Wednesday, 6 September 2017

देशभक्ति के अर्थ को नये ढंग से परिभाषित करती फिल्म - रंग दे बसंती



हम सभी का इस देश के नागरिक होने के नाते, क्या कोई फर्ज नहीं बनता कि हम अपनी जिम्मेदारियों को अच्छी तरह से समझें व उनका पालन करें। क्या हम यूँ ही भागते रहेंगे, अपनी उन जिम्मेदारीयों से, जो हमारी इस देश के प्रति बनती हैं। आखिर दूसरों की गलतियों पर हम कब तक पर्दा डालते रहेंगे, कब तक बर्दाश्त करेंगे। ये बर्दाशत की हद कभी ना कभी तो पार होगी ही। 
         राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित फिल्म 'रंग दे बसन्ती' में यही दिखाया गया है। पहले तो इस फिल्म के कुछ किरदार देश के लिए अपनी जिम्मेदारियों से दूर भागते दिखायी पड़ते हैं और इस देश के सिस्टम को कभी न सुधरने वाला समझते हैं। लेकिन जब क्रांति से संबंधित वे एक डाॅक्यूमेंट्री कर रहे होते हैं, तो उनमें एक भावना उभर कर आती है। जो उन्हें उनकी जिम्मेदारियों का अहसास कराती है। इसी दौरान उनका दोस्त जो कि एयर फोर्स में पायलट है, शहीद हो जाता है; जिसका कारण भ्रष्ट सरकारी सिस्टम है। तो वे उस सरकारी सिस्टम से लड़ने की सोचते हैं। लेकिन वो वहाँ कामयाब नहीं होते। फिर वो उस मंत्री को मार देते हैं, जो इस घटना के लिए जिम्मेदार है। लेकिन यहाँ भी बात नहीं बनती। उसके उलट भ्रष्ट मंत्री को महान बता दिया जाता है। अंत में वे सभी ये फैसला करते हैं कि वे पूरे देश को बता देंगे कि मंत्री को उन्होंने ही मारा है और वे रेडियो के जरिये ऐसा ही करते हैं। वे ये भी बतातें हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। लेकिन सरकार को तो बस मंत्री के हत्यारों से मतलब होता है। वो रेडियो स्टेशन पर फोर्स भेज देती है और समर्पण करने के बावजूद सब के सब मारे जाते हैं। ये जानने के बाद पूरे देश के युवाओं में एक उबाल आ जाता है, उसे वे एक नयी क्रांति की शुरूआत बताते हैं और इसमें एक किरदार 'डीजे' के दादाजी कहते हैं- " साहब जी साडा बच्चा दी कुर्बानी कबूल करें। " आखिर उन्होंने कुर्बानी ही तो दी है, इस देश के भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ। ठीक उसी प्रकार जैसे पहले क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ कुर्बानी दी थी।
          इस फिल्म में निर्देशक ने बड़ी अच्छी तरह से ये दिखाने की कोशिश की है कि यदि युवाओं में कुछ कर गुजरने का जज्बा आ जाये, तो वे उसे कर के ही दम लेते हैं और तब देशभक्ति की एक नयी मिशाल पेश होती है। इस फिल्म में सरकारी सिस्टम पर भी एक तंज कसा गया है, जो कि उन पाँचों युवाओं के निर्दोष होने के बावजूद भी, उन्हें नहीं बख्शती।
         स्टोरी व निर्देशन के अलावा इस फिल्म के लिखे गए गीत व संगीत कमाल के हैं। चाहे वो देश को समर्पित टाइटल ट्रैक 'रंग दे बसंती' हो या फिर माँ और बेटे के बिछुड़ने के दर्द को बयाँ करता हुआ 'लुका छिपी' गाना। हर गाने में प्रसून जोशी ने अपने शब्दों से व ए आर रहमान ने अपने धुनों से मन मोह लिया है। रही बात अदाकारी की, तो आमिर खान से लेकर वहीदा रहमान तक ने एक-एक सीन को बिल्कुल अच्छे से पकड़ा है। इसमें ऐलिस पैटन द्वारा निभाया गया, सू का किरदार भी अपना एक प्रभाव छोड़ता है। लेकिन सबसे अलग अदाकारी भगत सिंह व करन का रोल करने वाले एक्टर सिद्धार्थ ने की है। जिस तरह से सिद्धार्थ ने अपने फेसियल एक्सप्रेसन्स से अपने किरदार को मजबूती दी है, वो वाकई देखने लायक है।
         कुल मिलाकर 'रंग दे बसन्ती' फिल्म बाॅलीवुड की बाकी कामर्शियल फिल्मों से बिल्कुल हटकर है। जैसा कि कई समीक्षकों ने लिखा है, ये फिल्म वाकई देशभक्ति की एक नयी परिभाषा को जन्म देता है। इस फिल्म में देशभक्ति भी है, काॅलेज की मस्ती भी है और कुछ जगहों पर प्यार की झलक भी देखने को मिल जाती है।
         
                                                                                                     ( फोटो - विकिपीडिया )

Friday, 1 September 2017

तोशाखाना - सरकारी तोहफों का निवास स्थान

   हमारे प्रधानमंत्री मोदी जब भी किसी विदेशी दौरे पर जाते हैं, तो उन्हें अक्सर वहाँ की सरकार द्वारा कोई स्मृति चिन्ह या उपहार भेंट किया जाता है। लेकिन क्या ये सभी उपहार मोदी जी के स्वंय के होते हैं। नहीं, ऐसा नहीं है। जब भी कोई मंत्री, राजनयिक या कोई अन्य अधिकारी विदेशी दौरे पर जाते हैं और वहाँ यदि उन्हें कोई उपहार मिलता है, तो ये लोग इसे रखते नहीं हैं। बल्कि ये सारे उपहार विदेश मंत्रालय के तोशाखाना में जमा होते हैं। इस तोशाखाने में गुलदान, चटाई, कांच के बाॅक्स जैसी साधारण वस्तुओं से लेकर आइपैड, सोने की कढ़ाई वाले गाउन जैसी कई कीमती वस्तुएँ भी जमा हैं। 
         ऐसा नहीं है कि कोई मंत्री या अधिकारी इसे कभी अपने पास रख नहीं सकते। वे इन प्राप्त वस्तुओं की कीमत चुकाकर अपने साथ ले जा सकते हैं। विदेश मंत्रालय के जून 1978 के गजट के अनुसार इन प्राप्त तोहफों की कीमत का आकलन भारतीय बाजार की कीमतों के आधार पर किया जाता है और इन कीमतों का आकलन विदेश मंत्रालय ही करता है।
            जनवरी 2017 से लेकर मार्च 2017 तक अभी कुल 83 वस्तुएँ इस तोशाखाना में जमा हुयी हैं। जिसमें  आइफोन-7, वुलेन मफलर, कलाई घड़ी, सिल्वर कलर प्लेट, कालीन और ऐसी ही बहुत सी चीजें हैं। इसमें सबसे ज्यादा वस्तुएँ वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री निर्मला सितारमन ने जमा की हैं। इनके द्वारा इस बीच जमा की गयी कुल वस्तुओं की संख्या 17 है। इन्होंने एक टी पाॅट सेट, शैम्पेन ग्लासेस, एक baby doll (cloth), तीन wooden doll, एक पेन ड्राईव, एक पेंटिंग जैसी वस्तुएँ जमा कर के तोशाखाने की शोभा बढ़ाई है।
            इस दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इसे तोशाखाने में एक Mont blanc ball point pen, एक मूर्ति (Argillite Carving), एक Malachite Stone वाला फूलों का हार जैसी वस्तुएँ जमा की हैं। जबकि विदेश मंत्री सुषमा स्वाराज ने इस तोशाखाने में एक कैंडल स्टैंड, एक काॅफी सेट, एक गणेश जी की मूर्ति व एक टी सेट जमा किया है।

Wednesday, 9 August 2017

तारा पान सेंटर - पांच हजारी पान की दुकान

भारत में पान खाने का एक अलग ही क्रेज है और इसके शौकीन देश के हर हिस्से में मौजूद हैं। बहुतों के लिए यह माउथ फ्रेशनर के तौर पर खाया जाता है, तो बहुतों के लिए यह नशा भी है।
       
      अमूमन हमारी नजर में पान की कीमत दस, बीस रूपये या फिर अधिकतम पचास या सौ रूपये हो सकती है। लेकिन औरंगाबाद के तारा पान सेंटर में एक ऐसा पान मिलता है, जिसकी कीमत 5000 रूपये है और इस पान का नाम है 'कोहिनूर पान' ।
            
        ये कोहिनूर पान जोड़ों में बेचे जाते हैं और ये दो तरह के होते हैं। एक पुरूषों के लिए, दूसरा महिलाओं के लिए। अब ऐसा क्या है इस पान में जो इसे इतना महँगा बनाता है, तो हम आपको बताते हैं कि वो कौन-कौन सी चीजें हैं, जो इस कोहिनूर पान को पाँच हजारी बनाती हैं। पुरूषों वाले पान में ₹ 70 लाख प्रति किलोग्राम वाली कस्तूरी, ₹ 2 लाख प्रति किलोग्राम वाला केसर, ₹ 80,000 प्रति किलोग्राम वाला गुलाब, और ₹ 7 लाख प्रति किलोग्राम वाला 'अगर' नाम का एक लिक्विड फ्रेगरेंस, जो कि सिर्फ पश्चिम बंगाल में मिलता है, इस कोहिनूर पान में पड़ता है। इन सब के अलावा इसमें एक सीक्रेट इंग्रेडीयेंट्स भी पड़ता है, जिसका राज इस पान सेन्टर के मालिक मुहम्मद सैफुद्दीन सिद्दीकी ने छुपा कर के रखा है। वहीं जो पान महिलाओं के लिए होता है, उसमें गुलाब, सफेद मुसली जिसकी कीमत करीब ₹ 6000 प्रति किलोग्राम है और केसर डाला जिसकी मात्रा थोड़ी कम होती है। सैफुद्दीन साहब के अनुसार इस पान का प्रभाव दो दिनों तक बना रहता है।
       
         इस दुकान से लोग पान पैक करा कर भी ले जाते है और यहाँ पर इसे बड़े ही अच्छे तरीके से रंगीन डिब्बे में पैक कर के दिया जाता है और वो भी इत्र की बोतल के साथ में। ये देखने में बिल्कुल ऐसा लगता है, जैसे कि कोई गिफ्ट पैक किया गया हो। औरंगाबाद का यह मशहूर पान सेंटर करीब तीन दशकों से है और इस दुकान का पान भारत के बाहर दूसरे देशों जैसे, कुवैत, सऊदी अरब व दुबई में भी भेजा जाता है।

       ऐसा नहीं है कि यहाँ पर सिर्फ कोहिनूर पान ही मिलता है, यदि ऐसा होता तो यहाँ पर सिर्फ रईस लोग ही पान खाने आते। लेकिन यहाँ पर छोटे-बड़े हर लोग आते हैं और इस दुकान में हर वक्त भीड़ लगी रहती है। यहाँ मिलने वाली पान की रेंज पाँच रूपये से शुरू होकर पाँच हजार तक है। कोहिनूर पान के अलावा यहाँ पर राजा-रानी मसाला पान, हनीमून मसाला पान भी काफी मशहूर है।

                                                                                                                               ( PHOTO - TABLEHOPPER )

Friday, 14 July 2017

इनरलाइन पास : जिन्दगी से रूबरू कराती एक यात्रा

कैसा लगे जब हम एक जगह पर बैठकर, एक ही काम करते हुए अपनी पूरी ज़िन्दगी बिता दें। यह कुछ लोगों के लिए बहुत बुरी बात होगी, लेकिन आजकल बहुत से लोग ऐसी ही ज़िन्दगी चुन रहे हैं। सुबह उठना, आॅफिस जाना, आॅफिस से घर आना, खान, पीना व सो जाना। फिर सुबह उठना और वही सुबकुछ। यही लाईफ आज हर किसी की है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इन बनी बनायी धाराओं पर नहीं चलते। वे अपने मुकाम खुद चुनते हैं, व रास्ते भी खुद ही बनाते हैं। उमेश पंत भी उन्हीं में से एक हैं। आज मैंने उनकी लिखी किताब "इनरलाइन पास" पढ़कर खत्म कर ली। इसे पढ़कर ज़िन्दगी का सही मतलब समझ में आया व ज़िन्दगी व मौत को करीब से जानने का मौका भी मिला। सच में मैं इसे पढ़ते वक्त उस दुनिया में चला गया था, जहाँ पर मैं हमेशा से जाना चाहता था। यह किताब सिर्फ एक यात्रावृतांत भर नहीं है। इसमें तो इतिहास भी है, लोगों की मेहनत है और सबसे ज्यादा इंसानियत और आदर व सत्कार की भावना है, जो आज हमें कभी मेट्रो सिटीज में देखने को नहीं मिलती।

         किताब के शुरूआती पन्नों में उमेश पंत ने एक अनंत यात्रा की बात की है, जो कि बिना कहीं घुमे-फिरे, बिना कुछ नया देखे, पुराने ढर्रे पर खत्म हो जाती है। इसमें लेखक ने एक और बात कही है कि हम जिन उत्पादों की निर्माण प्रकिया का हिस्सा होते हैं, वो उत्पाद घुमा फिरा कर हमें ही बेच दिया जाता है। बहुत से लोग ये सच जानते हुए भी इससे बचकर निकल नहीं पाते है व अपने आप को मजबूर समझकर बँधे रहते हैं। इस किताब में लेखक इसी बंधन को तोड़कर अपनी दुनिया में निकल जाता है। दिल्ली से लेकर कैलाश मानसरोवर तक की इस यात्रा को पढ़ते वक्त हर समय मन रोमांचित हो उठता है व आँखों के सामने विहंगम दृश्य अपने आप बनते चले जाते हैं। मानों कि लेखक की नजर से ये यात्रा आप खुद कर रहे हों। इस किताब में किसी इंसान का दर्द, तो किसी की खुशी, किसी का डर, तो किसी की मजबूरी सबकुछ मिलेगा। एक जगह लेखक ने लिखा भी है, "ज़िन्दगी एक ही परिस्थिति को हमलोगों में किस तरह से बाँट देती है ! जो हमारा शौक था, वो उनकी मजबूरी थी।"

       लेखक ने इसमें एक खास अनुभव को भी शामिल किया है कि कैसे उन्होंने और उनके दोस्त ने एक पूरी रात ऐसे जंगल में गुजारी, जहाँ लगातार बारिश हो रही थी व ठंड ऐसी की शरीर को गला कर रख दे। ऊपर से चौबीस घंटों से बिना कुछ खाये पीये। ऐसे विषम परिस्थितियों में दोनों ने अपना हौसला बनाये रखा व मौत को शिकस्त दी। वास्तव में उनकी ये रात डराने के साथ-साथ उन्हें कुछ सिखाकर भी गयी।
       एक जगह लेखक ने बहुत अच्छा लिखा है कि पैसा हासिल करने के लिए नौकरी नहीं, बल्कि अनुभव हासिल करने के लिए यात्रायें अगर जीवन का सच बन जाती, तो ज़िन्दगी कितनी हसीन होती ! पर अफसोस ये बात हम सभी के जीवन की सच्चाई नहीं हैं। 

Sunday, 5 March 2017

खगोलविज्ञान व गणित के महान पंडित : आर्यभट्ट




हमारे देश भारत में कई महान वैज्ञानिकों ने जन्म लिया है। इन्हीं महान वैज्ञानिकों में से एक नाम आर्यभट्ट का भी है। मूलत: हम सब इन्हें शून्य की खोज के लिये जानते हैं। शून्य की खोज के अलावा आर्यभट्ट ने खगोलविज्ञान और गणित के कई सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था। जिसकी वजह से वे विश्व के महानतम वैज्ञानिकों में से एक बन गये। बहुत से लोगों का यह मानना है कि सूर्य व पृथ्वी के बीच सही संबंधों को बतलाने वाला पहला व्यक्ति निकोलस कापरनिकस था। लेकिन आर्यभट्ट ने निकोलस कापरनिकस के जन्म के कई वर्ष पूर्व ही सूर्य व पृथ्वी के इन संबंधों को दुनिया के सामने रखा। इसके अलावा इन्होंने यह भी बतलाया कि चन्द्रमा और पृथ्वी जैसे दूसरे ग्रह अपने स्वयं के  प्रकाश से नहीं बल्कि सूर्य के प्रकाश से चमकते हैं। हिन्दू धर्म के सूर्य व चन्द्र ग्रहण की पुरानी मान्यताओं को भी आर्यभट्ट ने गलत सिद्ध किया।
             आर्यभट्ट का जन्म 476 में कुसुमपुर में हुआ था। जो कि आज के समय के पटना के रूप में जाना जाता है। हालांकि उनके जन्म स्थान को लेकर विवाद भी रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि आर्यभट्ट का जन्म अश्मक (महाराष्ट्र) में हुआ था और वे कुसुमपुर शिक्षा ग्रहण करने के लिये आये थे। जबकि कुछ लोग कुसुमपुर को ही उनका जन्म स्थान मानते हैं। आर्यभट्ट ने खगोलविज्ञान व गणित से संबंधित कई ग्रंथों की रचना की। जैसे - आर्यभट्टीयम्, दशगीतिका, आर्यभट्ट सिद्धांत और तंत्र। उन्होंने इन सभी ग्रंथों की रचना काव्य के रूप में की थी।
   
          आर्यभट्ट द्वारा लिखे गये ग्रंथों में से सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ आर्यभट्टीयम् है। इस ग्रंथ में खगोलशास्त्र, अंकगणित, बीजगणित और त्रिकोणमिति के कई नियम दिये गये हैं। आर्यभट्टीयम् को कभी-कभी आर्य-शत-अष्ट के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस ग्रंथ के पाठों में छंदो की संख्या 108 है। इस ग्रंथ में वर्गमूल  (square root), घनमूल  (cube root), समानान्तर श्रेणी ( Arithmetic Progression ) के साथ-साथ सतत भिन्न (Continued Function), द्विघात समीकरण (Quadratic Equation), Table of sines, घात श्रंखला के योग (Sums of power series) तथा विभिन्न प्रकार के समीकरणों का वर्णन मिलता है। इस पूरे ग्रंथ में 108 छंद है तथा इसे चार अध्यायों में विभाजित किया गया है। ये चार अध्याय गीतिकपाद, गणितपाद, कालक्रियापाद व गोलापद है। इन चारों अध्यायों में कल्प, युग, ज्यामितिक प्रगति, ग्रहों की स्थिति निर्धारण करने की विधि, पृथ्वी के आकार, दिन और रात के कारण जैसी अनेकों महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी गयी हैं। इस ग्रंथ की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि ये ग्रंथ आज के आधुनिक समय में भी अस्तित्व में है।
           आर्यभट्ट के द्वारा लिखा हुआ एक और ग्रंथ आर्यभट्ट सिद्धांत है। यह ग्रंथ खगोलीय गणनाओं के विषय में है। इस ग्रंथ का सातवें शतक में व्यापक उपयोग होता था, लेकिन अब यह ग्रंथ बिल्कुल लुप्त हो चुका है और इस समय इस ग्रंथ के केवल 34 श्लोक ही उपलब्ध हैं। आज इसके बारे में हमें जो कुछ भी जानकारी मिल पायी है, वह आर्यभट्ट के समकालीन रह चुके वराहमिहीर के लेखनों से या फिर उनके बाद के गणितज्ञों जैसे ब्रह्मगुप्त और भाष्कर प्रथम के कार्यों से ही मिल पायी है। इनके लेखनों से हमें यह पता चलता है कि इसमें पुराने सूर्य सिद्धांतों पर आधारित कार्यों का वर्णन है। इस लुप्त हुए ग्रंथ में अनेक खगोलीय उपकरणों के शामिल होने की भी जानकारी मिलती है। जैसे कि यस्ती यन्त्र (बेलनाकार छड़ी), शंकु यन्त्र, छाया यन्त्र, धनुर यन्त्र, एक छत्र आकार का उपकरण जिसे छत्र यन्त्र कहा जाता है। इसमें धनुषाकार व बेलनाकार जल घड़ियों का भी उल्लेख मिलता है।
            अरबी भाषा में लिखा गया एक ग्रंथ अल नत्फ को आर्यभट्ट के ही किसी ग्रंथ का अनुवाद माना जाता है। परन्तु इसका संस्कृत नाम अभी तक अज्ञात है। शायद नौवीं सदी के अभिलेखन में यह फारसी विद्वान व भारतीय इतिहासकार अबू रेहान अल बिरूनी द्वारा उल्लेखित किया गया है।
        नालंदा विश्वविद्यालय से तो हम सभी परिचित हैं। ये उस समय अपनी शिक्षण व्यवस्था के लिये पूरे विश्व में विख्यात था। मगध स्थित इस विश्वविद्याल में सुदुर देश-विदेश के विद्यार्थी यहाँ शिक्षा ग्रहण करने के लिये आते थे। एक प्राचीन श्लोक के अनुसार ऐसा माना जाता है कि आर्यभट्ट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके थे।
    आर्यभट्ट ने उस समय बिना किसी आधुनिक उपकरणों की सहायता से पृथ्वी की परिधि का मान बिल्कुल सही-सही बताया। जिसमें आज के समय के अनुसार सिर्फ 65 मील की ही अशुद्धि है। उन्होंने पृथ्वी के घूमने के हिसाब से समय को विभाजित किया। इन्होंने सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलयुग को समान माना है। इनके अनुसार एक कल्प में 14 मन्वंतर और एक मन्वंतर में 72 महायुग और एक महायुग में चार युग सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलयुग होते हैं। आर्यभट्ट ने पाई (pi) के सन्निकट मान पर भी कार्य किया। आर्यभट्टीयम् के दूसरे भाग में उन्होंने किसी वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात ज्ञात किया है और उन्होंने इसका मान 3.1416 बतलाया है। जो कि पाई के आज के ज्ञात मान से बिल्कुल मिलता है।
          आर्यभट्ट द्वारा किये गये कार्यों ने कई पड़ोसी संस्कृतियों को भी प्रभावित किया। इस्लामी स्वर्ण युग (820 ई•) के दौरान उनके ग्रंथों का अरबी अनुवाद किया गया। आर्यभट्ट की खगोलीय गणना की विधियाँ भी बहुत ही प्रभावशाली थी। उनके द्वारा बनायी गयी त्रिकोणमिति तालिकाओं का प्रयोग इस्लाम में अरबी खगोलीय तालिकाओं जिन्हें जिज के नाम से जाना जाता है की गणना के लिए इस्तेमाल किया जाता था। हम कह सकते हैं कि आर्यभट्ट ने पूरी दुनिया को ब्रह्माण्ड के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिये एक दिशा दे दी। उनके द्वारा बनाये गये नियमों को कई संस्कृतियों ने अपनाया। उनके इन उत्कृष्ट कार्यों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। लेकिन फिर भी आज हम उनके कुछ ग्रंथों को बचा नहीं पाये हैं।
         आर्यभट्ट के सम्मान में ही भारत के प्रथम उपग्रह का नाम आर्यभट्ट रखा गया। खगोल विज्ञान और वायुमंडलीय विज्ञान में अनुसंधान के लिये भारत में नैनीताल के निकट एक संस्थान का नाम आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान उन्हीं के नाम पर रखा गया है। बैसिलस आर्यभट्ट यह इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा खोजी गयी बैक्टीरिया की एक प्रजाति का नाम है जो कि आर्यभट्ट के नाम पर ही रखा गया है।

                                                                                                ( फोटो -  विकिपीडिया )

Thursday, 12 January 2017

शिक्षा - ज्ञान का माध्यम या जीवन-यापन की जरूरत

आज के इस वर्तमान समय में शिक्षा के मायने ही बदल गये हैं। लोग तो बस यही सोचते हैं कि वो पढ़-लिख लें, ताकि एक अच्छी सी नौकरी मिल जाये और जिन्दगी की नईया को काटने में कोई तकलीफ व परेशानी न हो। पहले शिक्षा जहाँ ज्ञान प्राप्ति का साधन था, वहीं आज ये नौकरी पाने का एक जरिया भर बन कर रह गया है। आजकल बहुत से लोग इसलिए शिक्षित, नहीं होना चाहते क्योंकि उनकी किसी विशेष विषय में रूचि है या वे उसके बारे में जानना चाहते हैं, बल्कि वो तो बस इसलिए शिक्षित होते हैं क्योंकि वे अपने भविष्य को सुरक्षित रखना चाहते हैं। भले ही उनकी अपने पढ़े हुए विषय के बारे में जानकारी न के बराबर हो। ऐसे लोगों के लिए ज्ञान से ज्यादा डिग्री का महत्व होता है। वो तो बस अच्छी से अच्छी डिग्री को हासिल करने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। चाहे इसके लिए  उनको कितने भी रूपये क्यों न देने पड़े हों। अभिवावकों की स्थिति भी यही है, वो भी अपने बच्चों का एडमिशन पैसे-रूपये देकर किसी बड़े काॅलेज में करा देते हैं और सोचते हैं कि एडमिशन होने के बाद तो नौकरी मिल ही जायेगी। नहीं मिली तो फिर रूपये कब काम आयेंगे।
        भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए नौकरी भी जरूरी है, लेकिन शिक्षा का इस कदर मजाक क्यों। क्यों लोग आजकल इसका सिर्फ इस्तेमाल कर रहे हैं ? सिर्फ डिग्रियों को महत्व देने वाले ऐसे लोग जब किसी जगह पर काम करने के लिए जाते हैं, तो वहाँ कि गुणवत्ता को तो प्रभावित करते ही हैं, साथ में अपने आस-पास के वातावरण को भी दूषित करते हैं। यदि ऐसे लोग अध्यापन के क्षेत्र में चले गये, फिर तो पूछना ही नहीं है। सरकारी प्राइमरी व माध्यमिक विद्यालयों का हाल तो हम सबको पता ही है। यहाँ पर शिक्षक पढ़ाने के उद्देश्य से कभी नहीं आते हैं। वे तो बस यहाँ पर आकर किसी भी तरह समय काटते हैं। फिर भी सरकार इन पर करोड़ों रूपये फूँक रही है व इनको तमाम सुविधायें उपलब्ध करा रही है। ऐसे ही लोगों कि वजह से हमारे देश में शिक्षा का स्तर दिनों पर दिन गिरता जा रहा है।
  
        हमारे देश में हर साल हजारों की संख्या में इंजीनियरिंग के स्टूडेंट्स ग्रेजुएट होते हैं, लेकिन इनमें से कितने ऐसे हैं, जिनकी वास्तव में इस क्षेत्र में रूचि होती है। यदि देखा जाए तो यह संख्या बहुत ही कम है। वे इसे या तो इसलिए पढ़ रहे होते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इस कोर्स को पूरा करने के बाद उन्हें एक अच्छी नौकरी मिल जायेगी या यदि वे जानते भी हैं कि उनकी इस क्षेत्र में रूचि नहीं है, फिर भी अभिवावक के दबाव में आकर उन्हें ऐसा करना पड़ता है। परिणाम यह होता है कि कोर्स को पूरा कर लेने के बाद भी वे बेरोजगार होते हैं। यदि ऐसे लोग शिक्षा को नौकरी पाने का जरिया न मानकर ज्ञान प्राप्ति का साधन मानें व उसी क्षेत्र में अपना करियर बनाये, जिनमें उनकी रूचि हो तो कितना अच्छा है। बहुत से लोग पुराने परंपरागत कोर्सों जैसे इंजीनियरिंग, डाॅक्टरी को ही सही मानते है और सोचते हैं कि इसी से भविष्य सुरक्षित रह सकता है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। संगीत, नृत्य, कला जैसे अलग क्षेत्र भी शिक्षा के ही एक भाग हैं। ऐसा नहीं है कि जिसने B.Tech, MBBS, LLB, PHD किया हो वही शिक्षित हो। अपने क्षेत्र में कुशल होना ही वास्तविक शिक्षा है। चाहे व सामाजिक क्षेत्र हो या फिर कुछ और।
       
     मैंने बहुतों को तो यह कहते भी सुना है कि   जिन्दगी भर पढ़ते व सीखते ही रहोगे क्या। वे यह नहीं जानते कि जीवन पर्यन्त पढ़ते व सीखते रहने से हमारे अपने ही ज्ञान में वृद्धि होगी। सोचिये जरा यदि नौकरी मिल जाने के बाद हम पढ़ना, लिखना और कुछ सीखना छोड़ दें, और जिन्दगी काटते-काटते एक दिन इस दुनिया को अलविदा कह दें तो इसका कोई फायदा है। इससे अच्छा है कि हम रोज कुछ न कुछ पढ़ते व सीखते रहें व इस दुनिया को एक नये नजरिये से देखें व समझें।

Friday, 6 January 2017

रविन्द्र कौशिक- भारत का ब्लैक टाईगर


हमने फिल्मों व कहानियों में कई दफा जासूसों के बारे में देखा व पढ़ा होगा। इन्हें देखकर तो यही लगता है कि इनकी ज़िन्दगी कितनी रोमांचक होती होगी, लेकिन सच्चाई तो कुछ और ही होती है। इनकी ज़िन्दगी में रोमांच तो होता है, लेकिन इसके साथ ही हर वक्त, हर पल मौत का सायां इनके साथ-साथ चलता रहता है। ऐसे ही एक भारतीय जासूस थे, रविन्द्र कौशिक। जिन्होंने देश के लिए अपनी जान तक न्यौछावर कर दी। 
       रविन्द्र कौशिक का जन्म राजस्थान के श्रीगंगानगर में 11 अप्रैल, 1952 को हुआ था और वो यहीं पर पले-बढ़े। रविन्द्र को बचपन से ही एक्टिंग का शौक था। स्कूल के दिनों में वो दूसरे लोगों की नकल(mimicry) बड़े ही अच्छे ढंग से किया करते  थे, जिसके चलते वो अपने पूरे स्कूल में चर्चित थे। वे अपने ख्वाब को पूरा करते हुए आगे चलकर एक थियेटर आर्टिस्ट भी बने। ऐसे ही जब वो एक बार लखनऊ में अपना प्रोगाम कर रहे थे, तो उनके इस एक्टिंग की प्रतिभा को भारतीय खुफिया एजेंसी राॅ के कुछ अधिकारियों ने देखा। उन्होंने रविन्द्र को पाकिस्तान में भारत का अंडरकवर एजेंट (जासूस) बनने का आॅफर दिया। जिसे रविन्द्र ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद दो साल तक दिल्ली में उन्हें प्रशिक्षित किया गया। इस दौरान उन्हें उर्दू भाषा सीखायी गयी व पाकिस्तान से जुड़ी अन्य सभी जानकारियाँ भी दी गयीं।
     सन् 1975 में पूरी तैयारी के साथ रविन्द्र   पाकिस्तान पहुँचे। यहाँ पर इनका नाम नबी अहमद शाकिर था। पाकिस्तान में आकर इन्होंने कानून की पढ़ाई के लिए काॅलेज में दाखिला ले लिया। इसे पूरा करने के बाद उनको पाकिस्तानी आर्मी में एक कमीशंड आॅफिसर के रूप में नौकरी मिल गयी। धीरे-धीरे प्रमोशन करके वो आर्मी में मेजर की रैंक तक पहुँचने में सफल हुए। यहाँ पर इन्होंने एक पाकिस्तानी लड़की अमानत से शादी भी कर ली। बाद में उनका एक बच्चा भी हुआ। सन् 1979 से 1983 के दौरान रविन्द्र कौशिक ने कई महत्वपूर्ण सूचनायें राॅ को भेजीं। जिसकी वजह से भारतीय बलों को बहुत सहायता मिली। इस दौरान उन्हें एक और नया नाम  "ब्लैक टाईगर" मिला। यह नाम उनको भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा दिया गया था।
       सन् 1983 का साल रविन्द्र कौशिक के लिए बुरा साबित हुआ। इस साल भारतीय खुफिया एजेंसियों ने एक   और जासूस इनायत मसीहा को पाकिस्तान में रविन्द्र कौशिक की मदद करने के लिए भेजा। लेकिन वो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के द्वारा पकड़े गये। इनायत मसीहा ने पकड़े जाने के बाद रविन्द्र कौशिक के बारे में भी सबकुछ बता दिया। इसके बाद रविन्द्र कौशिक को भी गिरफ्तार कर लिया गया। सन् 1985 में उन्हें मौत की सजा सुनायी गयी। लेकिन बाद में पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे उम्रकैद में बदल दिया गया। इसके बाद उन्हें सियालकोट व कोट लखपत जैसे कई जेलों में रखा गया। अपनी सजा के दौरान रविन्द्र ने चुपके से कई चिट्ठियाँ अपने परिवार वालों को लिखीं। इन चिट्ठियों के माध्यम से वह अपने ऊपर होने वाले जुल्मों के बारे में बताते थे। एक चिट्ठी में तो उन्होंने लिखा है, "क्या भारत जैसे देश के लिए कुर्बानी देने वालों को यही मिलता है?" जाहिर सी बात है कि रविन्द्र के पाकिस्तान में पकड़े जाने के बाद उस समय की तत्कालीन सरकार ने उनको भारत में वापस लाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने करीब 16 साल जेल में बिताये। इन 16 सालों में वो टीबी व अस्थमा जैसी कई बिमारियों के शिकार हो गये और अंत में सन् 2001 में पाकिस्तान के मियांवली जेल में उनकी मौत हो गयी।
      रविन्द्र कौशिक की माँ अमलादेवी ने उनको वापस लाने के लिए ढेरों पत्र भारत सरकार को लिखे थे, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। सरकार ने रविन्द्र की कोई भी मदद नहीं की। अंततः उनको मौत ही नसीब हुयी। रविन्द्र की मौत के बाद सरकार ने बस इतना ही किया कि उनकी माँ को 500 रूपये प्रति महीने पेंशन के तौर पर दिये जाने लगे, जिसे कुछ सालों बाद बढ़ाकर 2000 कर दिया गया। सन् 2006 में रविन्द्र के माँ की भी मौत हो गयी।
      रविन्द्र कौशिक ने देश की खातिर अपनी जिन्दगी के 26 साल कुर्बान कर दिये, जिसमें से वो 16 से अधिक सालों तक तो जेल में रहे। वास्तव में वे उन चंद लोगों में से हैं, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान तक दाँव पर लगा दी। उनकी मौत के इतने सालों के बाद वो सरकार द्वारा तो भुला दिये गये हैं, लेकिन हमारा यह फर्ज बनता है कि हम उनकी कुर्बानी को याद रखें और उनके प्रति एक सम्मान की भावना को बनाये रखें।


                                                                                               (Photo- The Telegraph)