाँ पर कब्जा जमाना चाहते थे। पाकिस्तानी सेना ने वहाँ बहुत से लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस बात से घबराकर वहाँ के शासक महाराजा हरिसिंह ने भारत से मदद माँगी व अपनी रियासत के भारत में विलय की घोषणा कर दी। लेकिन उन्होंने यह निर्णय बहुत ही देरी से लिया, जिसके चलते पाकिस्तान ने लगभग आधे कश्मीर पर कब्जा कर लिया। इसके बाद भी भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को सबक सिखाते हुये, कई क्षेत्रों को पुनः प्राप्त कर लिया था, लेकिन तभी माननीय नेहरू जी के UNO में अपील करने के कारण युद्ध विराम की घोषणा हो गयी। जिसके कारण भारतीय सेना कश्मीर को दोबारा प्राप्त करने में असफल रही और आज तक वो क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में है, जिसका खामियाजा आये दिन हमारे देश को भुगतना पड़ रहा है। ऐसे ही 1971 के युद्ध में इंदिरा गांधी के पास भी एक मौका था, जब पाकिस्तान की सेना के 1 लाख सैनिकों ने भारत की सेना के सामने समर्पण किया था। यदि वे चाहती तो कश्मीर की समस्या को हल कर सकती थी लेकिन ये मौका भी इंदिरा गांधी ने गँवा दिया और 1 लाख सैनिकों को छोड़ दिया।
     नेहरू जी व इंदिरा गांधी के इस गलत निर्णय के कारण आज कश्मीर का वो इलाका आतंकवादियों का गढ़ बन चुका है। यहीं से ये आतंकवादी तमाम गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं और घाटी में हिंसा फैला रहे हैं। कहने को तो POK की एक अलग सरकार है और वहाँ पर एक प्रधानमंत्री भी है, लेकिन सारा नियंत्रण पाकिस्तान के हाथ में है। वहाँ के लोग बहुत ही दुःख भरी जिन्दगी जी रहे हैं। आलम तो यह है कि POK के कई मुस्लिम परिवारों ने भारत में शरण ले रखी है। लंदन के रिसर्चरों के द्वारा वहाँ के कुछ जिलों में कराये गये सर्वे के अनुसार एक व्यक्ति ने भी पाकिस्तान के साथ खड़े होने की वकालत नहीं की। वकालत वही लोग कर रहे हैं, जो कट्टरपंथी व अलगाववादी है। यही वे लोग हैं, जो आये दिन दंगा फसाद करते रहते हैं। ये लोग वहाँ पर अमन व शांति नहीं चाहते हैं। अब तो धीरे-धीरे POK के कुछ हिस्से पर चीन भी कब्जा जमा रहा है, लेकिन इस बात से तो कट्टरपंथियों को कोई मतलब ही नहीं है, उन्हें तो बस भारत से ही परेशानी है। भारत भी अब चुप नहीं बैठने वाला, सर्जिकल स्ट्राईक के जरिए भारतीय सेना ने POK में कई आतंकियों को मार गिराया और उनके ठिकानों को तबाह कर दिया। हमें भारतीय सेना व सरकार के इस निर्णय पर गर्व है। जरूरत है तो ऐसे ही कुछ और मिशन की जिससे कि कश्मीर आतंकियों के गढ़ से मुक्त हो सके और वापस हम इसे प्राप्त कर सकें और वहाँ के लोग हिंसा से मुक्त हो सकें। इसके लिए हो सकता है कि बेशक हमें एक युद्ध लड़ना पड़े, लेकिन इसके बाद आगे हमें इन मुद्दों पर बहस नहीं करना पड़ेगा। पिछली सरकारों ने जो गलतियां की, उन्हें अब दोहराना नहीं चाहिए, व राजनीति से दूर हटकर इसपर एक सख्त फैसला लेना चाहिए।

Tuesday, 13 September 2016

वोट की राजनीति

अब यूपी के विधानसभा चुनाव नजदीक आने वाले हैं। लगभग सारी राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव के लिए अपनी कमर कस ली है और जंग में उतरने को तैयार हैं। साथ ही इन्होंने जनता को लुभाने की भी तैयारी अच्छे से कर ली है। अब कुछ ही महीनों में सभी पार्टियाँ अपने-अपने वादों को बतलाती हुयी नजर आयेंगी। चुनाव प्रचार के दौरान तरह तरह के वादे किये जायेंगे और उन्हें निभाने का भी पूर्ण विश्वास दिलाया जायेगा, क्योंकि जनता के सेवकों को तो पता ही है कि यदि एक बार वे चुनाव जीत गए, तो उसके बाद जनता चाहे कुछ भी माँग करे, उन्हें चलना तो अपनी मर्जी से ही है। हाँ कुछ वादे जरूर पूरे किये जायेंगे ताकि भोली जनता को यह अहसास दिलाया जा सके कि उन्होंने उनके साथ धोखा तो नहीं ही किया है। चुनाव के दौरान ये जगह जगह रैलियाँ करेंगे, गरीबों के साथ बैठकर खाना खायेंगे। उन्हें यह जताने की कोशिश करेंगे कि वे उनके साथ हैं। लेकिन ये सब दिखावा होता है,  सब वोट हासिल करने की जिद्दोजहद होती है। न ही तो इन्हें गरीबों से कोई लगाव है और ना ये कुछ करना चाहते हैं। ये बस जीतने के लिए जनता का इस्तेमाल करते हैं। यदि इन्हें वास्तव में गरीबों की इतनी ही फिक्र है तो इन्हें उनके साथ बैठकर खाना खाने की जगह उनकी परेशानियों को तुरन्त हल करने के बारे में सोचना चाहिए।
           आखिर क्यों ये राजनीतिक पार्टियाँ लोगों को लालच देकर वोट हासिल करना चाहती हैं। यदि इन्हें इस देश और यहाँ के लोगों की सही में चिन्ता है, तो चुनाव के पहले वे क्यों नहीं लोगों की मदद करते हैं, क्यों चुनाव आने पर ही ये जनता का विश्वास जीतना चाहते हैं। इन पार्टियों की हालत तो ये है कि यदि सरकार में रहने वाली पार्टी ने कोई काम किया या फिर कोई योजना लायी, तो विपक्षी पार्टियाँ जरूर उस काम की आलोचना करेंगी तथा उसको जनता के लिए हानिकारक बतायेंगी। भले ही यही काम उन्होंने अपनी सरकार के दौरान किया हो। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि जिस पार्टी की सरकार है, उसने कोई अच्छी योजना लायी हो और विपक्षी  पार्टियों ने उनके काम की सराहना की हो, क्योंकि बुराई करना इनकी आदत बन चुकी है। वे योजनाओं के बारे में सोचते तक नहीं हैं, बस बिना कुछ सोचे समझे आलोचना करते हैं। अधिकतर पार्टियों और इनके नेताओं का यही हाल है। अब पता नहीं ऐसा कर के वे क्या साबित करना चाहते हैं। इन्हें देश के विकास, लोगों की जरूरतों से बहुत कम ही मतलब रहता है। ये तो बस एक दूसरे से लड़ना जानते हैं, जब तक की इन्हें एक दूसरे से कोई फायदा न हो। जब इन्हें एक दूसरे की जरूरत होती है तभी ये साथ आते हैं और तभी गठबंधन होता है।
          गलती सिर्फ राजनेताओं, राजनीतिक पार्टियों की ही नहीं है, गलती हम जैसे लोगों की भी है, गलती उस हर एक ऐसी जनता की है, जो जागरूक नहीं है। हम लोग भी इनकी लुभावनी बातों में आ जाते हैं तथा लालच के चक्कर में इन्हें वोट देते हैं। पिछले चुनावों में मैंने खुद ऐसी ही एक स्थिति बनते देखा था कि जनता किसी पार्टी को सिर्फ इसलिए वोट दे रही है कि वो उन्हें कुछ वस्तुयें दे रहा है। जो कि शायद ही उसके लिए बहुत ज्यादा जरूरी है। पहले तो हम लालच के चलते उनका साथ दे देते हैं, बाद में वही दूसरे तरीके से हमारा शोषण करते हैं। यदि हमें इस सब को रोकना है तो पहले हमें खुद में बदलाव लाना होगा और इनमें उनका साथ देने से खुद को रोकना होगा।

Thursday, 1 September 2016

धर्म v/s विज्ञान

धर्म और विज्ञान, क्या ये दोनों अलग-अलग विषय हैं? क्या जहाँ धर्म है, वहाँ विज्ञान की कोई भी बात मायने नहीं रखती है और जहाँ विज्ञान है, वहाँ धर्म का कोई स्थान नहीं। बहुत से लोगों का यह मानना है कि जहाँ पर विज्ञान जाकर खत्म होता है, वहीं से धर्म की शुरूआत होती है। उनका ये भी मानना है कि जो बातें विज्ञान के द्वारा पता नहीं की जा सकती, वो धर्म के द्वारा पता की जा सकती हैं। लेकिन सत्य तो बिल्कुल ही इसके विपरीत है। धर्म और विज्ञान परस्पर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। धर्म का ये मतलब तो कतई नहीं की हम किसी विशिष्ट देवता को ही माने या फिर उनकी पूजा करें, हाँ ये हमारे रचयिता के प्रति आस्था को जरूर प्रकट करता है। धर्म तो इस संसार व यहाँ के लोगों को जानने व समझने का एक जरिया मात्र है और विज्ञान के द्वारा भी हम लगभग यही पता करते हैं। फिर पता नहीं ये दोनों अलग कैसे हो गए।
         
         आज का जो समय है, वहाँ के लोगों ने ही इसे अलग-अलग कर दिया है और तो और उन्होंने धर्म का भी बँटवारा कर दिया कि ये धर्म मेरा है और ये धर्म तुम्हारा है। इनकी पूजा हम करेंगे और इनकी तुम। इस समय लोग धर्म का प्रयोग ज्ञान के लिए नहीं कर रहे, बल्कि वो तो इसे लड़ाईयों व भेदभाव का आधार बना रहे हैं। धर्म जो कि मनुष्य व समाज के विकास में सहायक होना चाहिए, आज उसी धर्म के नाम पर हजारों कत्ल किये जा रहे हैं। यही वे लोग हैं जिन्होंने इस शब्द का मतलब ही बदल दिया और इसे बिल्कुल अलग रख दिया। जिस तरह से इन लोगों ने विज्ञान और धर्म को अलग-अलग किया और बाद में धर्म को भी बाँट दिया, हो सकता है कि आने वाले समय में ये लोग विज्ञान को भी खंडित कर दें। कहीं ऐसा न हो जाए कि पृथ्वी के किसी एक भाग के लोग कहें कि भौतिक विज्ञान (Physics) पर हमारा अधिकार है और दूसरे भाग के लोग कहें कि जीव विज्ञान (Biology) पर हमारा अधिकार है। वहीं तीसरे भाग के लोग कहीं रसायन विज्ञान ( Chemistry) पर अपना आधिपत्य न जमाने लगें। अब बताइये जरा यदि विज्ञान की ये तीनों शाखायें अलग-अलग हो जायें तो क्या आगे कोई खोज संभव हो पायेगी, क्या नये आविष्कार हो पायेंगें। नहीं हो पायेगें, क्योंकि हम जानते हैं कि ये तीनों विषय परस्पर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ठीक उसी प्रकार धर्म और विज्ञान भी एक दूसरे से संबंधित हैं।
      
          विज्ञान के बारे में प्रारम्भिक ज्ञान हमें धर्म से प्राप्त हुआ है और धर्म का पुरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमने विज्ञान का सहारा लिया है। जैसे हमें यदि कहीं पर खुदाई में कोई वस्तु प्राप्त होती है तो हम तकनीक का प्रयोग करके उस वस्तु के समय काल का पता लगाते हैं और फिर वहाँ की सभ्यता व संस्कृतियों का अनुमान लगाते हैं। वैसे ही धर्म विज्ञान को अपनी पुरानी पद्धतियों से परिचय कराता है ताकि वो किसी नए खोज या आविष्कार का आधार बन सकें। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि धर्म और विज्ञान दोनों का ही लोग, समाज व  वहाँ की संस्कृतियों के विकास में बराबर का योगदान है और आगे भी हम इन दोनों की सहायता से ही विकास करेंगे और अनसुलझे रहस्यों को सुलझायेंगे।