Friday, 14 July 2017
इनरलाइन पास : जिन्दगी से रूबरू कराती एक यात्रा
Sunday, 5 March 2017
खगोलविज्ञान व गणित के महान पंडित : आर्यभट्ट
हमारे देश भारत में कई महान वैज्ञानिकों ने जन्म लिया है। इन्हीं महान वैज्ञानिकों में से एक नाम आर्यभट्ट का भी है। मूलत: हम सब इन्हें शून्य की खोज के लिये जानते हैं। शून्य की खोज के अलावा आर्यभट्ट ने खगोलविज्ञान और गणित के कई सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था। जिसकी वजह से वे विश्व के महानतम वैज्ञानिकों में से एक बन गये। बहुत से लोगों का यह मानना है कि सूर्य व पृथ्वी के बीच सही संबंधों को बतलाने वाला पहला व्यक्ति निकोलस कापरनिकस था। लेकिन आर्यभट्ट ने निकोलस कापरनिकस के जन्म के कई वर्ष पूर्व ही सूर्य व पृथ्वी के इन संबंधों को दुनिया के सामने रखा। इसके अलावा इन्होंने यह भी बतलाया कि चन्द्रमा और पृथ्वी जैसे दूसरे ग्रह अपने स्वयं के प्रकाश से नहीं बल्कि सूर्य के प्रकाश से चमकते हैं। हिन्दू धर्म के सूर्य व चन्द्र ग्रहण की पुरानी मान्यताओं को भी आर्यभट्ट ने गलत सिद्ध किया।
आर्यभट्ट द्वारा लिखे गये ग्रंथों में से सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ आर्यभट्टीयम् है। इस ग्रंथ में खगोलशास्त्र, अंकगणित, बीजगणित और त्रिकोणमिति के कई नियम दिये गये हैं। आर्यभट्टीयम् को कभी-कभी आर्य-शत-अष्ट के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस ग्रंथ के पाठों में छंदो की संख्या 108 है। इस ग्रंथ में वर्गमूल (square root), घनमूल (cube root), समानान्तर श्रेणी ( Arithmetic Progression ) के साथ-साथ सतत भिन्न (Continued Function), द्विघात समीकरण (Quadratic Equation), Table of sines, घात श्रंखला के योग (Sums of power series) तथा विभिन्न प्रकार के समीकरणों का वर्णन मिलता है। इस पूरे ग्रंथ में 108 छंद है तथा इसे चार अध्यायों में विभाजित किया गया है। ये चार अध्याय गीतिकपाद, गणितपाद, कालक्रियापाद व गोलापद है। इन चारों अध्यायों में कल्प, युग, ज्यामितिक प्रगति, ग्रहों की स्थिति निर्धारण करने की विधि, पृथ्वी के आकार, दिन और रात के कारण जैसी अनेकों महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी गयी हैं। इस ग्रंथ की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि ये ग्रंथ आज के आधुनिक समय में भी अस्तित्व में है।
आर्यभट्ट ने उस समय बिना किसी आधुनिक उपकरणों की सहायता से पृथ्वी की परिधि का मान बिल्कुल सही-सही बताया। जिसमें आज के समय के अनुसार सिर्फ 65 मील की ही अशुद्धि है। उन्होंने पृथ्वी के घूमने के हिसाब से समय को विभाजित किया। इन्होंने सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलयुग को समान माना है। इनके अनुसार एक कल्प में 14 मन्वंतर और एक मन्वंतर में 72 महायुग और एक महायुग में चार युग सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलयुग होते हैं। आर्यभट्ट ने पाई (pi) के सन्निकट मान पर भी कार्य किया। आर्यभट्टीयम् के दूसरे भाग में उन्होंने किसी वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात ज्ञात किया है और उन्होंने इसका मान 3.1416 बतलाया है। जो कि पाई के आज के ज्ञात मान से बिल्कुल मिलता है।
( फोटो - विकिपीडिया )
Thursday, 12 January 2017
शिक्षा - ज्ञान का माध्यम या जीवन-यापन की जरूरत
भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए नौकरी भी जरूरी है, लेकिन शिक्षा का इस कदर मजाक क्यों। क्यों लोग आजकल इसका सिर्फ इस्तेमाल कर रहे हैं ? सिर्फ डिग्रियों को महत्व देने वाले ऐसे लोग जब किसी जगह पर काम करने के लिए जाते हैं, तो वहाँ कि गुणवत्ता को तो प्रभावित करते ही हैं, साथ में अपने आस-पास के वातावरण को भी दूषित करते हैं। यदि ऐसे लोग अध्यापन के क्षेत्र में चले गये, फिर तो पूछना ही नहीं है। सरकारी प्राइमरी व माध्यमिक विद्यालयों का हाल तो हम सबको पता ही है। यहाँ पर शिक्षक पढ़ाने के उद्देश्य से कभी नहीं आते हैं। वे तो बस यहाँ पर आकर किसी भी तरह समय काटते हैं। फिर भी सरकार इन पर करोड़ों रूपये फूँक रही है व इनको तमाम सुविधायें उपलब्ध करा रही है। ऐसे ही लोगों कि वजह से हमारे देश में शिक्षा का स्तर दिनों पर दिन गिरता जा रहा है।
हमारे देश में हर साल हजारों की संख्या में इंजीनियरिंग के स्टूडेंट्स ग्रेजुएट होते हैं, लेकिन इनमें से कितने ऐसे हैं, जिनकी वास्तव में इस क्षेत्र में रूचि होती है। यदि देखा जाए तो यह संख्या बहुत ही कम है। वे इसे या तो इसलिए पढ़ रहे होते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इस कोर्स को पूरा करने के बाद उन्हें एक अच्छी नौकरी मिल जायेगी या यदि वे जानते भी हैं कि उनकी इस क्षेत्र में रूचि नहीं है, फिर भी अभिवावक के दबाव में आकर उन्हें ऐसा करना पड़ता है। परिणाम यह होता है कि कोर्स को पूरा कर लेने के बाद भी वे बेरोजगार होते हैं। यदि ऐसे लोग शिक्षा को नौकरी पाने का जरिया न मानकर ज्ञान प्राप्ति का साधन मानें व उसी क्षेत्र में अपना करियर बनाये, जिनमें उनकी रूचि हो तो कितना अच्छा है। बहुत से लोग पुराने परंपरागत कोर्सों जैसे इंजीनियरिंग, डाॅक्टरी को ही सही मानते है और सोचते हैं कि इसी से भविष्य सुरक्षित रह सकता है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। संगीत, नृत्य, कला जैसे अलग क्षेत्र भी शिक्षा के ही एक भाग हैं। ऐसा नहीं है कि जिसने B.Tech, MBBS, LLB, PHD किया हो वही शिक्षित हो। अपने क्षेत्र में कुशल होना ही वास्तविक शिक्षा है। चाहे व सामाजिक क्षेत्र हो या फिर कुछ और।
मैंने बहुतों को तो यह कहते भी सुना है कि जिन्दगी भर पढ़ते व सीखते ही रहोगे क्या। वे यह नहीं जानते कि जीवन पर्यन्त पढ़ते व सीखते रहने से हमारे अपने ही ज्ञान में वृद्धि होगी। सोचिये जरा यदि नौकरी मिल जाने के बाद हम पढ़ना, लिखना और कुछ सीखना छोड़ दें, और जिन्दगी काटते-काटते एक दिन इस दुनिया को अलविदा कह दें तो इसका कोई फायदा है। इससे अच्छा है कि हम रोज कुछ न कुछ पढ़ते व सीखते रहें व इस दुनिया को एक नये नजरिये से देखें व समझें।
Friday, 6 January 2017
रविन्द्र कौशिक- भारत का ब्लैक टाईगर
सन् 1975 में पूरी तैयारी के साथ रविन्द्र पाकिस्तान पहुँचे। यहाँ पर इनका नाम नबी अहमद शाकिर था। पाकिस्तान में आकर इन्होंने कानून की पढ़ाई के लिए काॅलेज में दाखिला ले लिया। इसे पूरा करने के बाद उनको पाकिस्तानी आर्मी में एक कमीशंड आॅफिसर के रूप में नौकरी मिल गयी। धीरे-धीरे प्रमोशन करके वो आर्मी में मेजर की रैंक तक पहुँचने में सफल हुए। यहाँ पर इन्होंने एक पाकिस्तानी लड़की अमानत से शादी भी कर ली। बाद में उनका एक बच्चा भी हुआ। सन् 1979 से 1983 के दौरान रविन्द्र कौशिक ने कई महत्वपूर्ण सूचनायें राॅ को भेजीं। जिसकी वजह से भारतीय बलों को बहुत सहायता मिली। इस दौरान उन्हें एक और नया नाम "ब्लैक टाईगर" मिला। यह नाम उनको भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा दिया गया था।
सन् 1983 का साल रविन्द्र कौशिक के लिए बुरा साबित हुआ। इस साल भारतीय खुफिया एजेंसियों ने एक और जासूस इनायत मसीहा को पाकिस्तान में रविन्द्र कौशिक की मदद करने के लिए भेजा। लेकिन वो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के द्वारा पकड़े गये। इनायत मसीहा ने पकड़े जाने के बाद रविन्द्र कौशिक के बारे में भी सबकुछ बता दिया। इसके बाद रविन्द्र कौशिक को भी गिरफ्तार कर लिया गया। सन् 1985 में उन्हें मौत की सजा सुनायी गयी। लेकिन बाद में पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे उम्रकैद में बदल दिया गया। इसके बाद उन्हें सियालकोट व कोट लखपत जैसे कई जेलों में रखा गया। अपनी सजा के दौरान रविन्द्र ने चुपके से कई चिट्ठियाँ अपने परिवार वालों को लिखीं। इन चिट्ठियों के माध्यम से वह अपने ऊपर होने वाले जुल्मों के बारे में बताते थे। एक चिट्ठी में तो उन्होंने लिखा है, "क्या भारत जैसे देश के लिए कुर्बानी देने वालों को यही मिलता है?" जाहिर सी बात है कि रविन्द्र के पाकिस्तान में पकड़े जाने के बाद उस समय की तत्कालीन सरकार ने उनको भारत में वापस लाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने करीब 16 साल जेल में बिताये। इन 16 सालों में वो टीबी व अस्थमा जैसी कई बिमारियों के शिकार हो गये और अंत में सन् 2001 में पाकिस्तान के मियांवली जेल में उनकी मौत हो गयी।
रविन्द्र कौशिक की माँ अमलादेवी ने उनको वापस लाने के लिए ढेरों पत्र भारत सरकार को लिखे थे, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। सरकार ने रविन्द्र की कोई भी मदद नहीं की। अंततः उनको मौत ही नसीब हुयी। रविन्द्र की मौत के बाद सरकार ने बस इतना ही किया कि उनकी माँ को 500 रूपये प्रति महीने पेंशन के तौर पर दिये जाने लगे, जिसे कुछ सालों बाद बढ़ाकर 2000 कर दिया गया। सन् 2006 में रविन्द्र के माँ की भी मौत हो गयी।
रविन्द्र कौशिक ने देश की खातिर अपनी जिन्दगी के 26 साल कुर्बान कर दिये, जिसमें से वो 16 से अधिक सालों तक तो जेल में रहे। वास्तव में वे उन चंद लोगों में से हैं, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान तक दाँव पर लगा दी। उनकी मौत के इतने सालों के बाद वो सरकार द्वारा तो भुला दिये गये हैं, लेकिन हमारा यह फर्ज बनता है कि हम उनकी कुर्बानी को याद रखें और उनके प्रति एक सम्मान की भावना को बनाये रखें।
(Photo- The Telegraph)
Tuesday, 20 December 2016
कोडिन्ही- एक ऐसा गाँव जहाँ हर तरफ जुड़वा ही रहते हैं
जो भी हो इस गाँव के लोग अपनी इस खासियत के कारण आकर्षण का केंद्र तो बन ही गये हैं और बने भी क्यों नहीं उनमें ऐसी बात ही है, जो उनको बाकीयों से अलग करती है।
Thursday, 10 November 2016
भ्रष्टाचारियों पर घोर प्रहार
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जैसे ही 500 व 1000 के नोटों के बंद होने की घोषणा की, वैसे ही घंटे भर के भीतर पूरे देश में हलचल मच गयी। बेशक इन नोटों को बंद करने का यह फैसला ऐतिहासिक है व पूरी तरह से सार्थक भी। इसे बंद करके उन्होंने काले धन, नकली नोटों के व्यापार व आतंकवाद जैसी ही कई अन्य गतिविधियों पर घोर प्रहार किया है, जो अभी तक हमारी अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँचा रहे थे। देश के अधिकतर लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया है, सिवाय उनके जिनके पास कालाधन है या जो आर्थिक नीतियों को ठीक से नहीं समझते हैं। ये लोग बिना सोचे समझे कुछ भी बोलते रहते हैं। यह खबर मिलने के बाद तो भ्रष्ट नेताओं व अधिकारियों के रातों की नींद ही उड़ गयी होगी। अब इनको अपनी जमापूँजी को नष्ट ही करना होगा। यदि वे इसे बैंक में जमा करते हैं, तो उन्हें इस पर 30 प्रतिशत टैक्स के अलावा 200 प्रतिशत पेनाल्टी भी देनी पड़ेगी और जो जेल होगी सो अलग। कुछ लोगों का यह कहना है कि इससे गरीब किसानों व दुकानदारों को नुकसान होगा और आम आदमी को परेशानी का सामना करना पड़ेगा। उनकी यह बात भी सही है। कल से बाजार बिल्कुल बंद पड़ा हुआ है और बहुत से लोग परेशानी का सामना कर रहे हैं, मैं इस बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ। लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी बिल्कुल सत्य है कि बीमारी को खत्म करने के लिये थोड़ा कष्ट तो सहना ही पड़ता है। यदि सरकार के इस निर्णायक कदम में हम उनका साथ दें, तो हमें ही फायदा होने वाला है। हमें कुछ दिनों की परेशानी को स्वीकार्य करना चाहिये।
इसके पहले भी सरकार ने इन भ्रष्टाचारियों को आय घोषणा योजना (IDS) के तहत एक मौका दिया था कि 30 सितंबर तक अपनी सारी संम्पत्ति की घोषणा कर दें। IDS में करीब 66 हजार करोड़ रूपये की अघोषित आय सामने आयी थी, जबकि कालाधन इसके कई गुना है। सरकार ने यह भी कहा था कि जिन लोगों ने अभी तक काले धन की घोषणा नहीं की है वह दंड भुगतने के लिए तैयार रहें। लेकिन कुछ महान लोगों ने इसे मजाक में लिया और सोचा कि सरकार कहाँ-कहाँ रेड डालेगी। लेकिन सरकार ने तो एक ही बार, एक ही समय में भ्रष्टाचारियों के घरों में रेड डाल दी। इन सब के अलावा कुछ बातें ऐसी भी हैं, जो थोड़ा अजीब लग रही हैं। जैसे की 1000 की जगह 2000 के नोटों को लाना। जिसकी वजह से धन इकट्ठा करने में और भी आसानी होगी। लेकिन ये आगे की बात है। फिलहाल कुछ समय तक तो काले धन पर रोक लगेगी ही। जहाँ तक नकली नोटों के कारोबार की बात है, रिजर्व बैंक के अनुसार नए नोटों में ऐसे सुरक्षा फीचर्स हैं, जिसकी वजह से नकली नोट छापना आसान नहीं होगा। हालांकि इस फैसले के बाद भी पूरी तरह से काले धन पर लागाम नहीं लगा है, क्योंकि बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिन्होंने यह काला धन भारतीय मुद्रा में नहीं बल्कि स्विस बैंक के खातों में जमा किया है। फिर भी इसके बावजूद काला धन का वो हिस्सा जो मुद्रा में है, या तो नष्ट हो जायेगा या फिर सरकार के पास आयेगा। ये वही रकम है, जिसका उपयोग राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव के दौरान करती हैं व जिसके जरिये आतंकवादी देश में आतंकवाद फैलाते हैं।




