Sunday, 5 March 2017

खगोलविज्ञान व गणित के महान पंडित : आर्यभट्ट




हमारे देश भारत में कई महान वैज्ञानिकों ने जन्म लिया है। इन्हीं महान वैज्ञानिकों में से एक नाम आर्यभट्ट का भी है। मूलत: हम सब इन्हें शून्य की खोज के लिये जानते हैं। शून्य की खोज के अलावा आर्यभट्ट ने खगोलविज्ञान और गणित के कई सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था। जिसकी वजह से वे विश्व के महानतम वैज्ञानिकों में से एक बन गये। बहुत से लोगों का यह मानना है कि सूर्य व पृथ्वी के बीच सही संबंधों को बतलाने वाला पहला व्यक्ति निकोलस कापरनिकस था। लेकिन आर्यभट्ट ने निकोलस कापरनिकस के जन्म के कई वर्ष पूर्व ही सूर्य व पृथ्वी के इन संबंधों को दुनिया के सामने रखा। इसके अलावा इन्होंने यह भी बतलाया कि चन्द्रमा और पृथ्वी जैसे दूसरे ग्रह अपने स्वयं के  प्रकाश से नहीं बल्कि सूर्य के प्रकाश से चमकते हैं। हिन्दू धर्म के सूर्य व चन्द्र ग्रहण की पुरानी मान्यताओं को भी आर्यभट्ट ने गलत सिद्ध किया।
             आर्यभट्ट का जन्म 476 में कुसुमपुर में हुआ था। जो कि आज के समय के पटना के रूप में जाना जाता है। हालांकि उनके जन्म स्थान को लेकर विवाद भी रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि आर्यभट्ट का जन्म अश्मक (महाराष्ट्र) में हुआ था और वे कुसुमपुर शिक्षा ग्रहण करने के लिये आये थे। जबकि कुछ लोग कुसुमपुर को ही उनका जन्म स्थान मानते हैं। आर्यभट्ट ने खगोलविज्ञान व गणित से संबंधित कई ग्रंथों की रचना की। जैसे - आर्यभट्टीयम्, दशगीतिका, आर्यभट्ट सिद्धांत और तंत्र। उन्होंने इन सभी ग्रंथों की रचना काव्य के रूप में की थी।
   
          आर्यभट्ट द्वारा लिखे गये ग्रंथों में से सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ आर्यभट्टीयम् है। इस ग्रंथ में खगोलशास्त्र, अंकगणित, बीजगणित और त्रिकोणमिति के कई नियम दिये गये हैं। आर्यभट्टीयम् को कभी-कभी आर्य-शत-अष्ट के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस ग्रंथ के पाठों में छंदो की संख्या 108 है। इस ग्रंथ में वर्गमूल  (square root), घनमूल  (cube root), समानान्तर श्रेणी ( Arithmetic Progression ) के साथ-साथ सतत भिन्न (Continued Function), द्विघात समीकरण (Quadratic Equation), Table of sines, घात श्रंखला के योग (Sums of power series) तथा विभिन्न प्रकार के समीकरणों का वर्णन मिलता है। इस पूरे ग्रंथ में 108 छंद है तथा इसे चार अध्यायों में विभाजित किया गया है। ये चार अध्याय गीतिकपाद, गणितपाद, कालक्रियापाद व गोलापद है। इन चारों अध्यायों में कल्प, युग, ज्यामितिक प्रगति, ग्रहों की स्थिति निर्धारण करने की विधि, पृथ्वी के आकार, दिन और रात के कारण जैसी अनेकों महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी गयी हैं। इस ग्रंथ की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि ये ग्रंथ आज के आधुनिक समय में भी अस्तित्व में है।
           आर्यभट्ट के द्वारा लिखा हुआ एक और ग्रंथ आर्यभट्ट सिद्धांत है। यह ग्रंथ खगोलीय गणनाओं के विषय में है। इस ग्रंथ का सातवें शतक में व्यापक उपयोग होता था, लेकिन अब यह ग्रंथ बिल्कुल लुप्त हो चुका है और इस समय इस ग्रंथ के केवल 34 श्लोक ही उपलब्ध हैं। आज इसके बारे में हमें जो कुछ भी जानकारी मिल पायी है, वह आर्यभट्ट के समकालीन रह चुके वराहमिहीर के लेखनों से या फिर उनके बाद के गणितज्ञों जैसे ब्रह्मगुप्त और भाष्कर प्रथम के कार्यों से ही मिल पायी है। इनके लेखनों से हमें यह पता चलता है कि इसमें पुराने सूर्य सिद्धांतों पर आधारित कार्यों का वर्णन है। इस लुप्त हुए ग्रंथ में अनेक खगोलीय उपकरणों के शामिल होने की भी जानकारी मिलती है। जैसे कि यस्ती यन्त्र (बेलनाकार छड़ी), शंकु यन्त्र, छाया यन्त्र, धनुर यन्त्र, एक छत्र आकार का उपकरण जिसे छत्र यन्त्र कहा जाता है। इसमें धनुषाकार व बेलनाकार जल घड़ियों का भी उल्लेख मिलता है।
            अरबी भाषा में लिखा गया एक ग्रंथ अल नत्फ को आर्यभट्ट के ही किसी ग्रंथ का अनुवाद माना जाता है। परन्तु इसका संस्कृत नाम अभी तक अज्ञात है। शायद नौवीं सदी के अभिलेखन में यह फारसी विद्वान व भारतीय इतिहासकार अबू रेहान अल बिरूनी द्वारा उल्लेखित किया गया है।
        नालंदा विश्वविद्यालय से तो हम सभी परिचित हैं। ये उस समय अपनी शिक्षण व्यवस्था के लिये पूरे विश्व में विख्यात था। मगध स्थित इस विश्वविद्याल में सुदुर देश-विदेश के विद्यार्थी यहाँ शिक्षा ग्रहण करने के लिये आते थे। एक प्राचीन श्लोक के अनुसार ऐसा माना जाता है कि आर्यभट्ट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके थे।
    आर्यभट्ट ने उस समय बिना किसी आधुनिक उपकरणों की सहायता से पृथ्वी की परिधि का मान बिल्कुल सही-सही बताया। जिसमें आज के समय के अनुसार सिर्फ 65 मील की ही अशुद्धि है। उन्होंने पृथ्वी के घूमने के हिसाब से समय को विभाजित किया। इन्होंने सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलयुग को समान माना है। इनके अनुसार एक कल्प में 14 मन्वंतर और एक मन्वंतर में 72 महायुग और एक महायुग में चार युग सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलयुग होते हैं। आर्यभट्ट ने पाई (pi) के सन्निकट मान पर भी कार्य किया। आर्यभट्टीयम् के दूसरे भाग में उन्होंने किसी वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात ज्ञात किया है और उन्होंने इसका मान 3.1416 बतलाया है। जो कि पाई के आज के ज्ञात मान से बिल्कुल मिलता है।
          आर्यभट्ट द्वारा किये गये कार्यों ने कई पड़ोसी संस्कृतियों को भी प्रभावित किया। इस्लामी स्वर्ण युग (820 ई•) के दौरान उनके ग्रंथों का अरबी अनुवाद किया गया। आर्यभट्ट की खगोलीय गणना की विधियाँ भी बहुत ही प्रभावशाली थी। उनके द्वारा बनायी गयी त्रिकोणमिति तालिकाओं का प्रयोग इस्लाम में अरबी खगोलीय तालिकाओं जिन्हें जिज के नाम से जाना जाता है की गणना के लिए इस्तेमाल किया जाता था। हम कह सकते हैं कि आर्यभट्ट ने पूरी दुनिया को ब्रह्माण्ड के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिये एक दिशा दे दी। उनके द्वारा बनाये गये नियमों को कई संस्कृतियों ने अपनाया। उनके इन उत्कृष्ट कार्यों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। लेकिन फिर भी आज हम उनके कुछ ग्रंथों को बचा नहीं पाये हैं।
         आर्यभट्ट के सम्मान में ही भारत के प्रथम उपग्रह का नाम आर्यभट्ट रखा गया। खगोल विज्ञान और वायुमंडलीय विज्ञान में अनुसंधान के लिये भारत में नैनीताल के निकट एक संस्थान का नाम आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान उन्हीं के नाम पर रखा गया है। बैसिलस आर्यभट्ट यह इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा खोजी गयी बैक्टीरिया की एक प्रजाति का नाम है जो कि आर्यभट्ट के नाम पर ही रखा गया है।

                                                                                                ( फोटो -  विकिपीडिया )

Thursday, 12 January 2017

शिक्षा - ज्ञान का माध्यम या जीवन-यापन की जरूरत

आज के इस वर्तमान समय में शिक्षा के मायने ही बदल गये हैं। लोग तो बस यही सोचते हैं कि वो पढ़-लिख लें, ताकि एक अच्छी सी नौकरी मिल जाये और जिन्दगी की नईया को काटने में कोई तकलीफ व परेशानी न हो। पहले शिक्षा जहाँ ज्ञान प्राप्ति का साधन था, वहीं आज ये नौकरी पाने का एक जरिया भर बन कर रह गया है। आजकल बहुत से लोग इसलिए शिक्षित, नहीं होना चाहते क्योंकि उनकी किसी विशेष विषय में रूचि है या वे उसके बारे में जानना चाहते हैं, बल्कि वो तो बस इसलिए शिक्षित होते हैं क्योंकि वे अपने भविष्य को सुरक्षित रखना चाहते हैं। भले ही उनकी अपने पढ़े हुए विषय के बारे में जानकारी न के बराबर हो। ऐसे लोगों के लिए ज्ञान से ज्यादा डिग्री का महत्व होता है। वो तो बस अच्छी से अच्छी डिग्री को हासिल करने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। चाहे इसके लिए  उनको कितने भी रूपये क्यों न देने पड़े हों। अभिवावकों की स्थिति भी यही है, वो भी अपने बच्चों का एडमिशन पैसे-रूपये देकर किसी बड़े काॅलेज में करा देते हैं और सोचते हैं कि एडमिशन होने के बाद तो नौकरी मिल ही जायेगी। नहीं मिली तो फिर रूपये कब काम आयेंगे।
        भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए नौकरी भी जरूरी है, लेकिन शिक्षा का इस कदर मजाक क्यों। क्यों लोग आजकल इसका सिर्फ इस्तेमाल कर रहे हैं ? सिर्फ डिग्रियों को महत्व देने वाले ऐसे लोग जब किसी जगह पर काम करने के लिए जाते हैं, तो वहाँ कि गुणवत्ता को तो प्रभावित करते ही हैं, साथ में अपने आस-पास के वातावरण को भी दूषित करते हैं। यदि ऐसे लोग अध्यापन के क्षेत्र में चले गये, फिर तो पूछना ही नहीं है। सरकारी प्राइमरी व माध्यमिक विद्यालयों का हाल तो हम सबको पता ही है। यहाँ पर शिक्षक पढ़ाने के उद्देश्य से कभी नहीं आते हैं। वे तो बस यहाँ पर आकर किसी भी तरह समय काटते हैं। फिर भी सरकार इन पर करोड़ों रूपये फूँक रही है व इनको तमाम सुविधायें उपलब्ध करा रही है। ऐसे ही लोगों कि वजह से हमारे देश में शिक्षा का स्तर दिनों पर दिन गिरता जा रहा है।
  
        हमारे देश में हर साल हजारों की संख्या में इंजीनियरिंग के स्टूडेंट्स ग्रेजुएट होते हैं, लेकिन इनमें से कितने ऐसे हैं, जिनकी वास्तव में इस क्षेत्र में रूचि होती है। यदि देखा जाए तो यह संख्या बहुत ही कम है। वे इसे या तो इसलिए पढ़ रहे होते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इस कोर्स को पूरा करने के बाद उन्हें एक अच्छी नौकरी मिल जायेगी या यदि वे जानते भी हैं कि उनकी इस क्षेत्र में रूचि नहीं है, फिर भी अभिवावक के दबाव में आकर उन्हें ऐसा करना पड़ता है। परिणाम यह होता है कि कोर्स को पूरा कर लेने के बाद भी वे बेरोजगार होते हैं। यदि ऐसे लोग शिक्षा को नौकरी पाने का जरिया न मानकर ज्ञान प्राप्ति का साधन मानें व उसी क्षेत्र में अपना करियर बनाये, जिनमें उनकी रूचि हो तो कितना अच्छा है। बहुत से लोग पुराने परंपरागत कोर्सों जैसे इंजीनियरिंग, डाॅक्टरी को ही सही मानते है और सोचते हैं कि इसी से भविष्य सुरक्षित रह सकता है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। संगीत, नृत्य, कला जैसे अलग क्षेत्र भी शिक्षा के ही एक भाग हैं। ऐसा नहीं है कि जिसने B.Tech, MBBS, LLB, PHD किया हो वही शिक्षित हो। अपने क्षेत्र में कुशल होना ही वास्तविक शिक्षा है। चाहे व सामाजिक क्षेत्र हो या फिर कुछ और।
       
     मैंने बहुतों को तो यह कहते भी सुना है कि   जिन्दगी भर पढ़ते व सीखते ही रहोगे क्या। वे यह नहीं जानते कि जीवन पर्यन्त पढ़ते व सीखते रहने से हमारे अपने ही ज्ञान में वृद्धि होगी। सोचिये जरा यदि नौकरी मिल जाने के बाद हम पढ़ना, लिखना और कुछ सीखना छोड़ दें, और जिन्दगी काटते-काटते एक दिन इस दुनिया को अलविदा कह दें तो इसका कोई फायदा है। इससे अच्छा है कि हम रोज कुछ न कुछ पढ़ते व सीखते रहें व इस दुनिया को एक नये नजरिये से देखें व समझें।

Friday, 6 January 2017

रविन्द्र कौशिक- भारत का ब्लैक टाईगर


हमने फिल्मों व कहानियों में कई दफा जासूसों के बारे में देखा व पढ़ा होगा। इन्हें देखकर तो यही लगता है कि इनकी ज़िन्दगी कितनी रोमांचक होती होगी, लेकिन सच्चाई तो कुछ और ही होती है। इनकी ज़िन्दगी में रोमांच तो होता है, लेकिन इसके साथ ही हर वक्त, हर पल मौत का सायां इनके साथ-साथ चलता रहता है। ऐसे ही एक भारतीय जासूस थे, रविन्द्र कौशिक। जिन्होंने देश के लिए अपनी जान तक न्यौछावर कर दी। 
       रविन्द्र कौशिक का जन्म राजस्थान के श्रीगंगानगर में 11 अप्रैल, 1952 को हुआ था और वो यहीं पर पले-बढ़े। रविन्द्र को बचपन से ही एक्टिंग का शौक था। स्कूल के दिनों में वो दूसरे लोगों की नकल(mimicry) बड़े ही अच्छे ढंग से किया करते  थे, जिसके चलते वो अपने पूरे स्कूल में चर्चित थे। वे अपने ख्वाब को पूरा करते हुए आगे चलकर एक थियेटर आर्टिस्ट भी बने। ऐसे ही जब वो एक बार लखनऊ में अपना प्रोगाम कर रहे थे, तो उनके इस एक्टिंग की प्रतिभा को भारतीय खुफिया एजेंसी राॅ के कुछ अधिकारियों ने देखा। उन्होंने रविन्द्र को पाकिस्तान में भारत का अंडरकवर एजेंट (जासूस) बनने का आॅफर दिया। जिसे रविन्द्र ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद दो साल तक दिल्ली में उन्हें प्रशिक्षित किया गया। इस दौरान उन्हें उर्दू भाषा सीखायी गयी व पाकिस्तान से जुड़ी अन्य सभी जानकारियाँ भी दी गयीं।
     सन् 1975 में पूरी तैयारी के साथ रविन्द्र   पाकिस्तान पहुँचे। यहाँ पर इनका नाम नबी अहमद शाकिर था। पाकिस्तान में आकर इन्होंने कानून की पढ़ाई के लिए काॅलेज में दाखिला ले लिया। इसे पूरा करने के बाद उनको पाकिस्तानी आर्मी में एक कमीशंड आॅफिसर के रूप में नौकरी मिल गयी। धीरे-धीरे प्रमोशन करके वो आर्मी में मेजर की रैंक तक पहुँचने में सफल हुए। यहाँ पर इन्होंने एक पाकिस्तानी लड़की अमानत से शादी भी कर ली। बाद में उनका एक बच्चा भी हुआ। सन् 1979 से 1983 के दौरान रविन्द्र कौशिक ने कई महत्वपूर्ण सूचनायें राॅ को भेजीं। जिसकी वजह से भारतीय बलों को बहुत सहायता मिली। इस दौरान उन्हें एक और नया नाम  "ब्लैक टाईगर" मिला। यह नाम उनको भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा दिया गया था।
       सन् 1983 का साल रविन्द्र कौशिक के लिए बुरा साबित हुआ। इस साल भारतीय खुफिया एजेंसियों ने एक   और जासूस इनायत मसीहा को पाकिस्तान में रविन्द्र कौशिक की मदद करने के लिए भेजा। लेकिन वो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के द्वारा पकड़े गये। इनायत मसीहा ने पकड़े जाने के बाद रविन्द्र कौशिक के बारे में भी सबकुछ बता दिया। इसके बाद रविन्द्र कौशिक को भी गिरफ्तार कर लिया गया। सन् 1985 में उन्हें मौत की सजा सुनायी गयी। लेकिन बाद में पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे उम्रकैद में बदल दिया गया। इसके बाद उन्हें सियालकोट व कोट लखपत जैसे कई जेलों में रखा गया। अपनी सजा के दौरान रविन्द्र ने चुपके से कई चिट्ठियाँ अपने परिवार वालों को लिखीं। इन चिट्ठियों के माध्यम से वह अपने ऊपर होने वाले जुल्मों के बारे में बताते थे। एक चिट्ठी में तो उन्होंने लिखा है, "क्या भारत जैसे देश के लिए कुर्बानी देने वालों को यही मिलता है?" जाहिर सी बात है कि रविन्द्र के पाकिस्तान में पकड़े जाने के बाद उस समय की तत्कालीन सरकार ने उनको भारत में वापस लाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने करीब 16 साल जेल में बिताये। इन 16 सालों में वो टीबी व अस्थमा जैसी कई बिमारियों के शिकार हो गये और अंत में सन् 2001 में पाकिस्तान के मियांवली जेल में उनकी मौत हो गयी।
      रविन्द्र कौशिक की माँ अमलादेवी ने उनको वापस लाने के लिए ढेरों पत्र भारत सरकार को लिखे थे, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। सरकार ने रविन्द्र की कोई भी मदद नहीं की। अंततः उनको मौत ही नसीब हुयी। रविन्द्र की मौत के बाद सरकार ने बस इतना ही किया कि उनकी माँ को 500 रूपये प्रति महीने पेंशन के तौर पर दिये जाने लगे, जिसे कुछ सालों बाद बढ़ाकर 2000 कर दिया गया। सन् 2006 में रविन्द्र के माँ की भी मौत हो गयी।
      रविन्द्र कौशिक ने देश की खातिर अपनी जिन्दगी के 26 साल कुर्बान कर दिये, जिसमें से वो 16 से अधिक सालों तक तो जेल में रहे। वास्तव में वे उन चंद लोगों में से हैं, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान तक दाँव पर लगा दी। उनकी मौत के इतने सालों के बाद वो सरकार द्वारा तो भुला दिये गये हैं, लेकिन हमारा यह फर्ज बनता है कि हम उनकी कुर्बानी को याद रखें और उनके प्रति एक सम्मान की भावना को बनाये रखें।


                                                                                               (Photo- The Telegraph)

Tuesday, 20 December 2016

कोडिन्ही- एक ऐसा गाँव जहाँ हर तरफ जुड़वा ही रहते हैं

दुनिया में तरह-तरह की विचित्रतायें मौजूद हैं। इनमें से कुछ वस्तुयें हैं, तो कुछ जगहें हैं या फिर कुछ लोग। हमारे भारत में भी बहुत सी विचित्र जगहें हैं। इन्हीं में से एक है केरल का कोडिन्ही गाँव। मलप्पुरम जिले में स्थित इस गाँव को जुड़वों का गाँव (Twin Town) के नाम से जाना जाता है। यदि हम यहाँ जायें तो हमें चारों ओर जुड़वे ही दिखायी देंगे। सोचिये इनके घर वालों को कितनी परेशानी होती होगी। कभी ऐसा भी हुआ हो कि गलती किसी और ने की हो और डाँट कोई और खाया हो। खैर वहाँ के लोगों को इसकी आदत भी हो गयी होगी। भारत में जहाँ जुड़वे बच्चे पैदा होने का औसत बहुत ही कम है, वहीं इस गाँव में हर 1000 बच्चे पर 45 जुड़वा बच्चे पैदा होते हैं। जुड़वा बच्चे पैदा होने का यह औसत एशिया में पहले नम्बर पर आता है, जबकि विश्व में दूसरे नम्बर पर। विश्व में पहले नम्बर पर नाइज़ीरिया का इग्बो-ओरा है, जहाँ जुड़वा बच्चे पैदा होने का औसत 145 के आस-पास है। 
   इस गाँव की आबादी 2000 के करीब है और यहाँ पर अधिकतम मुस्लिम समुदाय के लोग ही रहते हैं। कोडिन्ही गाँव के स्थानीय लोगों के अनुसार यहाँ सबसे पुराने जुड़वा बच्चे 1949 में पैदा हुये थे। पहले तो जुड़वा बच्चे पैदा होने का यह सिलसिला बहुत धीमा था, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें वृद्धि आयी है। पिछले 10 सालों में यहाँ जुड़वा बच्चे पहले के दोगुने हो गये हैं। यहाँ तो 79 जुड़वा जोड़े केवल 0-10 साल के बीच हैं। जुड़वों के बारे में अध्ययन करने के लिए सरकार ने इस गाँव में एक डाॅक्टर भी नियुक्त किया है, जिनका नाम कृष्णन श्री बीजू है। कोडिन्ही में जुड़वा लोगों के 220 जोड़े  गाँव में officially registered हैं। जबकि डाॅक्टर श्री बीजू के अनुसार इन जोड़ों की संख्या 300-350 है। यहाँ तो दो जोड़े ऐसे भी हैं जो कि तुड़वा (triplets) हैं। पिछले कुछ सालों में यह गाँव बहुत ही चर्चित हो चुका है। विदेशों से भी कई लोग इसे देखने व यहाँ पर शोध करने के लिये आते हैं। कुछ डाॅक्टरों का यह मानना है कि इस गाँव के खान-पान के चलते यहाँ जुड़वा बच्चे पैदा होते हैं, जबकि यहाँ का खान-पान केरल के बाकी इलाकों से कोई खास अलग नहीं है। इसलिए डाॅक्टरों का यह तर्क सही नहीं लगता। अभी तक जुड़वा बच्चे पैदा होने का कोई ठोस कारण नहीं पता चल सका है। क्योंकि जिन औरतों की शादी कोडिन्ही के बाहर होती है और आदमी जो दूसरे गाँव की औरतों से शादी करते हैं, ऐसी औरतें भी जुड़वा बच्चों को जन्म देती हैं। अब पता नहीं वो क्या वजह है, जिसके कारण ऐसा हो रहा है। अब इसका पता तो इस पर होने वाले बाकी शोधों के परिणामों से ही पता चलेगा।
      जो भी हो इस गाँव के लोग अपनी इस खासियत के कारण आकर्षण का केंद्र तो बन ही गये हैं और बने भी क्यों नहीं उनमें ऐसी बात ही है, जो उनको बाकीयों से अलग करती है। 
                                                                                          (Photo- Niklas Halle'n)
       
     

Thursday, 10 November 2016

भ्रष्टाचारियों पर घोर प्रहार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जैसे ही 500 व 1000 के नोटों के बंद होने की घोषणा की, वैसे ही घंटे भर के भीतर पूरे देश में हलचल मच गयी। बेशक इन नोटों को बंद करने का यह फैसला ऐतिहासिक है व पूरी तरह से सार्थक भी। इसे बंद करके उन्होंने काले धन, नकली नोटों के व्यापार व आतंकवाद जैसी ही कई अन्य गतिविधियों पर घोर प्रहार किया है, जो अभी तक हमारी अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँचा रहे थे। देश के अधिकतर लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया है, सिवाय उनके जिनके पास कालाधन है या जो आर्थिक नीतियों को ठीक से नहीं समझते हैं। ये लोग बिना सोचे समझे कुछ भी बोलते रहते हैं। यह खबर मिलने के बाद तो भ्रष्ट नेताओं व अधिकारियों के रातों की नींद ही उड़ गयी होगी। अब इनको अपनी जमापूँजी को नष्ट ही करना होगा। यदि वे इसे बैंक में जमा करते हैं, तो उन्हें इस पर 30 प्रतिशत टैक्स के अलावा 200 प्रतिशत पेनाल्टी भी देनी पड़ेगी और जो जेल होगी सो अलग। कुछ लोगों का यह कहना है कि इससे गरीब किसानों व दुकानदारों को नुकसान होगा और आम आदमी को परेशानी का सामना करना पड़ेगा। उनकी यह बात भी सही है। कल से बाजार बिल्कुल बंद पड़ा हुआ है और बहुत से लोग परेशानी का सामना कर रहे हैं, मैं इस बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ। लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी बिल्कुल सत्य है कि बीमारी को खत्म करने के लिये थोड़ा कष्ट तो सहना ही पड़ता है। यदि सरकार के इस निर्णायक कदम में हम उनका साथ दें, तो हमें ही फायदा होने वाला है। हमें कुछ दिनों की परेशानी को स्वीकार्य करना चाहिये।
      इसके पहले भी सरकार ने इन भ्रष्टाचारियों को आय घोषणा योजना (IDS) के तहत एक मौका दिया था कि 30 सितंबर तक अपनी सारी संम्पत्ति की घोषणा कर दें। IDS में करीब 66 हजार करोड़ रूपये की अघोषित आय सामने आयी थी, जबकि कालाधन इसके कई गुना है।  सरकार ने यह भी कहा था कि जिन लोगों ने अभी तक काले धन की घोषणा नहीं की है वह दंड भुगतने के लिए तैयार रहें। लेकिन कुछ महान लोगों ने इसे मजाक में लिया और सोचा कि सरकार कहाँ-कहाँ रेड डालेगी। लेकिन सरकार ने तो एक ही बार, एक ही समय में भ्रष्टाचारियों के घरों में रेड डाल दी। इन सब के अलावा कुछ बातें ऐसी भी हैं, जो थोड़ा अजीब लग रही हैं। जैसे की 1000 की जगह 2000 के नोटों को लाना। जिसकी वजह से धन इकट्ठा करने में और भी आसानी होगी। लेकिन ये आगे की बात है। फिलहाल कुछ समय तक तो काले धन पर रोक लगेगी ही। जहाँ तक नकली नोटों के कारोबार की बात है, रिजर्व बैंक के अनुसार नए नोटों में ऐसे सुरक्षा फीचर्स हैं, जिसकी वजह से नकली नोट छापना आसान नहीं  होगा। हालांकि इस फैसले के बाद भी पूरी तरह से काले धन पर लागाम नहीं लगा है, क्योंकि बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिन्होंने यह काला धन भारतीय मुद्रा में नहीं बल्कि स्विस बैंक के खातों में जमा किया है। फिर भी इसके बावजूद काला धन का वो हिस्सा जो मुद्रा में है, या तो नष्ट हो जायेगा या फिर सरकार के पास आयेगा। ये वही रकम है, जिसका उपयोग राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव के दौरान करती हैं व जिसके जरिये आतंकवादी देश में आतंकवाद फैलाते हैं।

Saturday, 15 October 2016

भोर का शहर

सोचिए कैसा हो, यदि हम एक ऐसी जगह पर रहें, जहाँ पर पैसे का कोई स्थान नहीं हो, ना ही कोई धर्म हो और ना ही कोई जाति। पूरी दुनिया के लगभग प्रत्येक देश की कोई ना कोई मुद्रा है और वहाँ कम से कम एक धर्म तो है ही। लेकिन आप लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि भारत में एक ऐसा ही प्रयोगिक शहर बसाया गया है, जहाँ पर ना तो कोई धर्म है, न तो वहाँ की कोई सरकार है और ना ही वहाँ कोई मुद्रा चलती है। यहाँ राजनीति का कोई स्थान नहीं है। पुडुचेरी के पास तमिलनाडु राज्य के विलुप्पुरम जिले में बसा यह प्रायोगिक शहर ओरोविल  के नाम से जाना जाता है। इसकी स्थापना सन् 1968 में मीरा रिचर्ड ने की थी। भारत सरकार ने भी मीरा रिचर्ड के इस अद्वितीय कार्य का समर्थन किया। इस शहर को भोर का शहर ( City of Dawn ) भी कहा जाता है। यहाँ पर कोई भी आकर रह सकता है, भले ही वह किसी भी देश का हो या किसी भी धर्म का। यहाँ पर रहने वाले लोग बँटे हुए नहीं हैं, उनकी तो बस एक ही पहचान है कि वे मनुष्य हैं। इस शहर को भी यही भावना लेकर बनाया गया था कि लोग अपनी इस एकता को महसूस कर सकें। 
       वैसे तो इस शहर में 50,000 लोगों को जगह देने की योजना थी। लेकिन इस समय यहाँ  44 देशों के कुल 2,047 लोग निवास करते हैं, जिसमें से 836 भारतीय मूल के लोग हैं। जैसा कि मैं आपको पहले भी बता चुका हूँ कि यहाँ की कोई मुद्रा नहीं है, इसलिए यहाँ पर रहने वाले लोग एक केन्द्रीय खाते का इस्तेमाल करते हैं। शहर में एक मंदिर भी स्थापित है, जिसे मातृमंदिर कहा जाता है। हालांकि यह मंदिर किसी भी धर्म से नहीं जुड़ा हुआ है, लेकिन यहाँ पर लोग ध्यान लगाने के लिए आते हैं व शांति की अनुभूति करते हैं। इस मंदिर के आसपास का क्षेत्र प्रशांत क्षेत्र कहलाता है। मंदिर में एक स्वर्ण क्रिस्टल बाॅल भी है, जो  'भविष्य के अनुभूति के प्रतीक' का प्रतिनिधित्व करता है। इस शहर के चार क्षेत्र हैं : "आवासीय क्षेत्र", " औद्योगिक क्षेत्र", "सांस्कृतिक(व शैक्षणिक) क्षेत्र" तथा " अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र" । नगरी क्षेत्र के पास संसाधन क्षेत्र हैं, जहाँ पर खेत, वन, उद्यान व बांध स्थापित हैं। श्री औरोबिन्दो इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ एजुकेशनल रिसर्च (SAIIER) की मदद से ओरोविल कई शैक्षणिक संस्थान भी चलाता है। ओरोविल के निवासियों से समुदाय में योगदान की अपेक्षा की जाती है। उन्हें हर एक प्रकार से समुदाय की सेवा करने को कहा जाता है। इसीलिए वहाँ रहने वाला कोई भी व्यक्ति मालिक नहीं होता है, बल्कि वो तो एक सेवक की तरह होता है। यहाँ पर आने वाले नए लोगों के लिए सबसे बड़ी परेशानी गृह-निर्माण की है, क्योंकि वर्तमान में ओरोविल सभी लोगों को आवास उपलब्ध करा पाने की स्थिति में नहीं है। नए लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपना घर बनाने में आर्थिक सहयोग दें। ओरोविल टुडे के अनुसार " नए लोगों के लिए काम के अवसर की कमी और रखरखाव का निम्नस्तर ये दो बाधाएं हैं। क्योंकि नए लोग व्यवसायिक इकाइयों या सेवा में कोई उचित काम नहीं ढूंढ पाते हैं। "

 सन् 2004 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने ओरोविल का दौरा किया तथा इसकी प्रशंसा की व अपनी सराहना व्यक्त की। UNESCO ने भी अभी तक इसका चार बार समर्थन किया है। इसकी स्थापना के समय मीरा रिचर्ड ने कहा था कि "ओरोविल भूत व भविष्य के बीच पुल बनने का आकांक्षी है। " निःसंदेह उनकी इस बात में सच्चाई है, क्योंकि जब दुनिया की शुरूआत हुयी तो मनुष्य किसी भी देश या धर्म से संबंधित नहीं थे। वो तो सिर्फ और सिर्फ मनुष्य ही थे। यही उनकी पहचान थी और आने वाले समय में शायद ऐसा ही कुछ हो। यदि कोई व्यक्ति अपनी आंतरिक परेशानियों से मुक्त होना चाहता है, एक शांति की अनुभूति व अपने अस्तित्व के होने का अहसास करना चाहता है, तो उसे यहाँ जरूर आना चाहिए।

                                                                                       (साभार- ओरोविल वेब पेज, विकिपीडिया )

Friday, 14 October 2016

कश्मीर- एक अनसुलझी कहानी

भारत और पाकिस्तान के बीच अभी तक चार युद्ध हो चुके हैं और इसमें से लगभग तीन बार इन युद्धों का कारण कश्मीर रहा है। सारे युद्ध में पाकिस्तान को हार का ही सामना करना पड़ा। लेकिन कश्मीर के कुछ क्षेत्रों में पाकिस्तान का अवैध कब्जा है, जिसे हम पाक अधिकृत कश्मीर(POK) के नाम से जानते हैं और अभी भी पाकिस्तान कश्मीर को लेकर कोई ना कोई मुद्दा उठाता ही रहता है। इस विवाद की शुरूआत सन् 1947 में शुरू हुयी, जब भारतीय रियासतों के विलय हो रहे थे। जम्मू व कश्मीर जैसे कुछ रियासत विलय में देरी लगा रहे थे। इस बात का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने अपनी सेना को कबाइली लुटेरों के भेष में कश्मीर भेज दिया। चूँकि कश्मीर की सीमा पाकिस्तान से लगती थी, इसलिए वे वहाँ पर कब्जा जमाना चाहते थे। पाकिस्तानी सेना ने वहाँ बहुत से लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस बात से घबराकर वहाँ के शासक महाराजा हरिसिंह ने भारत से मदद माँगी व अपनी रियासत के भारत में विलय की घोषणा कर दी। लेकिन उन्होंने यह निर्णय बहुत ही देरी से लिया, जिसके चलते पाकिस्तान ने लगभग आधे कश्मीर पर कब्जा कर लिया। इसके बाद भी भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को सबक सिखाते हुये, कई क्षेत्रों को पुनः प्राप्त कर लिया था, लेकिन तभी माननीय नेहरू जी के UNO में अपील करने के कारण युद्ध विराम की घोषणा हो गयी। जिसके कारण भारतीय सेना कश्मीर को दोबारा प्राप्त करने में असफल रही और आज तक वो क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में है, जिसका खामियाजा आये दिन हमारे देश को भुगतना पड़ रहा है। ऐसे ही 1971 के युद्ध में इंदिरा गांधी के पास भी एक मौका था, जब पाकिस्तान की सेना के 1 लाख सैनिकों ने भारत की सेना के सामने समर्पण किया था। यदि वे चाहती तो कश्मीर की समस्या को हल कर सकती थी लेकिन ये मौका भी इंदिरा गांधी ने गँवा दिया और 1 लाख सैनिकों को छोड़ दिया।
     नेहरू जी व इंदिरा गांधी के इस गलत निर्णय के कारण आज कश्मीर का वो इलाका आतंकवादियों का गढ़ बन चुका है। यहीं से ये आतंकवादी तमाम गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं और घाटी में हिंसा फैला रहे हैं। कहने को तो POK की एक अलग सरकार है और वहाँ पर एक प्रधानमंत्री भी है, लेकिन सारा नियंत्रण पाकिस्तान के हाथ में है। वहाँ के लोग बहुत ही दुःख भरी जिन्दगी जी रहे हैं। आलम तो यह है कि POK के कई मुस्लिम परिवारों ने भारत में शरण ले रखी है। लंदन के रिसर्चरों के द्वारा वहाँ के कुछ जिलों में कराये गये सर्वे के अनुसार एक व्यक्ति ने भी पाकिस्तान के साथ खड़े होने की वकालत नहीं की। वकालत वही लोग कर रहे हैं, जो कट्टरपंथी व अलगाववादी है। यही वे लोग हैं, जो आये दिन दंगा फसाद करते रहते हैं। ये लोग वहाँ पर अमन व शांति नहीं चाहते हैं। अब तो धीरे-धीरे POK के कुछ हिस्से पर चीन भी कब्जा जमा रहा है, लेकिन इस बात से तो कट्टरपंथियों को कोई मतलब ही नहीं है, उन्हें तो बस भारत से ही परेशानी है। भारत भी अब चुप नहीं बैठने वाला, सर्जिकल स्ट्राईक के जरिए भारतीय सेना ने POK में कई आतंकियों को मार गिराया और उनके ठिकानों को तबाह कर दिया। हमें भारतीय सेना व सरकार के इस निर्णय पर गर्व है। जरूरत है तो ऐसे ही कुछ और मिशन की जिससे कि कश्मीर आतंकियों के गढ़ से मुक्त हो सके और वापस हम इसे प्राप्त कर सकें और वहाँ के लोग हिंसा से मुक्त हो सकें। इसके लिए हो सकता है कि बेशक हमें एक युद्ध लड़ना पड़े, लेकिन इसके बाद आगे हमें इन मुद्दों पर बहस नहीं करना पड़ेगा। पिछली सरकारों ने जो गलतियां की, उन्हें अब दोहराना नहीं चाहिए, व राजनीति से दूर हटकर इसपर एक सख्त फैसला लेना चाहिए।